जब क्रिकेट को धर्म बनाकर हार के लिए अल्पसंख्यकों को बनाया जाएगा, तब वही होगा जो आज दुबई में हुआ

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वीर विनोद छाबड़ा

जब आप क्रिकेट को अपना धर्म बना लोगे, हार-जीत को देश की प्रतिष्ठा से जोड़ लोगे और माइनॉरिटी को हार के लिए निशाना बनाओगे तो जो होगा वो आज दुबई इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में सामने आया. मेरे विचार से पाकिस्तान के विरुद्ध पिछले मैच दस विकेट से मिली हार ने एक ख़ास झुकाव वाले मीडिया और एक धर्म विशेष ने इतना तूल दिया कि टीम बहुत प्रेशर में आ गई. कप्तान को मोहम्मद शमी को डिफेंड करने में ही बहुत वक़्त गुज़ारना पड़ा और शायद अगले मैच के लिए स्ट्रैटजी बनाने का सही वक़्त भी नहीं मिला.

मेरा विचार से ऐसा नहीं कि हार के लिए सिर्फ यही तथ्य कारण हैं. आप मैदान में टीम की बॉडी लैंग्वेज देखें. उनका मनोबल बहुत गिरा हुआ था. आपके ज़्यादातर बैट्समैन तो लॉन्ग शॉट खेलते हुए आउट हुए. रोहित और विराट जिस तरह आउट हुए, मैच को नज़दीक से देख रहे तमाम एक्सपर्ट ने कह दिया – इंडिया तो सेमी फाइनल से बाहर गियो भाया. राहुल 18, रोहित शर्मा 18, हार्दिक पंड्या 23, विराट कोहली 9 और रविंद्र जडेजा 26 नॉट आउट – ये सब टॉप के बैट्समैन रहे जिनसे टीम को बहुत उम्मीदें थीं. बाकी ने भी बेड़ा ग़र्क़ किया. फिर आपने 54 बॉल्स डॉट खेलीं. यानी नौ ओवर बिना रन के गए. ऐसे में अगर आपने 7 विकेट पर निर्धारित 20 ओवर्स में 110 रन बना लिए तो समझिये बहुत बड़ा कमाल कर दिया.

स्पिनरों की जन्मभूमि कहलाने वाली टीम इंडिया के बैट्समैन को न्यूज़ीलैंड के स्पिनर ईश सोढ़ी और सेनेटर ने गर्दन से पकड़ कर रखा. ये कमेंट किसी विदेशी पत्रकार का है. एक अन्य का कहना है क्रिकेट भावनाओं से नहीं स्ट्रैटजी बना कर खेला जाता है. जब डिफेंड करने के लिए इतना लो स्कोर हो तो एक जसप्रीत बुमराह को छोड़ कर बाकी सारे बॉलर्स दिशाहीन दिखे. उन्हें शायद ये मालूम ही नहीं था कि वो टीम में क्यों हैं. सिर्फ बॉलर्स ही फील्डिंग में भी टीम ने बहुत लचर प्रदर्शन किया. किसी एक नाम लेने का मतलब है कि बाकी के साथ अन्याय कर रहा हूँ. सभी ज़िम्मेदार हैं. मुझे समझ में नहीं आता कि टीम के साथ ‘मेंटर’ के तौर पर भेजे गए महेंदर सिंह धोनी किस मर्ज़ का ईलाज करने के लिए भेजे गए हैं.

फ़िलहाल तो पहले दोनों मैचों में उनकी भूमिका समझ में नहीं आयी. बाकी मैचों का मालूम नहीं. बहरहाल, यही तमाम कारण रहे कि न्यूज़ीलैंडर्स बैटिंग करते हुए किसी भी स्टेज पर दबाव में नहीं दिखे. आमतौर पर लो टारगेट का पीछा कर रही टीम शुरू के ओवर संभल कर खेलती है, मगर कीवी अटैकिंग मूड में रहे. बड़ी आसानी से 33 बॉल्स बाकी रहते 111 का टारगेट 2 विकेट खोकर पूरा कर लिया. डेरिल मिशेल ने 49 और केन विलियम्सन ने 33 रन की मैच जिताऊ पारियों खेलीं. लेकिन मैन ऑफ़ मैच स्पिनर ईश सोढ़ी रहे जिन्होंने 17 रन पर दो अहम विकेट लिए. अब कोई उन्हें निशाने पर न ले कि भारतीय मूल के होकर विदेशी टीम को जिताते हो, गद्दार कहीं के.

 

अब सवाल पैदा होता है कि क्या टीम इंडिया का कोई आउटसाइड चांस सेमी-फाइनल तक पहुँचने का है? मेरे विचार से पहली नज़र में तो बिलकुल नहीं. कोई ‘इफ एंड बट’ या ‘चमत्कार’ हो तो बात दूसरी है. यानी आप बकाया तीनों मैचों में नामीबिया, अफ़ग़ानिस्तान और स्कॉटलैंड को हरा दो और न्यूज़ीलैंड इन तीनों में से किन्हीं दो को हरा दे. तीस लाख की आबादी वाले नेशन न्यूज़ीलैंड को इतना कमज़ोर समझना बहुत बड़ी भूल होगी. मगर अभी पिक्चर तब तक बाकी कहलाएगी जब तक आख़िरी गेंद नहीं डाल दी जाती. यही सोचिये और आराम से सो जाएँ.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)