क्या भारत की सियासत को कांग्रेस मुक्त करने से पहले ही मुस्लिम मुक्त कर दिया जाएगा?

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देश का संविधान लिखने वाले भी शायद भविष्य में अल्पसंख्यक वर्ग विशेष कर मुसलमानों के साथ होने वाली सम्भावित सियासी नाइंसाफी को भांप चुके थे तभी तो उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 38 में सभी वर्गों के लिए विशेष तौर पर “राजनीतिक न्याय” देने का उल्लेख किया। संविधान के अनुच्छेद 38 के मुताबिक़ “राज्य सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित कर आय, स्थिति, सुविधाओं तथा अवसरों में असमानताओं को कम करके सामाजिक व्यवस्था को सुरक्षित एवं संरक्षित कर लोगों के कल्याण को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा.” यहां संविधान का ज़िक्र करना इसलिए भी ज़रुरी हो जाता है क्यूंकि प्रधानमंत्री मोदी हमेशा ही संविधान में न केवल पूरी आस्था रखने की बात करते हैं बल्कि उसकी पालना करने का दावा भी करते हैं। इस सबके बावजूद जिस तरह से ख़ुद मोदी सरकार और भाजपा ने लोक सभा, राज्य सभा एवं विभिन्न प्रदेशों की विधान सभाओं के साथ साथ अब काबीना से भी मुसलमानों को निकाल बाहर किया है वो एक गंभीर एवं विचारणीय विषय है। देश के क़रीब 20 करोड़ मुसलमानों के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भाजपा और आरएएस का क्या सियासी मंसूबा है यह न सिर्फ़ देश की जनता जानना चाहती है बल्कि अब विदेश में भी इस विषय पर चर्चा होने लगी है कि क्या भारत की सियासत को कांग्रेस मुक्त करने से पहले ही मुस्लिम मुक्त कर दिया जाएगा?

दरअसल, 30 जून को मुख़्तार अब्बास नक़वी द्वारा अपने पद से इस्तीफ़ा देने के बाद मोदी कैबिनेट अब पूरी तरह से मुस्लिम मुक्त हो चुकी है। आज़ाद भारत में यह पहला मौक़ा है जब केंद्र सरकार में एक भी मुस्लिम मंत्री शामिल नहीं है। इतना ही नहीं, आज़ादी के बाद यह भी पहला अवसर है जब सत्तारूढ़ दल का कोई भी मुस्लिम नुमाईंदा लोक सभा या राज्य सभा का सदस्य नहीं है। देश को आज़ाद कराने में अहम भूमिका निभाने और देश के साथ क़दम से क़दम मिला कर चलने वाली क़ौम के सियासी हालात एक ही दिन में इतने दयनीय हो गए हों ऐसा क़तई नहीं है बल्कि, इस समाज को राजनैतिक तौर पर अछूत बनाने के लिए एक तरफ़ जहां लंबी जद्दोजहद की गई और विशेष रणनीति पर काम किया गया वहीं इन हालात को पैदा करने में ख़ुद मुस्लिम समाज का भी कम ‘योगदान’ नहीं रहा। लेकिन, इन तमाम हालात के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वाकई आइंदा दिनों में भी केंद्र की मोदी सरकार में किसी मुस्लिम को जगह नहीं दी जाएगी? क्या केन्द्र में भाजपा सरकार के रहते अब कभी भी किसी मुस्लिम को मंत्री नहीं बनाया जाएगा? और क्या पार्टी लोक सभा, राज्य सभा एवं विभिन्न राज्यों की विधान सभाओं में भी मुसलमानों को नुमाइंदगी नहीं देगी? ये सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्यूंकि हाल ही भाजपा के तीन मुस्लिम नेता (मुख़्तार अब्बास नक़वी, एमजे अकबर और सैयद जफ़र इस्लाम) राज्य सभा से रिटायर हुए लेकिन, न तो उनमें से किसी को फ़िर से राज्य सभा भेजा गया न ही उनकी जगह किसी दूसरे मुस्लिम नुमाइंदे को मौक़ा दिया गया।

