जीते कोई भी हारती तो जनता ही है

चुनाव के नतीजे आने के बाद कुछ लोग खुश हैं, कुछ लोग दुखी हैं, कुछ लोग हैरान हैं और कुछ लोग निराश. लेकिन दुनिया कभी भी ठहरती नहीं है, सृष्टि में बस एक ही चीज़ शाश्वत है और वो है बदलाव. मानव समाज में आने वाले बदलाव एक तो वो होते हैं वो जो स्वाभाविक रूप से धीरे धीरे आते हैं दूसरे वो होते हैं जिनके लिए विशेष प्रयास किये जाते हैं. इसी नज़रिए से चुनाव के नतीजों को समझने की कोशिश करते हैं. पहले वो प्रश्न जिन पर हमें सोचना चाहिए-

  1. क्या चुनाव में हार जीत के फैसलों में मशीन का कोई योगदान है या हो सकता है?
  2. विपक्ष के सामने जन सरोकार के मुद्दों का ढेर लगा हुआ है फिर भी वो भाजपा के सामने मज़बूत विकल्प क्यों नहीं बन पा रहे हैं?
  3. क्या देश की जनता सच में इतनी दृष्टिहीन है कि उसे अपने सामने खड़ी मुसीबतें नज़र नहीं आ रही हैं?
  4. देश की सियासी फ़िज़ा को देखते हुए एक नागरिक के रूप में हमारे पास क्या विकल्प है?

वोटिंग मशीन को लेकर बहुत सी बातें की जा रही हैं, कांग्रेस के दौरे हुकूमत में जब ये मशीन वजूद में आयी थी तब सबसे पहले भाजपा और आरएसएस की पृष्ठिभूमि के लोगों ने इसका विरोध किया था, यहाँ तक कि इस पर ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क’ जैसी किताब भी लिखी गयी. भारत में अगर लोकतान्त्रिक मानस मज़बूत होता तो अब तक इस मशीन को त्याग दिया गया होता. लेकिन ये मशीन तमाम विरोधों के बावजूद अपना काम कर रही हैं. इस मशीन का इतिहास और इसके इर्द गिर्द छाये घने रहस्य भी इसे कम से कम विवादित तो बनाते ही हैं और विवादित मशीन को लगातार वोटिंग के लिए इस्तेमाल करना भारत में कमज़ोर लोकतान्त्रिक मानस और सत्ता के नियत का द्योतक है.

जो किसान लगातार सरकार का विरोध करते रहे, उनके इलाकों में भी भाजपा का जीतना चुनाव नतीजों में शक करने की वजह देता है. चुनावपूर्व गतिविधियाँ भी चुनाव के परिणामों पर शक करने की वजह देती हैं. सत्तापक्ष और विपक्ष के चुनाव अभियानों में आने वाली भीड़ को वोटों में बदलना चाहिए था, अगर ऐसा होता तो नतीजे कुछ और होते. यहाँ एक बात अक्सर कही जाती है कि भीड़ वोट में नहीं बदलती, लेकिन ऐसा तब होता है जब भीड़ किसी फ़िल्मी सितारे के लिए आती है, यहाँ ऐसी बात नहीं थी, इसलिए चुनाव नतीजे शक के दायरे में तो हैं.

एक नागरिक के रूप में हम लोग वोटिंग मशीन का चाहे जितना विरोध कर लें लेकिन सच ये भी है कि तमाम संसदीय दल इस पर खामोश हैं, भले ही सत्तापक्ष ने संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बना दिया है फिर भी विपक्ष अगर वैलेट पेपर से चुनाव कराने के लिए आन्दोलन करता तो उनकी बात सुनने के लिए सत्तापक्ष को बाध्य होना पड़ता.

