शख़्सियत

उस दौर में दो ही नाम थे, नेहरू और दिलीप कुमार

शकील अख्तर

दिलीप कुमार का न रहना कितनी यादें दिला गया। उनसे मुलाकात की तो कम। मगर उनके बारे में, उनके उस पूरे दौर के बारें में, उनके चाहने वाले, उनके खिलाफ एक लफ्ज भी नहीं सुनने वाले और सिर्फ वही फिल्म पत्रिका खरीदने वाले जिसमें उनका फोटो या जिक्र हो जैसे कई लोगों की याद आ गई। ऐसा लगता है कि अपने होश संभालने के बाद से लेकर आज तक का दौर दिलीप कुमार केन्द्रित रहा। बचपन की जो आधी अधुरी यादें हैं उनमें शायद दो ही लोगों का नाम सबसे ज्यादा सुनने को मिलता था। नेहरू और दिलीप कुमार। या क्रिकेट के सीजन में नवाब पटौदी, चंदु बोर्डे, फारुख इंजीनियर या विदेशियों में गैरी सोबर्स, हाल, ग्रिफिथ, मोहम्मद हनीफ। जानकारी के सबसे बड़े माध्यम पापा हुआ करते थे। जो अखबार पढ़ते हुए कभी कभी इन लोगों के बारें में बताते थे। या सुबह की अंग्रेजी की न्यूज। मगर उस दौरान बोलना मना होता था तो कुछ समझ में आता था और ज्यादातर नहीं।

पापा दिलीप कुमार के बड़े फेन थे। जब छोटे थे हर क्लास में बैठकर फिल्म देखी। थर्ड क्लास की बैंचों पर तीस पैसे में। सैकंड क्लास में लकड़ी की कुर्सियों पर पैंतालिस पैसे में। लेकिन जब दिलीप कुमार की कोई फिल्म आती थी तो पापा और उनके दोस्तों के साथ बालकनी के मूढ़ों पर बैठकर। पापा दिलीप कुमार के बड़े फेन थे। जब भी फिल्म आती थी हमें भी ले जाते थे।

शायद सवा रुपये टिकट होता था। खरीदना नहीं पड़ता था इसलिए बहुत सही से याद नहीं है। बस इतना याद है कि चुप रहना पड़ता था। और इंटरवल में कोल्ड ड्रिंक पीकर उसकी स्ट्रा को बोतल में रखकर धीरे से नीचे रखना होता था। अगले दिन सुबह अक्सर हमारी तारीफ होती थी कि हम इंटर में खराब तेल के कचौरी, समोसे नहीं मांगते और कोल्ड ड्रिंक पीकर स्ट्रा हवा में उछालकर नहीं फैंकते। इनाम के तौर नेहरू, दिलीप कुमार, क्रिकेट पर कुछ नई जानकारियां भी मिलती थीं।

यह वह दौर था जब ज्यादातर लोगों के पास सूचनाओं का अभाव होता था। अख़बार तो बहुत कम घरों में आते थे। पत्रिकाएं और किताबें तो और भी कम घरों में आती थीं। लेकिन आश्चर्यजनक था कि लोगों को फिल्मों की इतनी जानकारी होती थी। हम तब समझ नहीं पाते थे कि फिल्म अभी लगी है। तांगें में माइक लगाकर अभी इसका प्रचार हो रहा है और लोग इसके बारें में बातें करने लगे। बताने लगे कि कैसी है। कैसे बनी। सिनेमा हाल में घुसते ही लोग बता देते थे कि इतने रील की है। और फलाना गाना आपरेटर आधा काट लेगा।

वाकई फिल्में हमारी जिन्दगी का एक बड़ा अहम हिस्सा रही हैं। मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन वही थीं। जानकारियों का भी। और जागरुरकता का भी। जमींदार, उद्योगपति, साहूकार सबके खिलाफ फिल्मों ने दिखाया। गरीब को लड़ते हुए, जीतते हुए दिखाया। फिल्मों से लोग बहुत प्रभावित होते थे। और आपसी बातचीत के जरिए उनकी फिल्मों की जानकारी जबर्दस्त होती थी। हर बड़े एक्टर के लोग फैन थे। मगर दिलीप कुमार इस मामले में सबसे अलग थे कि लोग उनके नाम पर लड़ने को या संबंध तक खत्म करने को तैयार हो जाते थे।

हमारे शहर मध्य प्रदेश के दतिया में एक चाय का होटल है। शहर के मुख्य।  बाजार किला चौक में नरसू सेठ का। आज से चालीस- पैंतालिस साल पहले शहर का सबसे अच्छा रेस्टोरेंट उसी ने बनाया था। दिलीप कुमार का भारी फैन। दिलीप की ताऱीफ पर स्पेशल चाय पिलाता था। और गलती से कहीं आलोचना कर दी तो चाय फिर मिलना ही नहीं है।

इसी तरह जम्मू में शहर की मुख्य सड़क रेजिडेन्सी रोड पर टीआरसी (टूरिस्ट रिस्पेशन सेंटर) के सामने खाने एक होटल (ढाबा) है। उसका नाम ही हम लोगों ने दिलीप कुमार का ढाबा रख दिया था। पूरे होटल में दिलीप कुमार के आदमकद फोटो लगे हुए थे। डोगरी के गालिब कहे जाने वाले मशहूर कवि और पत्रकार वेदपाल दीप रात को वहीं अख़बार का काम करते हुए खाना खाने आते थे। वैसे तो बहुत विनम्र, प्यार से बात करने वाले थे दीप जी। मगर अखबार वालों के लिए रात का वह समय बहुत तेज भागता है। जम्मू कश्मीर के दो प्रमुख अख़बार अंग्रेजी और हिन्दी के ( हिन्दी का तो तब वह राज्य का एकमात्र अख़बार था) देखते थे। ढाबा भी उस समय टूरिस्टों से भरा रहता था। तो खाने में अगर देर हो जाए तो दीप जी बस एक शब्द बोलते थे- ऐ दिलीप कुमार! बस फिर उसके बाद तो उनकी टेबल पर लड़कों को फौरन दौड़ाया जाता था। लड़के तेज गति से पानी का जग लेकर दौड़ते थे और दीप जी के हाथ के ग्लास में पानी डालने को झपटते थे। दीप जी उपर आफिस से अपने ग्लास में थोड़ा सा लास्ट वाला लेकर आए होते थे। वे ग्लास छुपाते हुए चिल्लाते थे, इसमें नहीं। इसमें मत डाल देना।

दिलीप कुमार राज्यसभा के सदस्य थे। हमेशा सोचते थे कि फुरसत में बात करेंगे। मगर पार्लियामेंट में रिपोर्टर को फुरसत कहां। कुछ न कुछ होता रहता था। एक बार घर जाना था। उससे पहले गैलरी में दिलीप कुमार और सायरा बानो दिख गए। हम पहुंचे। सलाम किया। बताया अपने बारे में। मिलने की ख्वाहिश जाहिर की। बहुत अच्छी तरह बोले कल ही आ जाइएगा। सुबह, शाम जब चाहें। नहीं हो पाया जाना। खैर तो कहानी यह है कि उसके बाद घर गए तो पापा को बताया कि दिलीप कुमार मिले थे। कहने लगे हमारे बारे में बताया। हमने कहा जी बताया। यह बताया कि हम और वे साथ के हैं। एक ही साल की पैदाइश हैं। हमने कहा यह तो नहीं बताया। कहने लगे अब मिलें तो बोलना। और हम भी चलेंगे साथ में। न उसके बाद हम जा पाए। न पापा रहे और न अब दिलीप साहब। बस यादें रह गईं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)