टाइम 100 सम्मेलन में चन्द्रशेखर आज़ाद क्यों नहीं जा पाए?

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दुनिया के 100 प्रभावशाली लोगों को सुनने के लिए बीते 7 जून को न्यू यॉर्क में लोग जमा हुए थे। शहर के जैज़ एट लिंकन सेंटर में आयोजित इस कार्यक्रम में भारत से आने वाले एक मेहमान की कुर्सी ख़ाली थी। नाम है चन्द्रशेख़र आज़ाद। टाइम 100 कम्यूनिटी के नाम से कार्यक्रम के आयोजक का नाम है- टाइम मैगज़ीन।

भारत से अगर चन्द्रशेखर शामिल होते तो ज़ाहिर है कि वह भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार, दलित- ट्राइबल, पिछड़ो और अल्पसंख्यको के उत्पीड़न पर आवाज़ उठाते। इस परिस्थिति से निपटने के लिए भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार को सबसे बेहतर उपाय यही लगा कि वह चन्द्रशेखर को जाने ही ना दे। अंतिम समय तक चन्द्रशेखर कोशिश करते रहे लेकिन कोई उन्हें पासपोर्ट ही जारी नहीं किया गया और आख़िरकार वह नहीं जा सके।

टाइम मैगज़ीन की तरफ़ से प्राप्त ईमेल में चन्द्रशेखर को लिखा गया कि ‘अप्रैल 2019 में टाइम मैगज़ीन ने एक उत्साहवर्धक और महत्वपूर्ण अध्याय शुरू किया जिसमें पहली बार टाइम सम्मेलन का आयोजन है। इस शक्तिशाली आयोजन ने टाइम 100 कम्यूनिटी को ऐसे क़रीब किया जो पहले नहीं हुआ।… जैसा आप जानते हैं इसे टाइम 100 का नाम दिया जाना चाहिए। हम ऐसे लोगों को सुनना चाहते हैं जिनके आइडिया, आविष्कार और खोज ने दुनिया को बदल दिया। यह सम्मेलन ऐसे अर्थपूर्ण कार्यो की चर्चा करना चाहता है जैसे आप कर रहे हैं। आप जैसे प्रभावशाली लोगों को साथ बैठकर स्वाभाविक चर्चा के लिए आमंत्रित करती है जो बहुत समयानुकूल हैं और वैश्विक मुद्दों पर कार्य कर रहे हैं।‘

टाइम मैगज़ीन के ‘टाइम 100’ के निदेशक और कार्यकारी सम्पादक डैन मैक्साई की तरफ़ से चन्द्रशेखर को भेजे गए निमंत्रण में लिखा गया कि दुनिया के 100 प्रभावशाली लोगों को सुनने के लिए जून में हम इंताज़ार करेंगे।

पीड़ितों की आवाज़ उठाने वाले चन्द्रशेखर आज़ाद को दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित मैगज़ीन ‘टाइम’ दुनिया के 100 सबसे अधिक प्रभावशाली लोगों में मानता है लेकिन उन्हें इस सम्मेलन में रोकने के लिए केन्द्र सरकार ने सबसे आसान फॉर्मूला अपनाया। चन्द्रशेखर के पास पासपोर्ट नहीं है और उन्होंने पासपोर्ट के लिए पिछले एक साल से आवेदन किया हुआ है। पुलिस ने जब मुक़दमों को लेकर अपनी रिपोर्ट दी तो ज़ाहिर है उन्हें पासपोर्ट जारी नहीं किया जाता। उन्होंने अदालत में भी शरण ली लेकिन पासपोर्ट जारी होने को लेकर उन्हें कोई राहत नहीं मिली। जब पासपोर्ट ही नहीं होगा तो वह किस तरह देश से बाहर जाकर सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं, समझा जा सकता है। बहाना तो उन पर चल रहे मुक़दमे को बनाया गया लेकिन भारत की इस बहुजन आवाज़ को दबाकर हम समझ सकते हैं कि किस तरह दुनिया के पटल पर आ रहे एक युवा चेहरे को रोका गया जो लगातार दलित, आदिवासी, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की आवाज़ को उठाते रहे हैं।