भारतीय जनता पार्टी ने जनता से किये गये अपने तमाम वादे पूरे नहीं किये हैं, राम मंदिर बनवाने या धारा 370 ख़त्म करने से कम से कम आवाम की ज़िन्दगी पर कोई असर नहीं पड़ा है और महज़ इसके आधार पर भारतीय जनता पार्टी एक के बाद एक जीत दर्ज़ करती चली जाए, ये यकीन के काबिल नहीं है. इसलिए ये समझना कि भारतीय जनता पार्टी की ताक़त और कमज़ोरी क्या है और विपक्ष ने इसके आधार पर रणनीति कैसे बनाई है, के आधार पर ही भाजपा की लगातार होती जीत को समझा जा सकेगा. भारतीय जतना पार्टी की सियासत से आरएसएस को अगर माइनस कर दिया जाये तो भाजपा और दूसरी पार्टियों में कोई अंतर नहीं रह जायेगा. यानि भाजपा की असली ताकत आरएसएस है. आरएसएस ने देश भर में अपने स्कूल बनाये और उनके स्कूलों में पढ़ कर निकले लोग आज देश भर में सरकारी पदों पर हैं, इनमें मामूली क्लर्क से लेकर प्रशासनिक अधिकारी तक सभी हैं. इनकी जाति कुछ भी हो, आर्थिक स्थिति कुछ भी हो लेकिन ये आरएसएस के हिंदुत्व की विचारधारा को जीने वाले लोग हैं, ये कहीं भी हों इनकी पक्षधरता आरएसएस के प्रति रहती है. इनके ज़रिये आरएसएस न सिर्फ़ शासन-प्रशासन बल्कि समाज के कई दूसरे क्षेत्रों को भी नियंत्रित करता है. इस ताक़त की तोड़ किसी भी सियासी दल के पास नहीं है.

देश की मीडिया पर इस वक़्त इनका पूरी तरह कब्ज़ा है, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में आज वही दिखता है जिससे भाजपा के राजनितिक नरेटिव को ताक़त मिलती है, दूसरे विपक्ष कुछ भी करे मीडिया का उसे कोई सपोर्ट हासिल नहीं है. सोशल मीडिया में अभी भी विपक्ष के करने के लिए बड़ा स्कोप है लेकिन यहाँ विपक्ष बहुत कमज़ोर दिखाई देता है. यहाँ भी वही बहस चल पाती है जिसे भाजपा का आई टी चलाना चाहता है. इस तरह मीडिया के समर्थन के मामले में भी विपक्ष बहुत कमज़ोर है.  

मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिकता के मुद्दे पर मीडिया के सहयोग से भाजपा ने अपनी स्थति बहुत मज़बूत कर ली है, जनमानस में मुस्लिम विरोधी मानसिकता को बढ़ाने के लिए वो कोई भी मौका नहीं छोड़ते, यहाँ तक कि कोरोना जैसी महामारी को भी उन्होंने मुसलमानों के सर मढ़ दिया. देखा जाये तो भाजपा की ताक़त यही साम्प्रदायिकता है. लेकिन किसी भी विपक्षी दल ने मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिकता पर स्पष्ट स्टैंड नहीं लिया. यहाँ तक कि राहुल गाँधी ने राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय मुद्दों पर लगातार बात की और बड़े मज़बूती से उन्होंने सरकार को घेरा लेकिन मुसलमान विरोधी साम्प्रदायिकता पर वो खुल कर कुछ बोल नहीं पाए. प्रियंका गाँधी ने एक बार धर्म और जाति की सियासत पर जनता से शिकायत जरूर की लेकिन यहाँ भी वो मुसलमानों के दुःख में खड़ी होती हुई नज़र नहीं आयीं.

इस स्थिति की विवेचना बहुत ज़रूरी है. अगर ये सच है कि देश की बहुसंख्यक आबादी मुसलमानों से नफ़रत करती है और वो मुसलमानों के मुद्दों पर बात करने से नाराज़ हो सकती है तो ये भी स्पष्ट है कि ऐसी जनता उसी को वोट देगी जो मुस्लिम विरोधी राजनीति करेगा. यहाँ भी विपक्ष के पास पाने के लिए कुछ भी नहीं है भले ही वो मुसलमानों को सियासी अछूत मानकर साइडलाइन करती रहे. हाँ, विपक्ष अगर हार जीत को नज़रंदाज़ करके जनमानस को बदलने के इरादे के साथ सियासत करे तो बहुत मुमकिन है कि महज़ दस सालों में मीडिया के ज़रिये फैलाये गये ज़हर का असर कम हो जाये, लेकिन सिद्धांतहीन विपक्ष इतने त्याग के लिए तैयार नहीं है.

