ज़ेहरा: जिसने बहुत कम उम्र में अरबी कैलीग्राफी में बनाई अपनी अलग पहचान

मलिक असगर हाशमी

‘‘अरबी कैलीग्राफी थोड़ा बहुत केरल और कर्नाटक में बची है। उत्तर प्रदेश में यह कला बिल्कुल खत्म हो गई है। कोशिश कर रही हूं किसी तरह इस प्रदेश में इसे दोबारा जिंदा किया जाए।’’ यह कहना है उत्तर प्रदेश के बहराइच की रहने वाली युवा कैलीग्राफर ज़ेहरा जाफरी का, ज़ेहरा ने बहुत कम उम्र में अपनी कला के माध्यम से एक विशिष्ट पहचान बनाई है।

कम उम्र में उनका बहुत कुछ करने का इरादा है। विशेषकर अरबी कैलीग्राफी को बढ़ाने के क्षेत्र में। साथ ही इसे अपने कारोबार के तौर पर भी बढ़ाने के प्रयास में हैं। इस संवाददाता ने जब उनसे बातचीत की तो कई दिलचस्प और हैरान करने वाली बातें सामने आईं।

ज़ेहरा जाफरी कम उम्र में ‘इमाम अली मदरसा’ चलाती हैं, जिसमें फिलहाल 41 बच्चे दीनी तालीम के साथ दुनियावी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इसके साथ ज़ेहरा उन्हें कैलीग्राफी भी सीखा रही हैं, ताकि बच्चे जब मदरसा से निकलें तो विभिन्न स्तर पर अरबी कैलीग्राफी को आगे बढ़ा सकें। यदि वे ऐसा नहीं कर सके तो अपने बुरे दिनों में इस कला को रोजगार का बेहतर साधन बना सकते हैं।

सोशल मीडिया है दूसरों तक पहुंचने का सहारा

ज़ेहरा ने मदरसा चलाने के साथ कैलीग्राफी को अपने रोजगार का अहम हिस्सा बनाया है। वह पिछले पांच वर्षों से इस दिशा में काम कर रही है। इनका ‘ज़ेहरा कैलीग्राफर के नाम से ट्विटर हैंडल जिसमें साढ़े दस हजार से करीब इनके फॉलोवर्स हैं।

इसके अलावा इनके नाम का फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल भी है। दरअसल, उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ग्राहक तक पहुंचने का माध्यम बनाया है। वह इसपर अपनी नई-नई कला कृति प्रदर्शित करती हैं। पसंद आने पर कोई भी इनके मेल बॉक्स में अपना फोन नंबर छोड़ सकता है।

इसके बाद इनके और कैलीग्राफी बनाने वालों के बीच टेलीफोनिक बातचीत होती है। दोनों में पैसे और कृति की लेन-देन पर सहमति बनने पर निर्धारित तारीख को पैसे और सामान का आदान प्रदान कर दिया जाता है।

ज़ेहरा जाफरी बताती हैं कि इस तरह उन्हें रोजाना ठीक-ठाक संख्या में आर्डर मिल जाते हैं। उसी अनुपात में कला कृति की डिलिवरी भी की जाती है। ज़ेहरा वाल हैंगिंग से लेकर कार हैंगिंग तक सब कुछ बनाती हैं। बड़े और अच्छे फ्रेम में ‘तोगरा’ भी तैयार कर सप्लाई करती  है।।

परिवार का मिला सहयोग

ज़ेहरा जाफरी के अब्बा शकील अब्बास जाफरी की बहराइच में गारमेंट शाॅप है। यह तीन भाई बहन हैं। भाई बड़े हैं, जो ज़ेहरा के ऑन लाइन कारोबार को बढ़ाने में मददगार हैं। सोशल मीडिया पोस्ट की एडिटिंग भाई ही करते हैं। सोशल मीडिया पर किस आइटम को किस तरह डिस्प्ले करना है बड़े भाई ही तय करते हैं।

बिजनस बढ़ाने में भी वह मदद करते हैं। ज़ेहरा कहती हैं,‘‘ इस मामले में भाईजान बेहद क्रिएटिव हैं।’’मजे की बात है कि भाई-बहन, सारा कुछ बिना किसी बाहरी प्रशिक्षण के करते हैं। यहां तक कि कैलीग्राफी की ज़ेहरा ने कोई शिक्षा नहीं ली है।

बातचीत में कहती हैं,‘‘सब कुछ पढ़कर नहीं सीखा जा सकता। कई तो पढ़कर भी नहीं सीख पाते। कई बिना पढ़े बहुत कुछ सीख लेते हैं।’’फिर आपने कैलीग्राफी कैसे सीखी ? इस सवाल का जो जवाब मिला उसने ‘एकलव्य’ की याद जाता हो गई ।

ज़ेहरा ने बताया कि उन्होंने बी-कॉम किया है। बहराइच के जिस कॉलेज में पढ़ती थीं, वहां संस्कृत और चित्रकारी के टीचर थे मोइन साहब। उनकी हैंडराइटिंग बहुत सुंदर थी। ज़ेहरा बताती हैं कि मोइन साहब जब क्लास लेते थे तो वह चुपके से पीछे बैठ जाती थी।

छात्रों को जो बताते-सिखाते, घर आकर उसका अभ्यास करती थी। रंगों का गणित भी उन्होंने उनसे इसी तरह सीखा। इस दौरान उन्हें पता चला कि उत्तर प्रदेश से अरबी कैलीग्राफी लगभग खत्म हो चुकी है। तभी उन्होंने मोइन साहब से सीखी हुई कला को कैलीग्राफी पर आजमाना शुरू किया।

 

दीनी तालीम ज़ेहरा ने हासिल की हुई है। उर्दू इनकी मादरी जुबान है। वह कहते हैं,‘‘ इसलिए उन्हें अरबी कैलीग्राफी सीखने में दिक्कत नहीं आई।’’ बार-बार के अभ्यास के बाद अब वह इतनी माहिर हो चुकी हैं कि किसी को भी कैलीग्राफी सिखा सकती हैं। वह कहती हैं इस कला को उत्तर प्रदेश में बढ़ाना है। इसी नियत से अपने मदरसे के बच्चों को कैलीग्राफी सिखा रही हैं।

ज़ेहरा की तरक्की नहीं देख पाए मोइन साहब

आपकी इस हुनर के बारे में जानकर आपके कॉलेज के टीचर मोइन साहब तो बहुत खुश हुए होंगे ? इस सवाल के जवाब में बोलीं, पांच साल पहले उनका इंतकाल हो गया। इसलिए आज वह यह नहीं देख पाए कि मैं अब कैलीग्राफी को कैसे बढ़ा रही हूं। वह बताती हैं,‘‘ चूंकि कारोबार बढ़ रहा है, इसलिए अपने प्रोडक्ट के प्रचार को लेकर जल्द ही वह एक वेबसाइट लाउंच करने वाली हैं। इसकी तैयारी जोरों पर है।’’

सभार- आवाज़ दी वॉयस

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