मौलाना महमूद उल हसन की कोशिशों से काबुल में बनी थी भारत की पहली स्वंतत्र सरकार, राजा महेंद्र प्रताप बने थे…

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श्याम सिंह रावत

क्या आपको मालूम है कि 21 अक्टूबर, 1943 को बनी नेताजी सुभाष चद्र बोस की आजाद हिंद सरकार से 27 साल पहले ही एक राष्ट्रीय सरकार का गठन हो चुका था? सन 1914 ई. में मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी ने काबुल (अफ़गानिस्तान) में भारत की प्रथम स्वंतत्र सरकार 9 जुलाइ, 1916 को बना दी थी। जिसके राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप सिंह और प्रधानमंत्री शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन को बनाया गया था।

क्या आप जानते हैं कि 30 मई, 1866 को स्थापित दार-उल-उलूम देवबंद की देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका थी? एशिया के इस सबसे बड़े इस्लामिक शिक्षा केंद्र के विख्यात अध्यापक व संरक्षक विद्वान मौलाना महमूद अल-हसन उन सेनानियों में से एक थे जिनकी लेखनी, ज्ञान, आचार तथा व्यवहार से एक बड़ा समुदाय प्रभावित था। अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण इन्हें शेख-उल-हिंद (भारतीय विद्वान) की उपाधि से विभूषित किया गया था।

शेख-उल-हिंद मौलाना महमूद अल-हसन राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक अग्रणी नेता थे। शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने अभूतपूर्व योगदान किया। हकीम अजमल खान जैसे आंदोलनकारियों के साथ मिलकर उन्होंने अंग्रेजी हस्तक्षेप से परे दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया की स्थापना की। मौलाना महमूद अल-हसन (शेख-उल-हिंद) की विद्वता और शिक्षा के प्रति गहरे लगाव के कारण ही इन्हें इमदादुल्लाह के हज़ पर जाने के बाद दार-उल-उलूम देवबंद का ख़लीफ़ा बनाया गया था।

वे अपने मुस्लिम छात्रों को राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उन्होंने भारत के भीतर और बाहर दोनों ओर से ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह शुरू किया। देश-विदेश में फैले उनके असंख्य शिष्यों में से बड़ी संख्या में इस आंदोलन में शामिल हो गए। उनमें सबसे प्रसिद्ध मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी और मौलाना मुहम्मद मियां मंसूर अंसारी थे।

मौलाना महमूद अल-हसन (शेख-उल-हिंद) ने 1878 में अंजुमने समरतुत की शुरुआत कर आज़ादी का संघर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की 28 दिसंबर, 1885 को स्थापना होने से भी पहले चालू कर दिया था और 1909 में जमीयत-उल-अंसार की बुनियाद डाली।

शेख-उल-हिंद ने आज़ादी की लड़ाई तेज करने के लिए दार-उल-उलूम के अंदर एक संगठन खड़ा किया जिसकी सरगर्मी सरहदी इलाक़ों में अधिक थी। इस संगठन की बागडोर मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी के हाथ में सौंपी गई थी और 1913 में मुरादाबाद में सम्पन्न हुए इसके पहले सम्मेलन के बाद देश में अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध व्यापक तैयारी शुरू हो गई। जिसके तहत रेशमी रूमाल जैसा एक महत्वपूर्ण गुप्त आंदोलन शुरू हुआ। अंग्रेजों की नजर बचाकर आजादी के दीवाने अपनी गुप्त योजनाओं का संदेश रेशमी रूमाल पर लिखकर आदान-प्रदान करते थे।

मौलाना महमूद अल-हसन ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, तुर्की, सऊदी अरब व मिश्र में जाकर अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किये जा रहे अत्याचारों के विरुद्ध प्रचार किया। यहां तक कि उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान व ईरानी शासकों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के कार्यक्रमों में सहयोग देने के लिए तैयार करने में एक विशेष भूमिका निभाई। उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान व ईरान को इस बात पर राज़ी कर लिया कि यदि तुर्की की सेना भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड़ने को तैयार हो जाये तो ज़मीन के रास्ते तुर्की की सेना को आक्रमण के लिए आने देंगे।

सन 1914 ई. में मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी ने अफ़गानिस्तान जाकर अंग्रेज़ों के विरुद्ध अभियान चलाया और काबुल में रहते हुए भारत की प्रथम स्वंतत्र सरकार 9 जुलाइ, 1916 को काबुल में बना दी थी।

इस सरकार का राष्ट्रपति राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को बनाया गया।

➤ राजा महेंद्र मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी उस सरकार के प्रधानमंत्री बने।

➤ मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली इस सरकार में मंत्री थे।

मौलाना महमूद अल-हसन ने अपने शिष्य मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी को काबुल भेजने के साथ ही स्वयं हिज़ाज़ (अरब) की ओर प्रस्थान किया ताकि तुर्की हुकूमत से स्वतंत्रता आंदोलन के लिए मदद ली जा सके। इन्होंने वहां भी रेशमी रूमाल के जरिये अपने गुप्त संदेश मक्का और मदीना के गवर्नर को तथा मौलाना मुहम्मद मियां मंसूर अंसारी के हाथ सीमांत इलाक़ों में भेज दिया। जिसकी भनक अंग्रेज़ों को लग गई और इनका रहस्य खुल गया। मौलाना महमूद हसन और उनके साथी मौलाना वहीद अहमद फैज़ाबादी, मौलाना अज़ीज़ गुल, हकीम सैय्यद नुसरत हुसैन को गिरफ़्तार कर मॉल्टा भेज दिया गया। शेख-उल-हिंद 3 साल 19 दिन तक माल्टा की जेल में रहे। वे जब 8 जून, 1920 को पानी के जहाज से मुंबई पहुंचे तो उनका स्वागत करने वालों में महात्मा गांधी जैसे लोग भी थे।

इतिहास गवाह है कि अंग्रेज तत्कालीन मदरसों को राष्ट्रवाद का केंद्र कहते थे और इन्हें बंद करवा देते थे। आज भी वही काम हो रहा है। आजादी का इतिहास मिटाया जा रहा है। देश के इतिहास के पुनर्लेखन की जरूरत बताई जा रही है क्योंकि संघ ने देश की बलिवेदी पर शीश अर्पित करने वाले नहीं, गोडसे जैसे कलंक पैदा किये। इसीलिए देश की आजादी के आंदोलन में विघ्न डालने वाले नागपुरिया विषविद्यालय वाले आपको यह कभी नहीं बतायेंगे कि 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष में 5 लाख उलेमाओं ने भी शहादत दी थी। जी हाँ, आपने ठीक पढ़ा है 5 लाख! अकेले एक कस्बे देवबंद जैसी छोटी बस्ती में ही 44 लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था।

भारत की इस पहली आजाद सरकार को सौ-सौ सलाम! देश के लिए किया गया इनका तप-त्याग आज भी हम पर कर्ज है, जिसे हम भूल गये हैं। देश की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले सभी अनाम शहीदों को हजारों-हजार सलाम!