चर्चा में देश

नए कृषि कानून अगले 20-30 सालों में किसानों की एक बड़ी आबादी को बंधुआ मजदूर बना देगा.

विश्वदीपक

दिल्ली के तख्त पर पिछले 70 सालों में इतना बड़ा मूर्ख कभी नहीं बैठा। ऐसा लगता है कि पूरी की पूरी मंडली धूर्त और दोयम दर्जे के दलालों से भरी पड़ी है।  पहले नोटबंदी से गरीबों को तबाह कर दिया। फिर ऐसा जीएसटी लाया जिसकी उलझनें आज तक नहीं सुलझ पा रही हैं। राज्यों का हक मार दिया अलग से। जीएसटी की नई व्यवस्था ने लूट का एक अलग तंत्र खड़ा कर दिया है। महीने में 20-30 हज़ार की बचत करने वाले छोटे व्यापारियों को जीएसटी भरने वाले लूट रहे है। कहीं भी जाइए किसी से भी बात कीजिए पता लग जाएगा कि कैसे साल दर साल छोटे और मझोले उद्योग तबाह हो गए। गरीब और गरीब होते गए। दलाल और कथित देशभक्त जिनका पेशा गरीबों की हत्या करना है – मालामाल हो रहे हैं।

अब बचा था कृषि क्षेत्र तो उसको भी तबाह करने पर आमादा है। इतना बड़ा बेवकूफ अब तक नहीं देखा। अबे अक्ल के अंधे जिस देश के अधिकतर गांवों में अभी भी 24 घंटे बिजली नहीं रहती, वहां तू इंटनेशनल मॉर्केट खोलने जा रहा है।  मेरा नहीं, मशहूर कषि वैज्ञानिक देविंदर शर्मा का कहना है कि अमेरिका के मक्का किसानों को आज 70 के दशक से भी कम मूल्य मिल रहा है। वजह है मुक्त बाज़ार की व्यवस्था। जब सब बाज़ार को ही निर्धारित करना है तो फिर भाई तेरा क्या काम ? तू जा फिर कहीं ध्यान लगा।

सोचिए, अगर अमेरिका के किसानों का 40 साल पहले लागू हुई मुक्त बाज़ार व्यवस्था में आज यह हाल है तो फिर भारत का क्या होगा ? मुक्त बाज़ार में वो दौड़ पाता है जिसके पांवों में ताकत होती है। भारत के किसान तो पहले से ही अपंग हैं। इनके न पैरों में दम है, न फेफड़ों में। न चकबंदी हुई आज तक, न रोड है, न पानी। जल संरक्षण, भूमि सुधार, भूमि तरण की बात छोड़ दीजिए। बारिश का हाल यह है कि आधा भारत पीने के पानी के लिए संघर्ष करता है। नहरें सूखी हुई हैं। किसान सिंचाई करेगा कहां से – तुम्हारे बंगले में लगे ट्यूबेल से ? भारत के अधिकतर किसान बेचने के लिए नहीं अपना और परिवार का पेट भरने के लिए खेती करते हैं।इतने सब व्वयधानों के बाद थोड़ा बहुत कहीं बेच लें तो समझो किस्मत अच्छी है।

और तू कह रहा है कि भारत का किसान अब अपना उत्पाद/सामान इंटरनेशन मॉर्केट में बेचेगा। भाई, यहां के अधिकतर किसान छोटे और मझोले  हैं। वो अपने परिवार का पेट भर लें – यही बहुत है। अगर तुझे ये बातें नहीं पता है तो किसी से पूछ ले। गोविंदाचार्य से ही पूछ लेता। मशहूर कृषि वैज्ञानिक देविंदर शर्मा बताते हैं कि अमेरिका के ग्राणीण इलाकों में  आत्महत्या की दर शहरों के मुकाबले 45 फीसदी ज्यादा है। अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देशों में डेयरी फर्म बंद हो रही हैं। फ्रांस जैसे विकसित देशों में भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

मुक्त बाज़ार व्यवस्था लागू होने के बाद भी अमीर देश अपने किसानों को 246 अरब डॉलर की सब्सिडी देते हैं। क्यों ? क्योंकि मुक्त बाज़ार की व्यवस्था काम नहीं कर रही है। अगर विकसित देशों में यह हाल है तो फिर भारत में क्या होगा आप सोचिएगा। मैंने पहले भी कहा था, फिर कह रहा हूं कि भारत तेज़ी से गुलामी की ओर बढ़ रहा है। नए कृषि कानून अगले 20-30 सालों में किसानों की एक बड़ी आबादी को बंधुआ मजदूर बना देगा।  याद रखिएगा।

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)