चर्चा में देश

जिनको गांधी और नेहरू के नाम से ही उबकाई आ जाती है, वे नेताजी पर किस मुंह से दावा ठोंकते हैं?

कृष्णकांत

वक्त पड़े पर वे महात्मा गांधी को पूज लेते हैं, वक्त पड़े पर नेताजी को पूज लेते हैं और दूसरी ओर नेताजी के ‘राष्ट्रपिता’ के हत्यारे को भी पूज लेते हैं। जनता बिना कुछ सोचे इसी छलछद्म और घि‍नौनेपन से भरी राजनीति के पीछे पागल रहती है। गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ का खि‍ताब देने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजकल बंगाल में बड़ी मांग है। पार्टियां बड़े धूमधाम से उनकी जयंती मनाने की तैयारी कर रही हैं।

चुनावी चाल के तहत वे भी सुभाष चंद्र बोस को अपना ‘पितामह’ बता रहे हैं जो गांधी के हत्यारे की भी लगे हाथ पूजा भी कर लेते हैं। अब जिन्हें सुभाष से प्रेम है, उन्हें गांधी से प्रेम क्यों नहीं है? प्रेम दिखाते तो हैं लेकिन रह-रहकर गोडसे प्रेम छलक जाता है। कुछ दिन पहले गोडसे पाठशाला इसका ताजा सबूत है। ये नेताजी ही थे जिन्होंने महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहा था। उन्हें राष्ट्रपिता किसी सरकार ने घोषि‍त नहीं किया था। आजाद हिंद फौज बनाकर अंग्रेजों पर धावा बोलने से पहले नेताजी ने आजाद हिंद रेडियो से देशवासियों को संबोधि‍त किया तो सबको उम्मीद थी कि वे गांधी की आलोचना करेंगे।

लेकिन सुभाष बाबू ने बोलना शुरू किया- ‘भारत की आजादी की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है। आजाद हिंद फौज हिंदुस्तान की धरती पर लड़ रही है। सारी दिक्कतों के बावजूद आगे बढ़ रही है। ये हथियारबंद संघर्ष तब तक चलेगा जब तक कि ब्रिटिश राज को देश से उखाड़ नहीं देंगे। दिल्ली के वॉयसराय हाउस पर तिरंगा फहरेगा…. राष्ट्रपिता, हिंदुस्तान की आजादी की लड़ाई में हम आपका आशीर्वाद मांगते हैं।’ इस संबोधन के बाद वहां मौजूद कई लोग भावुक हो गए। तमाम असहमतियों के बावजूद नेताजी ने घोषणा कर दी थी कि गांधी राष्ट्रपिता हैं और आजादी की लड़ाई के निर्विवाद नायक हैं।

आजाद हिंद फौज की पांच रेजिमेंट थीं-

सुभाष ब्रि‍गेड

गांधी ब्रि‍गेड

आजाद ब्रि‍गेड

नेहरू ब्रि‍गेड

झांसी की रानी रेजिमेंट

लेकिन जैसे नेहरू-पटेल को एक-दूसरे के खि‍लाफ खड़ा किया जाता है, वैसे ही गांधी-सुभाष को एक-दूसरे के खि‍लाफ खड़ा किया जाता है। जिनको गांधी और नेहरू के नाम से ही उबकाई आ जाती है, वे नेताजी पर किस मुंह से दावा ठोंकते हैं? हैरानी तो ये है कि नेहरू और गांधी के नाम पर फोटोशॉप फैलाने वाले ट्रोल भी नेताजी के मौसमी दीवाने बने घूम रहे हैं। इस बार भी नेताजी की जयंती पर तमाशा देखने लायक होगा।

(लेखक पत्रकार एंव कथाकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)