राहुल को क्यों बनानी पड़ी मीडिया की नई टीम?

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पिछले 8 साल से कांग्रेस एक ही बात कह रही है कि हम अपनी अच्छी योजनाओं का भी प्रचार नहीं कर पाए। हम प्रचार के मामले में कमजोर हैं। मगर अभी तक वे उन कारणों को नहीं ढूंढ पाए जिनकी वजह से उनकी बात जनता तक नहीं पहुंची या अभी भी नहीं पहुंच रही। आठ साल पहले तो सरकार थी। एक से एक नामी सूचना प्रसारण मंत्री रहे। प्रधानमंत्री के तीन तीन मीडिया एडवाइजर रहे।

सारे सूचना प्रसारण मंत्री जयपाल रेड्डी, अंबिका सोनी, आनंद शर्मा, मनीष तिवारी और मनमोहन सिंह के प्रेस एडवाइजर संजय बारू, हरीश खरे, पंकज पचौरी सब खुद को एक से एक बड़ा महारथी समझते रहे। मगर रिजल्ट के मामले में सब जीरो। और यह हम नहीं कह रहे। राहुल गांधी से लेकर सब बड़े कांग्रेसी नेता 8 साल से कह रहे हैं कि हमारे काम तो अच्छे थे मगर उन्हें हम जनता को बता नहीं पाए। इसमें अभी हमने कांग्रेस के मीडिया विभाग का जिक्र नहीं किया। उसमें भी बड़े बड़े नाम रहे। मगर वह भी अपनी सरकार की सफलताओं को सामने लाने में असफल रहे। लेकिन जब सरकार थी तो थोड़ा मार्जन उसे यह मिल जाता है कि बेसिक रूप से यह काम सरकार का था। लेकिन पिछले 8 साल में कांग्रेस की बात रखने और मुख्य विपक्ष के तौर पर उसके संघर्ष को लोगों तक पहुंचाने का काम तो पार्टी के मीडिया डिपार्टमेंट का ही था। 

राहुल ने इसके लिए मीडिया डिपार्टमेंट को पूरी सुविधाएं दे रखी थीं। मीडिया इंचार्ज और उसे साथ के लोगों के लिए चार्टेड प्लेन तक उपल्ब्ध रहता था। जबकि कांग्रेस में सब जानते हैं कि राहुल और प्रियंका ही नहीं सोनिया गांधी भी जहां नियमित हवाई सेवा होती है वहां रुटिन फ्लाइट से जाती हैं। लेकिन राहुल जिस पर विश्वास करते हैं उसके बारे में तब तक नहीं सुनते जब तक कि उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं पार्टी को बड़ा नुकसान नहीं पहुंचाने लगें। हरियाणा में अपने विश्वासपात्र अजय माकन के हारने के बाद राहुल की आंखें खुलीं और उन्होंने मीडिया में बदलाव किया। बात तो मीडिया की हो रही है मगर हरियाणा में राहुल को पता नहीं कौन सलाह दे रहा था कि उन्होंने शुरू से वहां गलत घोड़ों पर दांव लगाए। पहले अशोक तंवर पर, फिर रणदीप सुरजेवाला पर, फिर कुलदीप बिश्नोई पर। जिसका नतीजा यह हुआ कि जमीन पर अपनी पकड़ रखने वाले भूपेन्द्र हुड्डा और उनमें लगातार अविश्वास बढ़ता चला गया। भाजपा का सबसे कमजोर मुख्यमंत्री हरियाणा में है। मुख्यमंत्री सम्मानित पद होता है। उसके लिए कुछ कहना अच्छी बात नहीं है मगर भाजपा वाले ही उन्हें दूसरा चुनाव जीतने से पहले तक उपहासजनक उपमाओं से पुकारते थे। लेकिन 2019 में दूसरी बार कांग्रेस ने आखिरी आखिरी तक वहां नेतृत्व का कन्फ्यूजन कायम रखके खट्टर को जीता दिया। ऐसे विधानसभा चुनावों की लिस्ट लंबी है जहां कांग्रेस अपनी ही गलतियों से हारी है।

