शांति का मज़हब क्यों है इस्लाम?

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एक बंधु पूछ रहे हैं कि इतने क़त्लो-ग़ारत के बावजूद इस्लाम शांति का मज़हब क्यों है? इसका सबसे साधारण जवाब है कि इस्लाम ने दुनिया की क्रूरतम नस्लों का परिचय ‘शांति’ और सहअस्तित्व से कराया जिन्हें दूसरा धर्म और क़बीला छोड़िए अपने परिवार तक के लोगों की असहमति बर्दाश्त नहीं थी।

भारतीयों की दिक़्क़त है कि उनका सामना, मंगोल, कुर्द, यज़्द, फारस, अरब, हब्श, यमन, द्रूज़ अवाम से नहीं हुआ। जिन्हें ये बर्बर या लुटेरा बोल रहे हैं वो अपने पुराने मानकों के लिहाज़ से बेहद सभ्य होने के बाद इधर आए। हूण, शक, कुषाण, मंगोल, अरब, बैक्ट्रियन ठीक से भारतीय सीमा में दाख़िल भी न हुए लेकिन जहां तक आए वहां पूरी-पूरी डेमोग्राफी बदल गए। इस्लाम का अहसान ये है कि उसने अपने काल में दुनिया की दो तिहाई आबादी ख़त्म कर देने वाले मंगोल सभ्य कर दिए।

इस्लाम ने ख़ूंरेज़ी में डूबे रहने वाले बैक्ट्रियन, सासानी और फारसी क़बीलों का परिचय शांति, शिक्षा और सहअस्तित्व से करा दिया। अबिसीनिया से अंकारा तक कोहराम मचाए रखने वाले अफ्रीकी क़बाइलियों को इंसानों की तरह रहना सिखा दिया। लड़कियों को ज़िदा दफ्ना देने वाले अरबों को लड़कियां पालने की तमीज़ सिखा दी। आदमियों को उबाल कर खा जाने वाले नाइजीरियाई या ट्यूनिश लोगों में अभी भी वो बेहतर हैं जो मुसलमान हो गए हैं।

इस्लाम ने दिन रात घोड़ों की टापों और टैंकों से रौंदे गए अफग़ानों को भी सब्र करना सिखाया वरना उनके पास तो हिंसात्मक होने के हज़ार कारण हैं। भारत में भी तुलना कर लीजिए। साफ सफाई, रहन सहन, आचरण, और सभ्यता के मामले में मुसलमान दलितों से लाख गुना बेहतर हैं, जबकि 80% उन्हीं के बीच से आए हैं। बाक़ी यह भी जान लीजिए कि मध्यपूर्व, अफ्रीका, और एशिया के जिन प्रांतों की बात हो रही है वहां आदिमकालीन गदा, मुगद्दम, लाठी, डंडा, पत्थर और गाली से लड़ने वाले लोग नहीं रहते। अनादिकाल से वहां युद्ध, बर्बरता, और क़त्लो ग़ारत का ही माहौल रहा है जो इन 1400 वर्षों में घटा है। मंगोल अब सिरों की मीनार नहीं बना रहे हैं और अरब अब इंसानों के कलेजे नहीं चबा रहे हैं। नाइजीरियाई इंसानों को पतीले में उबालने से पहले सोच रहे हैं, कुर्द इंसानों की खाल नहीं उतार रहे हैं। द्रूज़ इंद्रप्रस्थ की सी चीरहरण सभाएं नहीं कर रहे हैं, बग़दाद में इंसानों के ख़ून से गारा बना कर दीवार नहीं चुनी जा रही हैं। ईरानी भी दरिया पार करने के लिए लाशें बिछाकर पुल नहीं बना रहे हैं। और कितनी शांति चाहिए भाई? बाक़ी, घर में पांच लोग हैं तो वह भी समान नहीं हैं।

आप भी दुष्टता, ज़ुल्म या किसी को परेशान करते वक़्त ध्यान रखिए कि सामने वाला ज़रूरी नहीं शांति के पाठ पढ़ा रहा हो, कोई पागल भी हो सकता है। ज़्यादा कोंचने पर शांत गाय भी लात मारती है, अंडे खाए जाने पर चिड़िया बाज़ से भिड़ जाती है और भैंसे भी शेर को सींग पर टांग लेते हैं। समाज में शांति और सद्भाव हमेशा बड़े और संख्यात्मक तौर पर ज़्यादा लोगों की ज़िम्मेदारी होती है। अगर वही उन्मादी होने लगेंगे तो शांति, सद्भाव की बात बेमानी हो जाएगी।

(लेखक जाने-माने पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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