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सरकार ने यूनिवर्सिटियां पहले ही खाली करा ली थीं और अब सदन भी खाली करा लिया! क्या है लोकतंत्र का भविष्य?

श्याम मीरा सिंह

प्रधानमंत्री उपसभापति की चाय देने वाली तस्वीरों को लोकतंत्र की सुंदर तस्वीर बता रहे हैं, लेकिन मैं आपको दूसरी तस्वीर दिखाता हूँ, ये भारतीय लोकतंत्र की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और डराने वाली तस्वीर है। पूरी राज्यसभा खाली है, जो कुछ राज्यसभा सांसद आपको नजर आ रहे हैं वे भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों के सांसद हैं। बाकी पार्टियों जैसे कांग्रेस, लेफ्ट पार्टियां, सपा, तृणमूल कांग्रेस आदि ने 8 सांसदों के धरने के समर्थन में सदन की कार्यवाई का बहिष्कार करने का फैंसला लिया था।

कायदा ये कहता था कि उपसभापति सदन के सदस्यों से बात करते, उनकी आपत्तियों पर विचार करते। लेकिन उपसभापति और सरकार ने इस लोकतांत्रिक आपदा को ही अवसर में बदल लिया। मात्र 214 मिनट के भीतर बिना किसी चर्चा, बिना किसी सवाल, बिना किसी आपत्ति-अनापत्ति के ही चुपचाप 7 बिल पास करा लिए। ये सात विधेयक टैक्सेशन, Information Institute, Forensic University से सम्बंधित थे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण विधेयक आवश्यक वस्तु अधिनियम से सम्बंधित था। आवश्यक वस्तु वे हैं जो रोजमर्रा के जीवन के लिए अत्यधिक आवश्यक होती हैं। कोई इनकी कालाबाजारी न कर ले, ओने पौने दाम न ले इसलिए इनकी कीमतों का नियंत्रण स्वयं सरकार करती है। लेकिन सरकार ने इन आवश्यक वस्तुओं की लिस्ट में से आज अनाजों, दालों, प्याज, खाद्य तेल और आलू जैसी महत्वपूर्ण चीजों को निकाल दिया है।

अब इनकी कीमतों और भंडारण का नियंत्रण सरकार नहीं बल्कि निजी व्यापारियों के हाथ में होगा। बड़ी बड़ी कंपनियां इनकी जितनी चाहे कीमतें रख सकेंगी। आवश्यक वस्तुओं की कालाबाजारी के सम्बंध में जो जुर्माना या सजा पहले मिलती थी अब उससे भी इन कम्पनियों, व्यापारियों को मुक्ति दे दी गई है।

कुल मिलाकर आलू, प्याज और दाल जैसी महत्वपूर्ण चीजों के कीमतें अब निजी हाथों में होंगी। अगर कोई एक व्यापारी आपके इलाके की सारी प्याज का भंडारण कर लेता है तो वह उसकी जितनी चाहे कीमत वसूल कर सकता है, इसके जुर्माने से वह मुक्त है। अब सरकार का कोई नियंत्रण इन वस्तुओं पर नहीं रह गया। आप सोचिए इतने महत्वपूर्ण कानूनों को बिना बाकी राज्यसभा सांसदों के ही पास कर लिया गया है। जबकि सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत ही नहीं है। लेकिन चूंकि इस मुश्किल वक्त में सदन में कोई नहीं था, इसलिए इसे मौके के रूप में लेते हुए भाजपा सरकार ने इन कानूनों को पास करा लिया। ये लोकतंत्र की अब तक की सबसे बदरंग तस्वीर है।

इस सरकार ने यूनिवर्सिटियाँ पहले ही खाली करा ली थीं अब इस देश का इच्छा सदन भी खाली करा लिया गया है। लेकिन इतनी गम्भीर खबर को भी पूरी टीवी मीडिया में कहीं नहीं दिखाया गया। टीवी मीडिया और अखबार आपको इस भयावह तस्वीर को कभी नहीं दिखाएंगे। लेकिन ये सच में बेहद गंभीर दृश्य है। इसपर ठहरकर सोचने की जरूरत है, लोकतंत्र खत्म होगा तो सिर्फ मेरे लिए नहीं होगा, सिर्फ विपक्षी पार्टियों और लेखकों के लिए नहीं होगा। अगर लोकतंत्र कुचलकर दमन शुरू हुआ तो वह सबके लिए होगा। अब भी वक्त है, इस देश के असली दुश्मनों को पहचान लीजिए, अब भी वक्त है इस दलाल मीडिया को पहचान लीजिए। मोदी की उमर कुछ और वर्ष भर है, लेकिन ये देश आपका है, इस देश में से लोकतंत्र खत्म होगा तो बड़ा मुश्किल हो जाएगा इसे लौटने में।

(लेखक युवा पत्रकार एंव टिप्पणीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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