राहुल की मेहनत में कोई शक नहीं मगर चुनाव केवल मेहनत से ही नहीं जीते जाते। चुनाव प्रबंध, जमीनी नेताओं की पहचान, हवाहवाई नेताओं को प्रोत्साहन नहीं देना और आप नेता हो किसी के साथ भी व्यक्तिगत मन मुटाव नहीं रखना जैसी बातें बहुत जरूरी हैं।

राहुल लगातार संघर्ष कर रहे हैं। उनकी हिम्मत और बेखौफी की जितनी तारीफ की जाए कम है मगर इससे माहौल नहीं बदलेगा। माहौल बदलेगा दो तीन जीत से। अभी पंजाब, उत्तराखंड और गोवा भी अपनी गलतियों से हारे। दो दो सीडब्ल्यूसी कर लीं, चिंतन शिविर कर लिया मगर अभी तक किसी को नहीं मालूम कि यह जीते हुए राज्य कांग्रेस क्यों हारी।

अभी कहा कि केवल राहुल के संघर्ष से चुनावी जीत नहीं मिल रही तो कांग्रेस में कुछ ऐसे दिमाग होना चाहिए जो सोचें, बताएं कि गलती कहां हो रही है। किसान आंदोलन में पूरे पंजाब के किसान थे। उस आंदोलन को सबसे ज्यादा समर्थन राहुल से मिला। वहां सरकार भी कांग्रेस की थी। मुख्य विपक्षी दल अकाली और भाजपा का गठबंधन टूट गया था। फिर भी कांग्रेस नहीं जीती! और जीता कौन आम आदमी पार्टी। जिसके जीतने के बारे में किसी को कल्पना भी नहीं थी। तो इसका राजनीतिक मतलब क्या हुआ कि वहां आप नहीं जीती, कांग्रेस हारी है। मतलब कांग्रेस का हारना तय था। जीत कोई भी जाता। कांग्रेस के लिए यह बहुत खतरनाक बात है। और उससे भी खतरनाक बात यह है कि कांग्रेस के पास अभी तक हारने का कारण एक, कारण दो और कारण तीन स्पष्ट और कागज पर सामने नहीं हैं। अभी दो चुनाव हैं गुजरात और हिमाचल। दोनों जगह भाजपा भारी एन्टी इनक्मबेन्सी से जूझ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लगातार दोनों जगह दौरे पर दौर हो रहे हैं। उन्हें मालूम है कि हालत पतली है। मगर सिर्फ इसी वजह से कांग्रेस वहां नहीं जीत जाएगी। याद रहे पंजाब की तरह यहां भी आप मौजूद है। और वह सिर्फ कांग्रेस से मुकाबला कर रही है। इसी में वह दिल्ली में जीती, पंजाब में जीती। भाजपा का मुकाबला कांग्रेस नहीं हम कर सकते हैं। यह मैसेज पहुंचाने में वह कामयाब हो रही है। और जहां यह पर्सपेक्टिव बना वहां कांग्रेस गई।

कांग्रेस का नया प्रचार तंत्र बनने लगा है। दो बड़ी नियुक्तियां हुईं। जयराम रमेश ओवरआल कम्यूनिकेशन हेड और पवन खेड़ा मीडिया चेयरमेन। कुछ और होंगी। निचले स्तर पर भी बदले जाने की जरूरत है। राहुल के खिलाफ माहौल यहीं से बनता था। कैसा आश्चर्य है कांग्रेस में कि उसके मीडिया डिपार्टमेंट में ही राहुल को पप्पू कहलवाने वाले लोग मौजूद थे। मीडिया का सैकेट्री टाम वडक्कन भाजपा में चला गया। मगर जब तक रहा कभी राहुल के खिलाफ नहीं बोला। भाजपा में कोई सोच सकता है कि वहां उड़ने वाली चिड़िया भी मोदी के खिलाफ बोल सकती है। यहां तो राहुल क्या सोनिया और प्रियंका महिलाएं हैं उनके बारे में भी अभद्र बोलने वालों को यहां रखा गया।