मई, 2014 में शपथ लेने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नजमा हेप्तुल्लाह को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया, इसके कुछ दिन बाद मुख़्तार अब्बास नक़वी और वरिष्ठ पत्रकार एमजे अकबर को भी मंत्री बना कर देश-दुनिया को “सबका साथ, साबका विकास..” का संदेश दिया गया। एक वक़्त ऐसा भी आया जब तीन मुस्लिम नेता (नजमा हेपतुल्ला, एमए नक़वी और एमजे अकबर) मोदी मंत्रीमंडल में शामिल थे। पार्टी को उम्मीद थी कि अपने तीन-तीन मुस्लिम मंत्रियों की बदौलत वह न सिर्फ़ मुस्लिम वर्ग में पीएम मोदी की छवि को सुधारने में काम्याब होगी बल्कि धीरे-धीरे मुसलमानों में अपनी पैठ मज़बूत कर देश की राजनीति को कांग्रेस मुक्त करने में भी काम्याब हो जाएगी, लेकिन कई कारणों के चलते ऐसा नहीं हो सका। इनमें एक बड़ी वजह पार्टी के कुछ बयानवीरों द्वारा अपने विवादास्पद बयानों से लगातार मुस्लिमों को टार्गेट करना था।

दूसरी वजह नजमा हेप्तुल्लाह और एमजे अकबर का मुस्लिम समाज से सीधा जुड़ाव न होना रही। एमए नक़वी की जो थोड़ी बहुत मुस्लिम वर्ग में पकड़ थी भी वो कई मौक़ों पर अपने ही समाज के खिलाफ़ दिए गए बयानों के चलते ख़त्म होती गई। इसके अलावा मुसलमानों के साथ होने वाली ज्यादतियों और लिंचिंग के मौक़ों पर पार्टी के अधिकतर मुस्लिम नेताओं की चुप्पी ने भी अहम भूमिका निभाई। दूसरा 2019 में हुए लोक सभा चुनाव और पिछ्ले 8 वर्षों के दौरान विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों, विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, आसाम, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक आदि राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के वोटिंग पैटर्न और चुनाव परिणामों के बाद पार्टी को पूरी तरह समझ आ गया था कि कितने भी प्रयास क्यूं न कर लिये जाएं, उसे कभी मुस्लिम समाज का समर्थन नहीं मिल सकता।

भाजपा को क़रीब से जानने वाले ये भी मानते हैं कि जुलाई 2014 में पार्टी की कमान संभालने के बाद अमित शाह ने साफ़ संकेत दे दिए थे कि अब पार्टी किसी मुस्लिम नेता को न तो टिकट देगी और न ही उन्हें चुनावी मैदान में उतारा जाएगा। इसके दो बड़े उदहारण 2017 के उत्तर प्रदेश विधनसभा चुनाव थे जिसमें पार्टी की तरफ़ से एक भी मुस्लिम नेता को टिकट नहीं दिया गया, उसके बाद 2019 के लोक सभा चुनाव में भी ऐसा ही किया गया (BJP ने 6 मुस्लिम मैदान में उतारे लेकिन हिन्दी बेल्ट में किसी को टिकट नहीं दिया गया), यहां तक कि भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य और राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद शहनाज़ हुसैन तक का टिकट काट कर अपने कार्यकर्ताओं को साफ़ संकेत दे दिया था कि अब देश में मुस्लिम मुक्त राजनीति का दौर शुरु हो चुका है। राजस्थान को छोड़ दें तो भाजपा ने 2014 के बाद से न तो लोक सभा और न ही विधनसभा चुनावों में हिंदी भाषी प्रदेशों में किसी मुस्लिम नेता को टिकट दिया, 2022 आते आते राज्य सभा से भी उनका पत्ता साफ़ कर दिया गया। हालांकि यूपी और बिहार में पार्टी ने विधान परिषद के लिए अपने मुस्लिम नेताओं को ज़रुर मौक़ा दिया।