आज भाजपा विरोधी दलों को जो वोट मिल रहा है, वो इसलिए नहीं कि उन्होंने कुछ अच्छा किया है या उनसे किसी अच्छे की उम्मीद है, बल्कि इसलिए कि जो लोग भाजपा जैसी पार्टी को सियासत से बेदख़ल करना चाहते हैं उनके पास इनके अलावा और कोई विकल्प नहीं है. यहाँ एक और पहलू पर गौर करने की ज़रूरत है कि जो लोग भाजपा से नाराज़ होते हैं उनके दिलों में भी मुसलमानों के लिए फैलाई गयी नफ़रत ने घर बनाया हुआ है, इसलिए नाराज़गी के बावजूद वो ज़रा सी कोशिश में भाजपा के साथ फिर से खड़े हो जाते हैं. भाजपा से कांग्रेस और कांग्रेस से भाजपा में नेताओं का आवागमन भी इसकी पुष्टि करता है. पिछले दिनों आपने देखा कि जो लोग नोकरी माँगते हुए पीटे गये या जिन्होंने क्रोना में सरकारी लापरवाही में अपने परिजन खोये थे, उन्होंने ऑनकैमरा भाजपा के समर्थन में आवाज़ बुलंद की. ऐसे नौजवान शोध के लिए बेहतरीन सब्जेक्ट हैं, ये जानने की कोशिश की जानी चाहिए कि जब उनके जीवन को मुश्किलों ने घेर रखा है तब भी एक ऐसी सियासी पार्टी के साथ वो क्यों खड़े हैं जो उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं कर रही है!

जनता एक ऐसी पार्टी का साथ क्यों दे रही है जो उसके जीवन को लगातार दुरूह बना रही है? इस सवाल का कोई ठीक ठीक उत्तर ढूढ़ना बहुत मुश्किल है. एक तो ये कि भारतीय समाज स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के मूल्यों को न तो समझता है और न ही जीता है, इसके विपरीत असमानता और अन्याय पर आधारित जाति व्यवस्था को वो सदियों से जीता आ रहा है, इस व्यवस्था से जितनी भी दिक्कत हो, लेकिन इससे निकलने की कोशिश कहीं भी नज़र नहीं आती. सवर्ण जातियां इस व्यवस्था की लाभार्थी हैं, वो इसे सर माथे लगायें तो समझ में आता है, लेकिन शूद्र जातियां जो इस व्यवस्था में पीड़ित हैं, वो भी इससे बाहर निकलना नहीं चाहतीं. अन्यायपूर्ण जाति व्यवस्था में पगे हुए भारतीय समाज के सामने जब मुसलमान नामक दुश्मन खड़ा कर दिया गया तो उसे भी उन्होंने बिना गंभीर सोच विचार के अपना लिया. मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक दंगों में दलितों और पिछड़ों की सहभागिता इस पहलु पर बहुत कुछ कहती है.

हमारे देश की बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जिसे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि सरकार अरबों रूपये के पी एम् केयर फंड का क्या कर रही है या अरबों रूपये का क़र्ज़ किसके लिए ले रही है या पेट्रोल और डीज़ल पर लिए जाने वाले भारी टैक्स से क्या कर रही है? यही नहीं जो पढ़े लिखे इन पर लम्बी लम्बी विवेचनाएँ लिखते हैं उनकी भी आम आदमी की ज़िन्दगी में कोई पहुँच नहीं है. लेकिन पांच किलों मिलने वाले अनाज़ का उनके जीवन से सीधा सम्बन्ध हैं. इस गैप को भरना विपक्षी दलों का काम था जो वो नहीं कर पाए.

