जब सर सैय्यद ने कहा था “अगर मैं लोगों की बकवास का ख्याल करता तो जो कुछ कर पाया हूं वह कर ही नहीं पाता”

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फैज़ुल हसन

दस्तावेज़ों में ज़िक्र मिलता है कि 6 फरवरी 1894 को सर सैयद अ.र. ने अपने साथियों के साथ एक प्ले(ड्रामा) का एहतिमाम किया था, ड्रामा का मकसद समाज में लोगों को जागरूक करने, इल्म का फ़रोग़ (शिक्षा का प्रचार)का काम अंजाम देने पर ही सारा ध्यान था।

दस्तावेज़ में इस बात का भी ज़िक्र है कि सर सैयद के दोस्तों ने इस प्ले को लेकर अपनी-अपनी आशंकाएं भी ज़ाहिर की थीं। एक जगह लिखा है, ‘लोग हमें थिएटर वाला कहकर हमारा मज़ाक़ उड़ाएंगे, जो हमारे मुखलिफ़ अखबार वाले हैं, वह हमारी हंसी उड़ाएंगे। सर सैयद कहते हैं, अगर मैं लोगों का ख्याल करता तो अब तक जो कुछ कर पाया हूं, वह भी न कर पाता। जो बकते हैं, उनको बकवास करने दो। उनकी परवाह क्या करनी।’

इसके बाद प्ले की तैयारियां शुरू हुईं। बड़े-बड़े शामियाने और क़नातें लगाकर क़ौमी थिएटर बनाया गया। थिएटर के लिए टिकट भी लगाया गया। इस टिकट के पैसों से मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज में पढ़ने वाले गरीब छात्रों की मदद की जानी थी।

रात 8:45 बजे प्ले को शुरू किया गया। बाबू फिदा हुसैन ने हारमोनियम पर धुन बजानी शुरू की और लोगों का आना शुरू हो गया। आने वाले लोगों के लिए दर्जा तय था, जिसका जो दर्जा था, वह वहीं पर बैठा। पहले सीन में हाजी मोहम्मद इस्माइल रईस दतावली कप्तान की भूमिका में मंच पर नजर आए। इसके बाद एक-एक करके 12 सिपाही मंच पर हाज़िर हुए। दूसरे सीन में सर सैयद अरबी चोगा पहने हुए स्टेज पर आए और कप्तान ने उनसे कुछ गुफ्तगू की। इस तरह एक कामयाब प्ले पूरा हुआ।

इस प्ले में बाहरी मेहमानों व अफ़सर भी शामिल हुए थे,सर सैयद के इस प्ले में तत्कालीन कलेक्टर मिस्टर कैनेडी और उस समय के सिविल सर्जन डॉक्टर वोरियार्टी भी शामिल हुए। कलेक्टर का कहना था कि कॉलेज के लिए फंड इकट्ठा करने के काम से मैं स्वयं को दूर रखना ठीक नहीं समझता। इसके अलावा उस समय ईरान से आए मेहमान आगा कमालउद्दीन संजर और अफगानिस्तान से आए मेहमान आगा मोहम्मद हुसैन भी प्ले में शामिल हुए। अलीगढ़ के उस समय के मशहूर रईस ख्वाजा मोहम्मद यूसुफ भी प्ले में शामिल हुए। इनके नाम पर ही अलीगढ़ में ख्वाजा चौक है।

प्ले के अंत में सर सैयद मंच पर आते हैं और ये पंक्तियां कहते हैं…

दोस्तों क्या तुम्हें सचमुच था थिएटर का यकीं,

क्या वह समझे थे कि पर्दा कोई होगा रंगी,

नजर आएगी जो सोई हुई एक जोहराजबीं,

आएगा फूल के लिए इरमा का गुलचीन,

कौम के ख्वाब ए पोशा कि यह ताबीर है,

एक्टर यह नहीं इबरत की यह तस्वीर है!

(लेखक अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष एंव रिसर्च स्कॉलर हैं)

 

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