चर्चा में देश

पूंजीवादी व्यवस्था इतनी कमजोर नहीं है, उसके पास तिकड़मों का पूरा भंडार है

मुकेश असीम

क्या किसान समाज बदलने या क्रांति करने के लिए लड़ रहे हैं? नहीं। किसान मालिक वर्ग है जो कॉर्पोरेट पूंजी द्वारा अपनी संपत्ति से बेदखल कर दिये जाने के खतरे से भयभीत होकर लड़ रहे हैं। क्या यह खतरा वास्तविक है? बिल्कुल। पूंजीवाद की नैसर्गिक गति है बड़े पूँजीपतियों की ‘तरक्की’ के सामने अन्य मालिकों – किसानों, छोटे करखनेदारों-व्यापारियों, दुकानदारों, पेशेवरों – की बरबादी और उन्हें पूँजीपतियों का जरखरीद बनाया जाना। स्वाभाविक है ऐसी लड़ाई का नेतृत्व किसान आबादी का धनी तबका ही कर रहा है – उन्हें 5 दशक की पहले चरण की पूंजीवादी खेती से सर्वाधिक लाभ जो हुआ था। लेकिन सिर्फ धनी किसान आंदोलन को इतना मजबूत, टिकाऊ नहीं बना सकते थे। उन्हें छोटे-मँझोले किसानों की हिमायत हासिल है। क्यों? एक, जिस छोटे किसान तबके ने पिछले दशकों में भी बरबादी झेली और उसका खेती से लगाव खात्मे की ओर था उसे भी नोटबंदी से तालाबंदी तक शहरी-औद्योगिक रोजगार के संकट ने ऐसा झटका दिया है कि वो अब अपनी छोटी जमीन को दुर्दिन का अंतिम आसरा समझ रहा है। दूसरे, हालाँकि उसके पास बेचने के लिए बहुत कम होता है पर छोटे से छोटे विक्रेता का भी ‘अच्छे दाम’ की ओर स्वाभाविक आकर्षण होता है। अतः निश्चित दाम पर ख़रीदारी की गारंटी की मांग उसे अपील करती है।

इसका सियासी महत्व क्या है? पूंजीवाद छोटे मालिकों को बरबाद करता है पर वे उसका सबसे बड़ा सामाजिक आधार भी होते हैं। अतः उनकी तबाही के दौर में बड़े पूँजीपतियों के संरक्षण में प्रतिक्रियावादी मुहिम खड़ी की जाती है जो उन्हें बताती है कि उनकी तकलीफ़ों की वजह कामचोर ऊँची मजदूरी मांगने वाले श्रमिक हैं, हजार साल गुलाम रखने वाले मुसलमान हैं, अपने अधिकार-हिस्सा मांगने वाले दलित-आदिवासी है, मुक्ति चाहने वाली स्त्रियाँ हैं, आदि-आदि – ये सब मिलकर विकास नहीं होने दे रहे। अगर एक मजबूत, 56 इंची छाती वाले नेता को देश सौंप दिया जाये तो विकास तेज होगा और उनके समृद्ध जीवन में रुकावट डालने वालों को सबक सिखाया जा सकेगा। 1980 के दशक से अब तक की संक्षिप्त कहानी यही है जिसमें दिल्ली के चारों ओर के ये किसान इस मुहिम के सबसे बड़े आधार थे, खास तौर से 2013 मुजफरनगर से 2020 दिल्ली हिंसा-जेएनयू हमले तक। पर 2020 में ही वास्तविकता से इनका पाला पड़ा और इन्होने पाया कि उन्हें बरबाद करने वाला तो उनका मसीहा ही है जो असल में अंबानी-अदानी का ताबेदार है। इसलिए वे रोष में हैं। किया क्या जाये?

