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टीपू जयंती पर सपा, बसपा, कांग्रेस, राजद सुप्रीमो ने नहीं किया टीपू को याद, पीस पार्टी प्रवक्ता ने उठाए सवाल

नई दिल्लीः मैसूर के शेर नाम से विश्व इतिहास में दर्ज टीपू सुल्तान पिछले कुछ सालों से देश के राष्ट्रीय पटल पर तमाम वजहों से चर्चा में आते रहे हैं। 20 नवंबर को उनका जन्मदिन था। टीपू सुल्तान ने अपने समय में कई ऐसे आविष्कार किए थे, जिसने उनकी सेना को ताकतवर बना दिया था। सेना में पहली बार हल्के दर्जे के रॉकेट का इस्तेमाल का श्रेय भी उन्हें जाता है। लेकिन इसके अलावा दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा टीपू सुल्तान के चरित्र पर लगातार कीचड़ उछालकर उन्हें हिंदुकुश के रूप में दर्शाया जाता रहा है।

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने टीपू सुल्तान की जयंती मनाने का ऐलान किया था, जिसके खिलाफ दक्षिणपंथी संगठनों विरोध प्रदर्शन किया था। उसके बाद कर्नाटक में आई भाजपा सरकार ने टीपू सुल्तान की जयंती न मनाने की घोषणा कर दी। बीते रोज़ 20 नवंबर को टीपू सुल्तान की जयंती थी लेकिन उनकी जयंती पर सपा, बसपा, राजद, कांग्रेस, के बड़े नेता भी अंग्रेज़ो से लड़ते लड़ते शहीद हुए टीपू सुल्तान को याद नहीं कर पाए। सेक्लूलर दलों के नेताओं में टीपू सुल्तान को उनकी जयंती पर याद करने वालों में सिर्फ चंद्रशेखर आज़ाद का नाम ही शामिल है।

 

सेक्यूलर पार्टियों के इस रवैय्ये पर पीस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शादाब चौहान ने सवाल उठाए हैं। शादाब चौहान ने ट्वीट किया है कि शायद टीपू सुल्तान पर कल ट्वीट राहुल मायावती अखिलेश तेजस्वी केसीआर ने इसलिए नहीं किया कि स्वतंत्रता सेनानी वही माना जाता है उनकी नजर में जो मुसलमान ना हो?

अंग्रेज़ो को कर दिया था हैरान

अंग्रेजों के खिलाफ पोल्लिलोर की लड़ाई में जब उन्होंने रॉकेट का इस्तेमाल किया तो वो हैरान रह गए। इसी रॉकेट की तकनीक का इस्तेमाल उन्होंने सम्राट नेपोलियन के खिलाफ किया था। इतिहासकारों के मुताबिक ये प्रयोग उन्हें ज्यादा फायदा नहीं दिला सका। क्योंकि वो किलेबंदी को नहीं भेद सके थे।

अंग्रेज इन रॉकेट को अपने साथ ले गए

भारत के पूर्व राष्ट्रपति और मिसाइल कार्यक्रम के जनक एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी किताब ‘विंग्स ऑफ़ फ़ायर’ में लिखा था कि मैंने लंदन के साइंस म्यूजियम में टीपू सुल्तान के कुछ रॉकेट देखे। ये उन रॉकेट में से थे जिन्हें अंग्रेज अपने साथ ले गए थे। ये दिवाली वाले रॉकेट से थोड़े ही लंबे होते थे। टीपू के ये रॉकेट इस मायने में क्रांतिकारी कहे जा सकते हैं कि इन्होंने भविष्य में रॉकेट बनाने की नींव रखी। जब टीपू सुल्तान की सेना ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में बारूदी रॉकेट का इस्तेमाल किया तो वो हैरान रह गए। इससे अंग्रेज सेना को बहुत नुकसान हुआ। वो सोच भी नहीं सकते थे कि किसी भारतीय राजा की सेना के पास ये तकनीक भी होगी।

नासा के सेंटर में टीपू के रॉकेट की पेंटिंग

अब्दुल कलाम ने किताब में आगे लिखा कि नासा के एक सेंटर में टीपू की सेना की रॉकेट वाली पेंटिग देखी थी। कलाम लिखते हैं, “मुझे ये लगा कि धरती के दूसरे सिरे पर युद्ध में सबसे पहले इस्तेमाल हुए रॉकेट और उनका इस्तेमाल करने वाले सुल्तान की दूरदृष्टि का जश्न मनाया जा रहा था। वहीं हमारे देश में लोग ये बात या तो जानते नहीं या उसको तवज्जो नहीं देते।”

टीपू सुल्तान का जन्म 20 नवम्बर 1750 को कर्नाटक के देवनाहल्ली (यूसुफ़ाबाद) हुआ था। उनका पूरा नाम सुल्तान फतेह अली खान शाहाब था। उनके पिता का नाम हैदर अली और माता का नाम फ़क़रुन्निसा था। 4 मई 1799 को 48 वर्ष की आयु में कर्नाटक के श्रीरंगपट्टनममें टीपू अपनी आखिरी साँस तक अंग्रेजों से लड़ते लड़ते शहीद हो गए।

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