मीडिया की नई टीम के लिए काम बहुत चुनौतिपूर्ण है। पुरानी गंदगी साफ करके नया रास्ता बनाना पड़ेगा। काम करने वालों को, मेहनत करने वालों को लोगों को सामने लाना होगा। कांग्रेस की मीडिया टीम का मुकाबला भाजपा की प्रोफेशनल मीडिया टीम से है। जिसके हेड और दूसरे लोग चुपचाप काम करते हैं। कभी अनिल बलूनी को रोज रोज प्रेस कान्फ्रेंस करते देखा उनके किसी सहयोगी को माइक हाथ में लेकर अमित शाह और नड्डा का परिचय देते देखा। जिस टाम वडक्कन का उपर जिक्र किया उसे कभी डायस पर बैठा देखा। मीडिया डिपार्टमेंट का काम पार्टी का पक्ष सामने रखना होता है अपनी व्यक्तिगत शक्ल दिखाना नहीं। पत्रकारों में गुट बनाते बनाते यह लोग इस सीमा तक चले गए कि अपने सहयोगियों में भी गुटबाजी पैदा कर दी। अपनी चुटीली बातों से टीवी में एंकर और बीजेपी प्रवक्ता को निरुत्तर कर देने वालों को यहां खतरे के रूप देखा गया। जैसे वह उनकी कुर्सी छीन लेगा। सबको प्रमोशन दिए गए मगर किसी को इसलिए नहीं कि उसकी परफार्मेंस ज्यादा अच्छी थी! बड़े चैनलों पर अच्छे पैनलिस्टों को न भेजने से किस का नुकसान हुआ? कांग्रेस का ही। और किसी का नहीं। जो भी अपनी मेहनत से थोड़ा उभरा उसे दबा दिया गया।

मीडिया को जीत का मार्ग प्रशस्त करना होता है। रोडमेप बनाना होता है। बिना जीत के कुछ नहीं होता। इन्होंने तो देखा भी नहीं था कि आठ साल पहले भाजपा की मीडिया टीम ने कैसे काम किया था। जयराम रमेश के पास अनुभव के साथ पढ़ाई लिखाई भी है। खेड़ा भी अपनी अध्ययनशीलता और मेहनत से यहां तक आए हैं। इस नई टीम को पूरी दुनिया की मीडिया स्टेट्रेजी की जानकारी होगी। यह भी कि भाषा का महत्व कितना है। कांग्रेस को हिन्दी भाषी क्षेत्र में ही अपनी और अपने नेता राहुल की छवि दुरुस्त करना है। हिन्दी के अच्छे प्रवक्ताओं को आगे लाना होगा। ट्रेनिंग की व्यवस्था करना होगी। प्रवक्ताओं का आखिरी वर्कशाप हुए एक दशक से ज्यादा हो गया। टीवी के डिबेटों के दौर में व्यक्तिगत पंसद, नापंसदगी के आधार पर प्रवक्ता, पैनलिस्ट नहीं भेजे जा सकते। वे विषय के अनुरूप होना चाहिए।

कांग्रेस के यह नए पदाधिकारी 2024 लोकसभा चुनाव के लिए हैं। राहुल ने नए भरोसे के साथ चुने हैं। इन्हें नई टीम बनाकर राहुल के भरोसे पर पूरा उतरना है। नहीं तो पिछले 8 साल में राहुल का भरोसा उनके करीब रहे लोगों ने ही ज्यादा तोड़ा है। उनसे राज्यसभा, पद सब ले लिए मगर उनकी छवि चमकाने के बदले अपनी ही चमका कर चले गए।