यादों में टूटू: रंगभेद के खिलाफ संघर्ष करने वाले आर्कबिशप एमेरिटस डेसमंड टूटू को भारत क्यों लगता था तीर्थ स्थल

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दिल्ली का एक कोना जीवनभर रंगभेद का विरोध और एलजीबीटी अधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले दक्षिण अफ्रीका के नोबेल पुरस्कार विजेता आर्कबिशप एमेरिटस डेसमंड टूटू के निधन से उदास है। डेसमंड टूटू सन 2007 में दिल्ली में गांधी अंतरराष्ट्रीय शांति पुरस्कार लेने के लिए थे। वे तब इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के गांधी-किंग प्लाजा में आए थे। वहां पर उन्होंने एक पौधा भी रोपित किया था। यह देखकर टुटु प्रसन्न हो गए थे कि गांधी-किंग प्लाजा में गांधी जी और मार्टिन लूथर किंग की खास बातों को दिवारों पर लिखा गया है। डेसमंड टुटु के जीवन पर गांधी जी के अहिंसात्मक आंदोलन का गहरा प्रभाव पड़ा था। टुटु अमेरिका के अश्वेत नेता मार्टिन लूथर किंग को भी अपना आदर्श मानते थे।

यहां आने पर डेसमंड टुटु ने राजधानी के गणमान्य नागरिकों को संबोधित भी किया था। टुटु ने तब कहा था कि भारत उनके लिए गांधी के कारण किसा तीर्थ स्थल से कम नहीं है। उस दिन आईआईसी का सी.डी देशमुख सभागार खचाखच भरा हुआ था। कार्यक्रम का संचालन विधिवेत्ता सोली सोराबजी कर रहे थे। टुटु ने अपने बेहद प्रखर वक्तव्य में उन दिनों को याद किया था जब उनके मुल्क में गोरे बहुसंख्यक अश्वेत आबादी पर जुल्म कर रहे थे। लेकिन, टुटु के भाषण को सुनकर नहीं लगा था कि उनके मन में किसी के प्रति  घृणा या गुस्सा है। इसी सभागार से कोफी अन्नान और महान पर्वतारोही सर एडमंड हिलेरी वगैरह भी अपनी बात रख चुके हैं।

दरअसल रंगभेद के खिलाफ जुझारू प्रतिबद्ता से लड़ने वाले डेसमंड टुटु जिस गांधी-किंग प्लाजा में आए थे उसकी स्थापना 1970 में हुई थी। इसके उदघाटन के अवसर पर देश की तब की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा उपस्थित थीं। उन्होंने ही इसका उदघाटन किया था। इसकी भी लैंड स्केपिंग महान आर्किटेक्ट जोसेफ एलेन स्टाइन ने ही की थी। उन्होंने ही इंडिया इंटरनेशनल सेंटर का डिजाइन बनाया था। एलेन स्टाइन को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के लाजवाब डिजाइन ने उन्हें खूब ख्याति दिलवाई। स्टाइन ने आईआईसी में जालियों और छज्जों को जगह दी। इसे आधुनिकता और परम्परा के संगम के रूप में विकसित किया। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में गांधी- किंग प्लाजा में कोई भी आ जा सकता है। इसके चारों तरफ घने पड़े लगे हैं। जाहिर है, यह तब ही लगे होंगे जब इंटरनेशनल सेंटर स्थापित हुआ होगा। यह 22 जनवरी, 1962 को आरंभ हुआ था। यानी ये सब बुजुर्ग पेड़ हैं। यहां का सारा माहौल बेहद सुकून भरा है। टुटु ने यहां के चप्पे-चप्पे को देखा था।

वहां मिलेंगे टुटु के साथी मंडेला

डेसमंड टुटु और दक्षिण अफ्रीका के शिखर नेता नेल्सन मंडेला परम मित्र थे। जब मंडेला दशकों जेल की सलाखों में रहने के बाद बाहर आए थे तो वे उस रात टुटु के घर में ही सोए थे। संयोग से मंडेला का तो दिल्ली से बेहद गहरा संबंध है। वे 1990 में दिल्ली आए थे। वह उनकी जेल से रिहा होने के बाद पहली विदेश यात्रा थी। दक्षिण दिल्ली में नेल्सन मंडेला मार्ग भी है। मंडेला 1995 में फिर भारत आए। मंडेला के नाम पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया में साल 2004 में नेल्सन मंडेला सेंटर फॉऱ पीस एंड कान्फ्लिक्ट कनफिल्कट रेज़लूशन की स्थापना की गई।