TIME मैग्ज़ीन की ओर से प्राप्त निमंत्रण

चंद्रशेखर आज़ाद अभी तक सिर्फ ऑनलाइन माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में शिरकत करते रहे हैं। बीते वर्ष उन्होंने संयुक्त राष्ट्र द्वारा आयोजित एक कांफ्रेंस में किसान आंदोलन और कृषि क़ानूनों व विवादित नागरिकता क़ानून (सीएए) के द्वारा भाजपा सरकार द्वारा भारतीय नागरिकों के अधिकारों को कुचलने पर अपना विरोध दर्ज कराया था। चन्द्रशेखर आज़ाद से जब हमने बात की तो उन्होंने बताया कि वह भारत में लोकतंत्र और बहुजनों के साथ साथ अल्पसंख्यकों की राजनीतिक और सामाजिक बहिष्कार और उत्पीड़न पर बोलने वाले थे। वह मीडिया में प्रभुत्व वर्ग के एकाधिकार और मीडिया के रास्ते उत्पीड़न को न्यायसंगत बताने वाले ‘रेडियो रवांडा’ पर चर्चा करने वाले थे।

सितम्बर 2021 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हवाले से दी गई एक ख़बर में बताया गया कि कोविड जैसी महामारी के समय अपराध में दलितों और आदिवासियों के साथ उत्पीड़न 9.3%  बढ़ गया। वर्ष 2020 में कुल अपराध 50,291 पंजीबद्ध हुए जिसमें अकेले दलितों और जनजातियों के विरुद्ध अपराधों की संख्या 8272 है। भारत में हर 10 मिनट में दलित या ट्राइबल कहीं न कहीं अपराध का शिकार होता रहता है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 1990-2020 की ‘क्राइम इन इंडिया’ की 30 वर्षीय रिपोर्ट के हवाले से छपी ख़बरों में बताया गया कि पिछले 30 सालों में दलितों और ट्राइबल के विरुद्ध अपराधों में 300 प्रतिशत का उछाल आया है। इन आंकड़ों का आंकलन तो हम तब लगा सकते हैं जब यह अपराध पुलिस थानों में रिपोर्ट हुए हैं। क्या हम नहीं जानते कि भारत के पुलिस थाने जाति से चलते हैं और दलित, ट्राइबल या अल्पसंख्यक के विरुद्ध कई अपराध थाने रिपोर्ट ही नहीं करते और कई बार थाने ही अपराध को अंजाम देते हैं।

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पिछले आठ सालों में मीडिया के इस्लामोफोब होने के नतीजे में मुसलमानों के विरुद्ध बन रहे माहौल और अपराध को किसी मिसाल की ज़रूरत नहीं। रवांडा के रेडियो से जिस तरह नरसंहार के लिए लोगों को उकसाया जाता, यही काम भारत का टेलीविज़न और अख़बार लगातार कर रहा है। जो कसर बाक़ी रह गई है वह सोशल मीडिया पर प्रशिक्षित ट्रॉल आर्मी से करवाया जाता है। लगातार मुसलमानों, दलित और ट्राइबल के विरुद्ध मीडिया का बहुलवादी मॉडल ज़हर उगलता रहता है। कौन नहीं जानता कि जिस मुखरता से चन्द्रशेखर आज़ाद भारत के इस सबसे पीड़ित वर्ग की आवाज़ उठाते रहते हैं, वह अगर अन्तरराष्ट्रीय पटल पर बैठेंगे तब भी वह बात कहेंगे। चन्द्रशेखर अपनी बात को लेकर इतने सच्चे हैं कि दलितों की ख़ुद को सच्ची मसीहा बताने वाली मायावती भी कई बार उनकी आलोचना कर चुकी है।

आज जब चन्द्रशेखर दुनिया के सबसे 100 प्रभावशाली लोगों में माने जा रहे हैं, केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार उनके पासपोर्ट को रोककर समझ रही है, वह भारत से उठने वाली इंसाफ़ की आवाज़ को दबा लेगी, मगर ऐसा होगा नहीं। भारत की करोड़ो महिलाओं, मजदूर, किसानों के जीवन मे बदलवा नही होता वो डटे रहेंगे। भारत में पिछड़े वर्गों की मुक्ति के लिये जाति जनगणना कितनी जरूरी है ये पूरी दुनिया को बताना चाहते है। पिछले कुछ वर्षों में सत्ताधारी दल के विघटनकारी ऐजेंडे रफ्तार पकड़ी है। कारोबार न होने से परेशान व्यापारियों, किसानों, नौकरी मांगते युवाओं को खलनायक की तरह पेश करने का षड़यंत्र किया गया है। इस षड़यंत्र को सफल नहीं होने दिया जाएगा। चन्द्र शेखर कहते है ये साजिशें जारी रहेगी इस से भी बड़ी साजिशें होंगी लेकिन मैं इन साजिशों के आगे झुकने वाला नही हूँ। जब तक भारत मे संविधान के अनुसार वंचित वर्गों को उनके अधिकार व सम्मान का जीवन नही मिलता मेरा संघर्ष जारी रहेगा।

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