जंजीर: दाम नहीं, नाम तो हो

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वीर विनोद छाबड़ा

सलीम-जावेद ‘अंदाज़’ के जीपी सिप्पी और ‘हाथी मेरे साथी’ के चिनप्पा देवर से बहुत नाराज़ थे, इसलिए कि उन्होंने वायदे के मुताबिक फिल्म की नामावली में उन्हें बतौर लेखक श्रेय नहीं दिया. पैसा भी कोई ख़ास नहीं, आधा-अधूरा. उन्हें बहुत मायूसी हुई. बंबई आने के दो ही तो उद्देश्य थे, पैसा और नाम कमाना. पैसा नहीं तो नाम तो दिया होता. दोनों ही नहीं मिले.

सलीम-जावेद की अगली फ़िल्म थी, प्रकाश मेहरा की ‘ज़ंज़ीर’ (1973). उन्होंने बहुत मेहनत की, सिर्फ स्क्रिप्ट, स्क्रीनप्ले और डायलॉग पर ही नहीं बल्कि स्टार्स सिलेक्शन पर भी. अमिताभ बच्चन को भी तलाश करके वही लाये थे. उन्होंने मेहरा से ये भी वायदा ले लिया था कि पब्लिसिटी मैटेरियल पर उनका नाम ज़रूर छपेगा. ये उनकी डिमांड नहीं, शर्त थी. क्योंकि तब तक फिल्म इंडस्ट्री का हर खास-ओ-आम जान चुका था कि अंदाज़ और हाथी मेरे साथी में उनकी राइटिंग का कमाल न होता तो ये फ़िल्में कामयाब नहीं हुई होतीं. इस कारण वो काफ़ी डिमांड में थे.

प्रकाश मेहरा ने उनकी शर्त को मान लिया – हां भाई हां. लेकिन ‘ज़ंजीर’ की रिलीज़ से पहले जो पोस्टर रिलीज़ हुए तो उसमें सलीम-जावेद का नाम कही नहीं था. सलीम-जावेद आग-बबूला हो गए. प्रकाश मेहरा पर चढ़ाई कर दी. मेहरा ने उन्हें समझाया, इसमें मेरी ग़लती नहीं है, पब्लिसिटी इंचार्ज ने बखेड़ा किया है और वो भी उसने जान-बूझ कर नहीं किया, बस ध्यान से उतर गया. हालांकि सच ये था कि मेहरा ने जान-बूझ कर ऐसा किया था. आज तक तो लेखक को इतना भाव उन्होंने कभी दिया नहीं था कि पोस्टरों में उसका नाम जाए. अगर लेखक ही सब कुछ हो जाए तो फिर हमें कौन पूछेगा?

सलीम-जावेद सब समझ गए. फिर वो ठहरे एक नंबर के घाघ. घाट घाट का पानी तब तक पी ही चुके थे. तय किया कि खुद को सही जगह पर बैठा कर रहेंगे. रिलीज़ से ठीक एक दिन पहले उन्होंने एक पेंटर पकड़ा. उसे मुंह-मांगी रक़म दी और एक स्टैंसिल भी. जहाँ-जहाँ ‘ज़ंजीर’ का पोस्टर दिखे, उसके नीचे छाप दो – Written by Salim-Javed.

लेकिन अगले दिन जब दीवारों पर चिपके पोस्टरों को उन्होंने देखा तो दंग रह गए. Written by Salim-Javed कहीं ऊपर, कहीं दाएं और कहीं बाएं. कहीं अमिताभ का मुंह छिप गया तो कहीं शेरखान प्राण की दाढ़ी. उन्हें बहुत शर्मिंदी हुई. दरअसल, पेंटर ने दारू चढ़ा रखी थी. नशे में जहाँ-तहाँ छापता हुआ निकल गया. उन्होंने जम कर कोसा पेंटर को. लेकिन जानने वाले सलीम और जावेद पीठ ठोकने में लगे थे, मुबारक़ हो, भाई. सलीम-जावेद मुस्कुराये, नाम कहीं भी छपा हो, हमारा काम तो हो गया.

नतीजा ये हुआ कि प्रकाश मेहरा ने अगली बार जब पोस्टर छपवाए तो ख्याल रखा कि म्युज़िक डायरेक्टर कल्याणजी-आनंदजी के ठीक नीचे सलीम-जावेद का नाम ज़रूर हो. उसके बाद जब तक सलीम-जावेद की जोड़ी सलामत रही, उन्हें पीछे मुड़ कर देखना नहीं पड़ा.