अब एक और पहलु को देखिये, क्या विपक्ष ने कोई ऐसा प्रोग्राम दिया जिससे आप अपने जीवन को बेहतर करने के लिए कोई उम्मीद बाँध पाते? ज़वाब है नहीं. क्या विपक्ष ने कहा कि कोरोना जैसी आपदा अगर फिर आयी तो वो उससे कैसे निपटेंगे, ज़वाब है नहीं. रोज़गार को लेकर राहुल गाँधी जी ने खूब बातें की लेकिन साम्प्रदायिकता में पगा हुआ नौजवान बेरोज़गार रहकर भी भाजपा के साथ जाने के लिए तैयार है लेकिन विपक्ष नौजवानों के इस मनोविज्ञान को समझने के लिए तैयार नहीं है.

थोड़ी सी बात इस पर कर लेते हैं कि जागरूक नागरिक के तौर पर हमारे पास क्या विकल्प है? सबसे पहले तो ये समझना होगा कि भारत में ‘सेन्स ऑफ़ जस्टिस’ बहुत कमज़ोर है और इसके मूल में है जाति व्यवस्था. भले ही हम पूंजीवादी व्यवस्था में जी रहे हैं लेकिन सामंती समाज के मूल्य हमारे जीवन में बहुत गहरे बैठे हुए हैं. पूँजीवाद के फासीवाद के घर में में दाख़िले के बाद भी ये मूल्य बहुत कमज़ोर नहीं पड़े हैं. इन मूल्यों के होते हुए न्यायपूर्ण समाज के लिए लोगों को गोलबंद करना बहुत कठिन है. दूसरे, भाजपा की तमाम नाकामियों के बाद भी विपक्ष भाजपा के ख़िलाफ़ कोई ऐसा राजनीतिक प्रोग्राम नहीं रख पाया है जिससे लोग विपक्ष के साथ अपनी उम्मीदों को जोड़ पायें. विपक्ष के पास हिन्दू राष्ट्र का रहस्यमय सपना है और मुसलमान नामक काल्पनिक दुश्मन जिससे वो लोगों को डरा सकते हैं, लेकिन इन हवाई मुद्दों के काट के लिए विपक्ष के पास काल्पनिक या वास्तविक कोई सियासत नहीं है. इससे एक बात साफ़ है कि विपक्ष ऐसा कुछ करने की हैसियत में है ही नही. यानि कल को अगर कांग्रेस केंद्र की सत्ता में आ जाये तो भी ऐसा कुछ नहीं होने वाला जिससे हमारी और आपकी ज़िन्दगी कुछ आसान हो जाये.

आज के समाज की तमाम समस्याओं का समाधान वामपंथी दलों की सियासत में है, लेकिन संसदीय वामपंथ जनता से तो कटा हुआ है ही, इन्होनें भी भारतीय समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था को एड्रेस करने की कोशिश नहीं की, यहाँ मान लिया गया है कि जब उनके सपनो का समाज बनेगा तब जाति व्यवस्था ख़त्म हो जाएगी, लेकिन वो इस पर नहीं सोच पा रहे हैं कि जाति व्यवस्था खुद उनके सपनों के रास्ते में बड़ा रोड़ा है. कुल मिलाकर संसदीय वामपंथ जीवन से कटता जा रहा है और एक शानदार सियासी सोच के बावजूद अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है.

मार्क्सवादी दर्शन एक ऐसी व्यवस्था प्रस्तावित करता है जिसमें आज की हर चुनौती का समाधान है, लेकिन एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में इसे जनमानस तक ले जाने वाले लोग बहुत कमज़ोर हैं. जो लोग हज़ार गुटों में बंटकर वामपंथी सियासत करते हैं उन्हें इस पर गंभीरता से सोचना चाहिए क्योंकि ये बात बिलकुल साफ़ है कि संसदीय सियासत में अब उतनी ताब नहीं रही कि ये जनता की बुनियादी ज़रूरतों को भी पूरा कर सके. लेख पर आपकी टिप्पणियाँ आमंत्रित हैं !

Dr. Salman Arshad

डॉ. सलमान अरशद स्वतंत्र पत्रकार एंव लेखक हैं। लखनऊ के रहने वाले हैं, और पटना में रहते हैं। उन्होंने दर्शन शास्त्र में पीएचडी की है।

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