 

एक विकल्प है – तुम ही मोदी को लेकर आए थे, तुम मजदूर विरोधी, सांप्रदायिक-जातिवादी-स्त्रीविरोधी हो, दूर रहो। दूसरा विकल्प – सच कहना। कॉर्पोरेट पूंजी से आपका भय उचित है। आप अपनी बेदखली के खिलाफ दृढ़ता से लड़ रहे हो। पर कॉर्पोरेट पूंजी का यह हमला तो पूंजीवादी व्यवस्था का ही परिणाम है। सरकार सियासी तिकड़म के लिए तीन कानून वापस ले ले तब भी यह नहीं रुकने वाला क्योंकि इनसे वह काम सिर्फ तेज होना है जो आधा पहले ही हो चुका है। जब तक पूंजीवाद है वह बड़े पूँजीपतियों के हितों को सैंकड़ों तिकड़मों से पूरा कर सकता है। इसलिए यह लड़ाई इन कानूनों की वापसी से खत्म नहीं होने वाली। आप एमएसपी पर जो खरीद गारंटी माँग रहे हो वह तो कॉर्पोरेट के बजाय ‘राज्य’ के साथ कांट्रैक्ट खेती की माँग है। पूँजीपतियों के मुनाफे की सुरक्षा के लिए बनी सरकार कभी ऐसा नहीं कर सकती। ऐसा कांट्रैक्ट तो सिर्फ वही सरकार कर सकती है जो पूरे समाज के लिए भोजन की व्यवस्था को अपनी ज़िम्मेदारी मानती हो। यह सरकार तो ऐसा नहीं मानती। यह तो रही-सही खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को खत्म कर पूरा अनाज व कृषि उपज व्यापार पूंजीपतियोंके हाथ में सौंपना चाहती है। आप जो कांट्रैक्ट चाहते हो वह सिर्फ मजदूर वर्ग की समाजवादी सरकार कर सकती है जैसा उसने रूस में एक वक्त किया था, सामूहिक फार्मों में संगठित किसानों के साथ – सरकार किसानों को मशीनों सहित सभी इनपुट उपलब्ध कराएगी और उनकी समस्त सरप्लस उपज को निश्चित दाम पर खरीद लेगी क्योंकि वह सभी गैर कृषि नागरिकों की भोजन व्यवस्था को अपनी ज़िम्मेदारी मानती थी।

मुझे लगता है किसान आंदोलन की हिमायत इस वैचारिक-राजनीतिक प्रचार के साथ की जानी चाहिये। फासिस्ट सत्ता और उसके इस बड़े आधार के बीच जो दरार पैदा हुई है उसे सघन और धैर्यपूर्ण प्रचार से चौड़ा-गहरा किया जाना चाहिये। हालाँकि इसका मतलब उनकी प्रतिक्रियावादी प्रवृत्तियों का समर्थन या उनके किसी ऐसे नेता को हीरो बनाना नहीं होना चाहिये। नहीं तो अन्ना हज़ारे जैसा नतीजा सामने आ सकता है। पूंजीवादी व्यवस्था इतनी कमजोर नहीं है। उसके पास तिकड़मों का पूरा भंडार है ऐसे तत्वों को हैंडल करने का। इसलिए व्यक्तियों नहीं, आम खास तौर पर छोटे मँझोले किसानों पर ध्यान देने की जरूरत है। कितना हो सकेगा, कहना मुश्किल है, पर करना जरूरी है।

क्या शुरू से मेरा यही विचार था? नहीं। आंदोलन के दौरान सामने आये तथ्यों को देखते हुये बना है। इसे पलटना कहा जा सकता है पर तथ्यों को स्वीकार करने के लिए पलटने से मुझे गुरेज नहीं। पुनश्च – मजदूर वर्ग अपने वर्गीय आंदोलन को मजबूती दे तभी इसे दिशा दे सकता है अन्यथा नहीं। सिर्फ इसके पीछे मजदूर वर्ग के जुटने में कोई लाभ नहीं। मजदूर वर्ग का अपना आंदोलन मजबूत होगा तभी किसान सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व को स्वीकार करेंगे। हमारी मुख्य समस्या तो वही है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)