जब सरकार ही नागरिकों की जासूसी करे और फंसाए!

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संजय कुमार सिंह

आज जासूसी करने वाले इजराइली सॉफ्टवेयर, पेगासस से संबंधित दो खबरें छपी हैं। एक तो सुप्रीम कोर्ट की है। इसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा नियुक्त दो सदस्यीय जांच आयोग को भारतीय नागरिकों की जासूसी के लिए पेगासस के कथित उपयोग की जांच करने से फिलहाल रोक दिया गया है। इस आयोग का नेतृत्व सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज मदन बी लोकुर कर रहे हैं। आज ही दूसरी खबर द टेलीग्राफ में है।

इसके अनुसार जेल में बंद मानवाधिकार कार्यकर्ता रोना विल्सन के स्मार्ट फोन में पेगासस स्पाईवेयर के अंश मिले हैं और उनके फोन में यह घुसपैठ एलगार परिषद मामले में 2018 में उनकी गिरफ्तारी से एक साल पहले हुई थी। इससे पहले यह आरोप लग चुका है कि विल्सन और सह अभियुक्त, अधिवक्ता सुरेन्द्र गैडलिंग के कंप्यूटर हैक करके उनमें आपत्तिजनक सामग्री प्लांट की गई थी। हालांकि, अभियुक्तों ने इन्हें देखा भी नहीं था।

कुल मिलाकर, यह साइबर अपराध का अकेला सबसे बढ़िया मामला है जिसके दस्तावेज भी मौजूद हैं। इसके जरिए भारत की अपराध न्याय व्यवस्था से समझौता किया गया है पर भारत सरकार इस मामले में अभी तक शांत है। इसकी चिन्ता ट्वीटर और फेसबुक को कसने और सरकार विरोधी सामग्री छपने से रोकने की ही है। उसने अभी तक ना पेगासस खरीदना स्वीकार किया है और ना ही इसके उपयोग से इनकार किया है। आरोप है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए अपराध के इन पहलुओं की जांच ही नहीं कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने अक्तूबर में एक स्वतंत्र एक्सपर्ट टेक्निकल कमेटी की नियुक्ति की थी जिसे यह पता करना है कि सरकार ने भारतीय नागरिकों की जासूसी के लिए पेगासस का उपयोग किया है कि नहीं। दूसरी ओर, किया हो तो फर्जी ढंग से फंसाए गए मानवाधिकार कार्यकर्ता और दूसरे लोग वर्षों से बिना अपराध जेल में हैं उन्हें जमानत भी नहीं मिल रही है। हालांकि, एनआईए ने कंप्यूटर में जासूसी के लिए सॉफ्टवेयर प्लांट करने के आरोप से इनकार किया और इससे बचने के लिए तर्क दिए हैं पर इसकी जांच की जरूरत स्वीकार नहीं कर रहा है।

कुल मिलाकर, व्यवस्था यानी सिस्टम यही है कि सरकार का समर्थक गिरफ्तार हो जाए तो उसे जमानत मिल जाती है पर गलत ढंग से गिरफ्तारी के आरोपों के बावजूद ना आरोपों की जांच हो रही है और ना जेल में बंद लोगों को राहत मिल रही है। कहने की जरूरत नहीं है कि द टेलीग्राफ की खबर हिन्दुस्तान टाइम्स, इंडियन एक्सप्रेस या द हिन्दू में पहले पन्ने पर नहीं है। पूरे मामले में दिलचस्प यह है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने जांच आयोग बना दिया (केंद्र सरकार ने कुछ नहीं किया तब) तो उसे रोकने के लिए एक गैर सरकारी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली और आज जिस आदेश की चर्चा है वह उसी अपील पर है।

आज यह खबर अखबारों में प्रमुखता से है। इस आदेश से लगता है और ऐसा प्रचारित किया जा सकता है कि बंगाल सरकार कुछ अनुचित कर रही थी लेकिन रोना विल्सन वाली जो खबर द वायर, वाशिंगटन पोस्ट और द पोस्ट में छप चुकी है वह मुख्य धारा के अखबारों में नहीं है तो जनता को जो संदेश गया या जाएगा वह अपनी जगह है और बेशक यह हेडलाइन मैनेजमेंट में सरकार की योग्यता का असर है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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