पुलिस को लेकर चीफ जस्टिस की चिंता जायज है, लेकिन समाधान कैसे हो, यह उससे भी बड़ी चिंता है।

विजय शंकर सिंह

‘पुलिस स्टेशन मानवाधिकारों एवं मानवीय सम्मान के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। मानवाधिकारों के हनन और शारीरिक यातनाओं का सबसे ज्यादा खतरा थानों में है। थानों में गिरफ्तार या हिरासत में लिये गये व्यक्तियों को प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिल पा रही है, जबकि इसकी बेहद जरूरत है।’ यह कथन है भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमन्ना का। उन्होंने पुलिस के बारे में जो कहा है, वही धारणा अमूमन आम जनता की भी है।

पुलिस हिरासत में यातना, मौत, असंयमित बल प्रयोग, राजनीतिक दृष्टिकोण और पूर्वाग्रह से काम करना, फर्जी मुठभेड़ें आदि कई आरोप पुलिस पर लगते रहते हैं। यह एक व्यवस्थागत दोष है। एक पूर्व पुलिसकर्मी होने के बावजूद जस्टिस रमन्ना की इन बातों का मैं प्रतिवाद नहीं कर रहा हूं। हमें ईमानदारी से इन व्याधियों के बारे में सोचना होगा और उनके समाधान का प्रयास करना होगा।

साठ के दशक में इलाहाबाद हाइकोर्ट के जस्टिस एएन मुल्ला ने पुलिस के बारे में एक बेहद तल्ख टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, ‘मैं जिम्मेदारी के सभी अर्थों के साथ कहता हूं, पूरे देश में एक भी कानूनविहीन समूह नहीं है, जिसके अपराध का रिकॉर्ड अपराधियों के संगठित गिरोह भारतीय पुलिस बल की तुलना में कहीं भी ठहरता हो।’ हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने उक्त अंश को उत्तर प्रदेश सरकार की अपील पर हटा दिया था, पर अब भी उसे यदा-कदा उद्धृत किया जाता है।

समय के अनुसार कानून बदले, पुलिस भर्ती व ट्रेनिंग का स्वरूप बदला, आधुनिक सोच के लोग पुलिस सेवा में आने लगे, कानून के अधिकारों और मानवाधिकार के प्रति जागरूकता बढ़ी, पुलिस कमीशन बने, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद कुछ सुधार कार्यक्रम भी शुरू हुए, पर नही बदली तो पुलिस के बारे में लोगों की धारणा।

अंतरराष्ट्रीय संस्था ह्यूमन राइट्स वाच ने 2009 की एक रिपोर्ट में निम्न बातें रेखांकित की थीं- भारत में पुलिस में जवानों की संख्या पर्याप्त नहीं है, जरूरी प्रशिक्षण भी नहीं है और उनके हथियार दोयम दर्जे के हैं। लोग डर के चलते सामान्य तौर पर पुलिस से व्यवहार ही नहीं करते। राजनीतिक लोग पुलिस के काम में दखल देकर अक्सर उन्हें जटिल बना देते हैं। काम करने की खराब स्थितियों और अपराधियों के छूट जाने से पुलिसिया ढांचे में शॉर्टकट अपनाने का प्रचलन बढ़ा है।

अवैध हिरासत, यातना, खराब व्यवहार तथा अपराधियों को सजा दिलाने में नाकामी से गलत अपराध स्वीकृति करवाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ये निष्कर्ष पीड़ितों और पुलिसकर्मियों की गवाही पर आधारित थे। इस अध्ययन का यह भी निष्कर्ष था कि सरकार द्वारा जवाबदेही तय करने में नाकामी से पुलिस के खराब व्यवहार को बल मिला।

अन्य अध्ययन रिपोर्टों से भी यही निष्कर्ष निकलता है। साल 2006 में प्रकाश सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी पुलिस को गंभीर दुर्व्यवहार के लिए जो संरक्षण प्राप्त है, उसे भी नहीं छुआ गया। किसी भी सुधार एजेंडे में निचले दर्जे के पुलिसकर्मियों की स्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इससे कुंठा जन्म लेती है और उसकी स्वाभाविक प्रतिक्रिया दुर्व्यवहार में होने लगती है।

हालांकि इधर आवासीय और काम करने की जगहों पर बहुत सुधार हुआ है, पर यह बड़े शहरों या जिला मुख्यालयों में ही अधिक हुआ है। यह क्रम जारी है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को पुलिस शिकायत प्राधिकरण गठित करने का निर्देश दिया है, ताकि पुलिस के गलत व्यवहार की शिकायत की जा सके, लेकिन अधिकतर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में प्राधिकरण का गठन ही नहीं किया गया।

इधर पुलिस में एक और प्रवृत्ति जड़ जमा रही है, जो मानवाधिकार उल्लंघन का मुख्य कारण है। वह है, पुलिस बल का धर्म और जाति के आधार पर धीरे-धीरे ध्रुवीकृत हो जाना। यह राजनीतिक दखल का घातक परिणाम है और इसे रोका न गया, तो यह समस्या लोकतंत्र और देश की एकता के लिए संकट का कारण बन सकती है। विशेष आतंकवाद निरोधक कानूनों ने अपना लक्ष्य हासिल किया या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन इनके दुरुपयोग पर अदालतों ने कड़ी टिप्पणियां की हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पुलिस जनहित के प्रति उतनी गंभीर नहीं है, जितना उसे होना चाहिए। ये समस्याएं अधिकारियों की जानकारी में हैं और उन पर विभाग के अंदर चर्चा भी होती है और बेहतरी के प्रयास भी किये जाते हैं। पक्षपात रहित प्रोफेशनल पुलिस के संबंध में सबसे बड़ा सवाल है कि राजनीतिक दलों की अवांछित दखल से पुलिस को कैसे मुक्त रखा जाए।

लोकतंत्र में पुलिस को राजनीतिक नियंत्रण से बिल्कुल मुक्त भी नहीं किया जा सकता है और न ही सेना की तरह उसे अराजनीतिक बनाया जा सकता है। ऐसी स्थिति में सभी दलों को विधि के शासन के हित में ऐसी सीमा खींचनी पड़ेगी कि राजनीतिक दखल जनहित में हो और कानून को बनाये रखने के लिए हो, न कि दलगत हित साधने या धार्मिक और जातिगत समीकरणों के अनुरूप हो। केवल अफसरों के बल पर ही पुलिस को प्रोफेशनल स्वरूप नही दिया जा सकता है।

प्रधान न्यायाधीश की चिंता जायज है। इसका समाधान कैसे हो, यह उससे भी बड़ी चिंता है। पुलिस अपने संसाधनों में तो आधुनिक हो रही है, पर आधुनिक और वैज्ञानिक सोच का असर उसके प्रोफेशनलिज्म पर भी पड़े, यह बहुत जरूरी है।

(लेखक पूर्व आईपीएस हैं)

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