शख़्सियत

जब देश के शासक खुद के ऊपर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च करते हैं, तब याद आती है औरंगज़ेब की सादगी

अली ज़ाकिर

मुग़ल बादशाह आलमगीर औरंगजेब इस देश को तब याद आएंगे जब पता चलेगा कि इस देश के शासक आज हज़ारो हज़ार करोड़ रुपये अपने ऊपर खर्च कर रहे हैं वहीं इस देश में एक ऐसा मज़बूत बादशाह भी हुआ था जिसने अपने व्यक्तिगत खर्च के लिए शाही खज़ाने से एक रुपया भी नहीं लिया और अपने हाथों से कुरान लिखकर उसकी हदिया और टोपी बुनकर उससे मिली रकम अपने उपर खर्च किया. देश को बर्बादी और कंगाली से बचाने के लिए अपने पिता को कैद किया.

ऐय्याश शराबी भाईयों को सजा-ए-मौत दिया. औरंगजेब ने एक ब्राह्मण की बेटी की इज्ज़त बचाने के लिए दिल्ली से बनारस आकर अपने मुस्लिम सेनापति के दोनों पैरों को हाथियों से बंधवा कर बीच से चिरवा दिया, और यह देश जब उसी जगह ब्राह्मणों द्वारा बनवाकर औरंगज़ेब को तोहफे में दी गई वाराणसी की घनेडा मस्जिद देखेगा तो औरंगजेब के न्याय को याद करेगा कि औरंगजेब ने अपने न्याय के सामने धर्म को कभी आने नहीं दिया.

यह देश तब औरंगज़ेब की निष्पक्षता को और याद करेगा जब उसे पता चलेगा कि मुग़लों के इतिहास में सबसे अधिक 368 हिन्दू मनसबदार ( वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ) औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में नियुक्त किए. यह देश औरंगज़ेब को तब और याद करेगा जब उसे पता चलेगा कि हिन्दू धर्म की सबसे बड़ी कुरीति सती प्रथा पर रोक लगाने की शुरुआत करने वाले बादशाह औरंगजेब थे. जब देश अखंड भारत की कल्पना में खोएगा तो उसे औरंगज़ेब याद आएंगे जिन्होने काश्मीर से लेकर कर्नाटक तक और तिब्बत से लेकर अफगानिस्तान तक भारत का विस्तार किया.

जज़िया एक ऐसा कर था जिसकी आड़ में इन झूठे इतिहासकारों ने औरंगजेब को घृणित बादशाह बना दिया जबकि हकीक़त यह थी कि जज़िया भी उनके न्याय का ही एक उदाहरण है जिसमें यह राजकीय कर केवल हिन्दू धर्म की प्रजा पर लगाया गया क्युँकि मुस्लिम ज़कात के रूप में पहले से ही कर देते थे और इस कर के लगने के बाद 64 तरह के छोटे छोटे कर माफ कर दिये गये थे. कट्टरता और अन्याय तो तब होता जब ज़कात को हिन्दुओं के उपर भी अनिवार्य कर दिया जाता परन्तु औरंगजेब ने ऐसा नहीं किया और कोई ईमानदार मुसलमान ऐसा कर नहीं सकता, एक बात और महत्वपूर्ण है कि जज़िया की दर ज़कात से बहुत कम थी. औरंगजेब काश किसी ब्राह्मण की बहन बेटी से तुमने दबाव और जजबरदस्ती शादी की होती तो इस देश में तुम आज भी प्रिय होते.

(लेखक युवा इतिहासकार हैं)

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