डबल इंजन से हिन्दुओं को कहां पहुंचा दिया?

संजय कुमार सिंह

अयोध्या में भव्य राममंदिर और कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने के आश्वासन पर सत्ता में आई सरकार और उसके समर्थकों ने हिन्दू-मुसलमान तो खूब किया पर हिन्दुओं के लिए क्या किया यह सोचने वाला विषय है। वैसे तो भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश में हिन्दू-मुसलमान करना गैरकानूनी है पर सात साल के ‘अच्छे दिन’ और कुछ राज्यों में डबल इंजन वाली सरकारों का ही नतीजा है कि नरसंहार जैसी अपीलों पर भी कार्रवाई करने वाले अफसरों को सोचना पड़ता है। मंच से, “देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को” जैसे नारे में गोली मारने का अंग्रेजी अनुवाद भले “फक-ऑफ” कर दिया गया हो और चिन्मयानंदों, आसारामों तथा सेंगरों के समर्थकों ने इसपर कार्रवाई की जरूरत ही नहीं समझी हो। पर विरोधियों को या ‘घोषित’ गद्दारों को “सालों” कहने के लिए कार्रवाई तो होनी ही चाहिए। कार्रवाई तो उन ‘गद्दारों’ के खिलाफ भी होनी चाहिए जिन्हें गोली मारने की बात करने वाला सांसद से केंद्रीय मंत्री बना दिया गया। अभी मुद्दा रविशंकर प्रसाद और हटाए गए दूसरे मंत्रियों की योग्यता या अयोग्यता और उनकी जगह मंत्री बनाए गए नेता की योग्यता की चर्चा करना नहीं है।

वह इसलिए कि एक जनवरी को जम्मू में हुआ हादसा सरकार के कामों पर मातारानी की नाराजगी के रूप में भी देखा जा सकता है। ठीक है कि मंदिर बन रहा है और अनुच्छेद 370 हटा दिया गया है। पर सरकार और वह भी डबल इंजन का काम इतना भर होता है? 2019 के लोकसभा चुनाव में पुलवामा के बाद या बावजूद बहुमत मिलना और अभी तक उसकी जांच नहीं होना और 2019 में ही कोविड का उदय और उससे निपटने की शुरुआती गलतियों के बाद उससे हुए नुकसान के मद्देनजर इसे प्राकृतिक आपदा मानें तो इसके कारणों पर भी गौर करना चाहिए। 2020 की उस उलझी शुरुआत और 2021 में भारी मौतों के बाद 2022 की शुरुआत साफ-साफ हादसे हुई है। नए साल की शुरुआत में एक ही दिन उत्तरी राज्यों में दो हादसे हो जाना ऊपर वाले का प्रयोग नहीं होगा, संयोग ही है और जब कुर्सी मिलने, पेट्रोल के दाम कम होने को भाग्य माना जा सकता है तो क्या यह नहीं मानना चाहिए कि माता रानी कुछ कह रही हैं। आप नहीं मानना चाहें तो मत मानिए। पर धर्म, पूजा, किस्मत, आस्था, भगवान तो आपके विषय रहे हैं, मेरी इनमें कभी दिलचस्पी नहीं रही।

वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण ने दो जनवरी को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर आरोप लगाया कि नव वर्ष पर मथुरा में तीर्थ यात्रियों का हाल बेहाल है। मतलब जम्मू के बाद मथुरा-वृन्दावन  भी? और प्रचार अयोध्या में दीये जलाने का! विनीत द ब्रज फ़ाउंडेशन के अध्यक्ष हैं और उनकी विज्ञप्ति में कहा गया है, मथुरा के तीर्थाटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनी ‘उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद’ ने (मथुरा की) इन बुनियादी समस्याओं के हल पर पिछले चार वर्षों से कोई ध्यान नहीं दिया है। प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने परिषद के उद्देश्यों पर प्रश्न उठाए। मेरा प्रश्न हिन्दुत्व के नाम पर सत्ता में आने या बने रहने वालों से है। परिषद का गठन उन्हीं लोगों ने किया है और मुख्यमंत्री तो इसके पदेन अध्यक्ष हैं।

‘द ब्रज फ़ाउंडेशन’ के अध्यक्ष का आरोप है कि इस परिषद को तीर्थ विकास के नाम पर केवल घोटाले करने और निरर्थक निर्माण करने में रुचि है, धाम सेवा में नहीं। श्री नारायण ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से यह माँग की है कि वे इस परिषद के अध्यक्ष होने के नाते इसकी आय-व्यय का लेखा-जोखा, परियोजनाओं के अनुसार, सार्वजनिक करें, जिससे हर ब्रजवासी व तीर्थयात्री को यह पता चल सके कि मथुरा में तीर्थ विकास के नाम पर क्या-क्या गुल खिलाए गए हैं। श्री नारायण ने दावा किया कि उनकी टीम ने ब्रजवासियों के सहयोग से ऐसी दर्जनों परियोजनाएँ चिन्हित की हैं जिनमें ‘उत्तर प्रदेश ब्रज तीर्थ विकास परिषद’ ने या तो जम कर घोटाले किए हैं या जनता के धन की निर्लज्जता से बर्बादी की है, जिसका खुलासा वे आने वाले दिनों में करेंगे।

विनीत नारायण ने ‘ब्रज तीर्थ विकास परिषद’ व मथुरा के प्रशासन पर दो अधिकारियों के क़ब्ज़े को लेकर भी सवाल उठाए हैं, जो कि योगी महाराज के चहेते माने जाते हैं। इनमें से एक अधिकारी तो पिछले पाँच वर्षों से ‘ब्रज तीर्थ विकास परिषद’ व ‘मथुरा वृन्दावन विकास प्राधिकरण’ दोनों चलाने के अलावा अपनी एक निजी एनजीओ भी चला रहे हैं। इन तीनों ही संस्थाओं के आय-व्यय का कोई भी ब्योरा उन्होंने आजतक सार्वजनिक नहीं किया है। यह अधिकारी आरटीआई का जवाब देने से भी बचते रहे  हैं। यह सब किसकी कृपा से हो रहा है ये ब्रजवासी जानने को उत्सुक हैं? हम यह भी जानना चाहते हैं कि इन अधिकारियों की वजह से ब्रज का कैसा ‘विकास’ हुआ है।

बेशक, बनारस में मंदिर बनाने का प्रचार किया गया है। पर वहां टिकट लगाकर जो किया गया उसकी कीमत वसूल ली गई। जो सवाल हैं उसके जवाब नहीं दिए गए। और सवाल एक दो नहीं, सैकड़ों हैं। माना जा सकता है कि बनारस में मंदिर को जैसा बनाया गया उसके लिए दिल्ली से दर्शनार्थियों को ले जाने के लिए वंदे भारत जैसी ट्रेन चलाई गई थी। पर उसे तेजस करना पड़ा और लगता नहीं है कि उम्मीद के अनुसार काम चल रहा है। जाहिर है, जो हुआ उसकी जरूरत पर सवाल उठते हैं। पर कोई जवाब नहीं है। पिछले दिनों खबर आई थी कि कोविड से मौतें जब शिखर पर थीं तब लखनऊ में लाशें जलाने के लिए खरीदी गई लकड़ी अब आग तापने के लिए राजभवन भेजी जा रही है। यह योजना और अंतिम परिणाम के हाल का एक उदाहरण नहीं है? सरकारी प्रचार के मुकाबले वास्तविकता बताना मीडिया का काम है पर वह तो सांप्रदायिक विज्ञापन छाप रहा है। खबरों की बात ही क्या करूं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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