देश

अगर सत्ताधारी दल के ‘अभिनेताओं’ के घर महाराष्ट्र सरकार बिजली, पानी रोक दे फिर क्या होगा?

कृष्णकांत

फर्ज कीजिए कि अक्षय कुमार और कंगना रनौत जैसे लोगों के लिए महाराष्ट्र सरकार ने एक दिन के लिए पानी और खाना सप्लाई रोक दी और उन्हें एक घर मे बंद कर दिया। आज न वे पखाना जा सकते हैं और न ही खाना बना सकते हैं, न पीने का पानी मिल रहा है। फिर क्या होगा? वे चिल्लायेंगे कि नित्य क्रिया तो उनका मूल अधिकार है, जीवन जीने का अधिकार। पूरी दुनिया के ताकतवर उनके पक्ष में आवाज उठाएंगे। आप भी उनके बेसिक अधिकार के लिए आहत हो जाएंगे। ये स्वाभाविक भी है।

लेकिन देश के किसानों के लिए, आम लोगों के लिए सबकी यही स्वाभाविक प्रतिक्रिया क्यों नहीं है? क्या सत्ता में बैठे ताकतवर लोग आम जनता का खाना-पानी बंद करने का अधिकार रखते हैं? अगर ये आपके साथ हो, आपके बच्चों के साथ हो तब क्या होगा? दो महीने से धरने पर बैठे किसानों के लिए रोज की जरूरत का सामान नहीं मिल रहा है। गड्ढा खोदकर पानी की सप्लाई  बाधित कर दी गई है। टॉयलेट की सुविधा बाधित कर दी गई है। धरने पर बैठे लोगों में महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे भी हैं। उन्हें पीने और टॉयलेट के लिए पानी तक नहीं मिल रहा है।

इंटरनेट बंद कर दिया गया है ताकि वे अपनी बात जनता को न बता पाएं। मीडिया को सरकारी पीआर ऑफिस बना दिया गया है। स्वतंत्र पत्रकारों और सरकार पर सवाल उठाने वाले लोगों को जेल भेजा जा रहा है। जब सरकार को लगा कि मामला तूल पकड़ रहा है तो भारत की एकता और अखंडता की दुहाई दे रहे हैं। क्या रिहाना नाम का कोई देश है जिसने भारत के अंदरूनी  मामले में हस्तक्षेप कर दिया? उस ट्वीट में ऐसा क्या था जो सरकार ने अपने सारे दलाल इकट्ठा कर लिए और  अभियान चला दिया?

ये काम भारत की सरकार कर रही है। भारत के अमीर करोड़पति- खिलाड़ी, हीरो, नेता और बिजनेसमैन सब सरकार के साथ हैं। आपदा में लूट का अवसर ढूंढने वाले सारे लुटेरे एक साथ हैं, आम जनता के खिलाफ। ये अभियान दरअसल उस निकृष्टता को छुपाने की साजिश है जो सरकार कर रही है। अगर आपको भी लग रहा है कि अपने हक के लिए विरोध करने वाली आम जनता देश की दुश्मन है तो आप भी काफी गर्वीले मटीरियल हैं। अपने ही देश की आम जनता का विरोध कीजिए, उनके खिलाफ दुष्प्रचार कीजिए, नफरत फैलाइये और फर्जी राष्ट्रवाद का मंतर जपते रहिए। आपका ये राष्ट्रवाद बेहद घिनौना और क्रूर है।

भारत में सत्ता की दलाली पुराना राष्ट्रीय रोग है। यहां कलाकारों की इतनी ही औकात है कि वे राजाओं खुश करने के लिए अपनी जिंदगी चारण गान में समर्पित कर देते थे। आज भी वे ऐसा कर रहे हैं तो आश्चर्य कैसा? लेकिन कभी करोड़पति फ़क़ीर की दलाली और फर्जी फकीरी की भक्ति से वक़्त निकाल कर अपने भीतर झांकिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप इंसान से एक क्रूर जानवर में बदलते जा रहे हैं?

(लेखक पत्रकार एंव कथाकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)