अश्वेत गांधी कहां

इस बीच, टुटु के आदर्श मार्टिन लूथर किंग 1959 में सत्पनीक दिल्ली आए तो राजघाट भी बापू को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए पहुंचे थे। वहां  दोनों की आंखें नम हो गईं। कुछ संभले तो वहां पर मौजूद लोगों ने उनसे पूछा कि आप दोनों कि आंखों से आंसुओं की अविरल धारा क्यों बहने लगी थी? मार्टिन लूथर किंग ने आसमान की तरफ देखते हुए जवाब दिया था – गांधी उनके मार्गदर्शक हैं। वे गांधी के दिखाए सत्य और अंहिंसा के मार्ग पर चलकर  ही अमेरिका में दबे-कुचले अश्वेतों के पक्ष में लड़ पाते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले समय में डेसमंड टुटु के नाम पर राजधानी और देश के अन्य भागों में मार्ग और शिक्षण संस्थान खुलेंगे।

एक अफ्रीका दिल्ली में

इस बीच,दिल्ली के चाणक्यपुरी में न्याय मार्ग से चंदेक कदमों पर घाना के स्वतंत्रता आंदोलन के शिखर नेता क्वामे नकरूमा मार्ग से बहुत दूर नहीं है राजधानी में अफ्रीका का सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक अफ्रीका गॉर्डन। ये संयोग ही है कि निर्गुट आंदोलन के नेता क्वामें नकरूमा मार्ग और अफ्रीका गार्डन इतने करीब हैं।

आप लोधी गार्डन, नेहरु पार्क,कुदेसिया गॉर्डन वगैरह में अवश्य सैर करने या कुछ पल सुकून के बिताने गए होंगे। क्या कभी अफ्रीका गॉर्डन भी जाना हुआ? इसका सही नाम है इंडिया अफ्रीका फ्रेंडशिप रोज गॉर्डन। अब इसे अफ्रीका गॉर्डन भी कहा जाने लगा है। जैसे कि इसके नाम से ही स्पष्ट है कि यहां गुलाब ही गुलाब हैं। यहां गुलाब के लाल,पिंक,सफेद समेत साढ़े पांच हजार से अधिक पौधों की 65 प्रजातियां खुशबू बिखेरती हैं। इधर का सारा वातावरण बेहद सुंदर और आनंद की अनुभूति देता है।  पर समझ नहीं आया कि अपनी खूबसूरती के लिए बेजोड़ अफ्रीका गॉर्डन पर अभी तक दिल्ली वालों की नजरें करम क्यों नहीं हुईं? इधर कम ही लोग आते हैं। कुछ अफ्रीकी नागरिक अवश्य मिल जाते हैं। संभवत: अपने घरों से हजारों मील दूर उन्हें इसके नाम में अफ्रीका होना अपनी तरफ खींचता होगा।

दिल्ली में अफ्रीका नाम से किसी उद्यान का होना एक तरह से यहां पर रहने वाले अफ्रीकी नागरिकों को कुछ भरोसा तो दिलाता होगा कि दिल्ली उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक नहीं समझती। हां, इधर कुछ धूर्त तत्व तो हैं। वैसे राजधानी में अश्वेत संसार के दो शिखर नेताओं नेल्सन मंडेला और मिस्र के जननायक गमाल आब्देल नासेर के नामों पर भी सड़कें हैं। क्वामें नक्ऱूमा की तरह नासेर भी निर्गुट आंदोलन के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर थे। देखा जाए तो दिल्ली का अफ्रीका से रिश्ता सन 1955 में  कायदे से बना था।

तब  दिल्ली यूनिवर्सिटी ( डीयू)  में डिपार्टमेंट आफ अफ्रीकन स्टडीज की स्थापना प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की निजी पहल पर शुरू हुई।  उसी दौर में यहां विभिन्न अफ्रीकी देशों के नौजवान पढ़ने के लिए आने लगे। उनमें केन्या से आने वाले सर्वाधिक रहते थे। उन्होंने डीयू में अपने देश के नायक जुमो कैन्यटा के नाम से एक फुटबॉल प्रतियोगिता भी चालू की। उसमें सिर्फ अफ्रीकी देशों के छात्र ही भाग लेते थे, पर दर्शक सब होते थे। इसी डीयू के श्रीराम कालेज ऑफ कॉमर्स और दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स के छात्र रहे अफ्रीकी देश मालावी के राष्ट्रपति बिंगु वा मुथारिका भी।

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)