देश के 16 राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी दलों की सरकारें हैं। फ़िलहाल, बिहार और उत्तर प्रदेश सूबों में ही पार्टी की तरफ़ से दो मंत्री बनाए गए हैं। बिहार में सैयद शहनाज़ हुसैन कैबिनेट मंत्री हैं और यूपी में दानिश आज़ाद अंसारी जो कि पसमांदा वर्ग से आते हैं उन्हें राज्यमंत्री बनाया है, भाजपा और उसके सहयोगी दलों की 16 राज्यों की सरकारों में यूपी, बिहार को छोड दें तो बाक़ी सभी 14 सूबों की सरकारें भी मुस्लिम मुक्त हैं। लेकिन अब सवाल यह है कि केंद्र की सियासत में मुसलमानों का क्या होगा? क्या मुसलमानों को वाकई मोदी मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाएगा?

दरअसल, नक़वी के इस्तीफ़े के बाद मोदी कैबिनेट फ़िलहाल पूरी तरह से मुस्लिम मुक्त हो चुकी है और अल्पसंख्य कार्य मंत्रालय की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी स्मृति ईरानी को सौंप दी गई है। सियासी गलियारों में कई ख़बरें तैर रही हैं, कई राजनैतिक पंडित मानते हैं कि अब किसी मुस्लिम को केंद्र में वज़ीर नहीं बनाया जाएगा। हालांकि कुछ लोग इस बात की भी चर्चा कर रहे हैं कि पीएम मोदी आगामी अक्तूबर या नवंबर में होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार में अपने किसी वफ़ादार, किसी राज्य के राज्यपाल या AMU के VC को मंत्रीमण्डल में जगह दे सकते हैं। पार्टी से जुड़े कुछ लोग “पसमांदा तबक़े” के किसी नेता को मंत्री बनाए जाने के भी क़यास लगा रहे हैं, उत्तर प्रदेश में दानिश अंसारी को मन्त्री बनाये जाने के बाद अब पसमंदा सामाज की भी ख़ूब चर्चा होने लगी है। इसके अलावा कई और ग़ैर-सियासी नाम भी हैं जिनकी चर्चा ज़ोरों पर है।

देश के आम मुसलमान चाहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब भी कैबिनेट में किसी मुस्लिम को जगह दें तो पार्टी नेता या फ़िर पार्टी कार्यकर्ता को ही चुनें, किसी यूनिवर्सिटी के वीसी या किसी ब्यूरोक्रेट को क़तई ये मौक़ा न दिया जाए और न ही ऐसे नेता को जो अक्सर मुसलमानों के ख़िलाफ़ बयानबाज़ी करता रहा हो। मुस्लिम समाज को लगता है कि शिक्षाविद हों या ब्यूरोक्रेट्स, आम तौर पर ये लोग न तो मुसलमानों के असल मुद्दों से वाक़िफ होते हैं, न अपने समाज से सीधा जुड़ाव रखते हैं और न ही इन्हें समाज से कोई सरोकार होता है। समाज का पढ़ा लिखा और बेदार वर्ग मानता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काम करने के अंदाज़ और उनकी भावना को समझ कर उसे आगे बढ़ाने का काम कोई मंझा हुआ नेता ही कर सकता है न कि कोई शिक्षाविद या फ़िर ब्यूरोक्रेट! यूपी से लेकर बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान और दिल्ली में पार्टी के कई ऐसे बेहतरीन नेता हैं जिन्हें कैबिनेट में शामिल किया जा सकता है।

इस सबके अलावा एक अहम बात ये भी है कि प्रधानमंत्री को सिर्फ़ वोट की राजनीति से ही मतलब नहीं है बल्कि, देश के साथ दुनिया की सियासत पर भी गहरी नज़र रखने वाले पीएम ख़ासतौर से उन मुस्लिम मित्र देशों की भावनाओं का ख़्याल भी ज़रूर रखेंगे जो अपने मित्र मोदी को अपने-अपने देश के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित कर चुके हैं। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसी भी सूरत न तो देश की 20 करोड़ आबादी को सियासी तौर पर तन्हा छोड़ उन्हें मायूस करेंगे और न ही वे संविधान की मूल भावना की ख़िलाफ़वर्ज़ी होने देंगे।

(लेखक जाने-माने पत्रकार हैं)

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