जनसंख्या नियंत्रण कानून का सुर्रा

आलोक कुमार मिश्रा

आजकल हमारे देश में नए-नए कानून लाकर राष्ट्र कल्याण करने और पिछले लंबे समय से चली आ रही गलतियों को सुधारने की बात जोर-शोर से उठाई जा रही है। मज़े की बात ये है कि इन्हें विपक्ष या समाज के बौद्धिक वर्ग की तरफ़ से नहीं खुद वर्तमान सत्ता पक्ष या उसके समर्थन में काम करने वाले सामाजिक सांस्कृतिक संगठनों द्वारा ही हवा दी जा रही है। उठाए जा रहे मुद्दों में जनसंख्या नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कानून और समान नागरिक संहिता की मांग सबसे ऊपर है। एक बड़ी जनसंख्या और लोकतांत्रिक देश के तौर पर भारत में ऐसी मांग को कोई भी जायज़ कह सकता है। पर जैसे ही इन मांगों के साथ चिपकी मंशा और यथार्थ वस्तुस्थिति का भान होता है तो स्थिति बदल जाती है। फिलहाल मैं यहाँ जनसंख्या नियंत्रण कानून के संदर्भ में अपनी बात कहना चाहता हूं।

बढ़ती जनसंख्या दशकों से भारत में चिंता का एक विषय रहा है। भारत दुनिया का पहला देश रहा है जिसने 1952 से ही परिवार कल्याण और नियोजन के कार्यक्रम की शुरुआत की। समय समय पर इसमें व्यापक बदलाव भी किए जाते रहे। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 और राष्ट्रीय जनसंख्या नीति, 2020 इन्हीं नीतिगत प्रयासों की कड़ी में सामने आए। प्रत्येक दशक में होने वाली जनगणना की कार्यवाही इस बार कोविड महामारी के कारण स्थगित हो गई है। वरना 2021 में यह बड़ा कार्यक्रम संपन्न हो गया होता। हम 138 करोड़ की अनुमानित जनसंख्या के साथ शीघ्र ही चीन को पछाड़कर पहले स्थान पर पहुंचने वाले हैं। अक्सर इस स्थिति को नकारात्मक तथ्य के तौर पर उकेरते हुए चर्चा की जाती है। किंतु इस बड़ी आबादी के आंकड़े को देखकर इस दिशा हमें मिली अब तक की उपलब्धियों को भूलना नहीं चाहिए।

एक विविधतापूर्ण लोकतांत्रिक देश होने के कारण हम चीन की तरह से एक या दो संतान ही पैदा करने की बाध्यकारी नीति लागू नहीं कर सकते थे। हमने इसे जागरूकता के आधार पर स्वैच्छिक निर्णय के तौर पर बढ़ावा दिया। हम दो हमारे दो का लोकप्रिय नारा गांव गांव गली गली में लोकप्रिय हुआ। इन सब पर सत्तर अस्सी के दशक की जनसंख्या विस्फोट वाली स्थिति के बाद और भी जोर दिया गया। आज इसके सुखद परिणाम सामने दिख रहे हैं। हाल ही में छपी ख़बरों के अनुसार भारत में जनसंख्या वृद्धि की दर जनसंख्या स्थिरीकरण के स्तर को छू चुकी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे- 5 के हवाले से यह बात पता चलता है कि भारत में टोटल फर्टिलिटी दर 2015-16 के 2.2% के मुकाबले 2019-21 में गिरकर 2.0% के स्तर पर आ चुकी है। ऐसा माना जाता है की टीएफआर का स्तर 2.1% होने पर नई पीढ़ी की जनसंख्या में उतनी वृद्धि दर्ज़ होती है जिससे पुरानी पीढ़ी का स्थान भर सके। इसे जनसंख्या प्रतिस्थापन दर भी कहा जाता है। यानी प्रति जोड़े दो बच्चे जो आगे अपने माता-पिता की पीढ़ी का स्थान ले सकें। बस शर्त ये है कि बड़ी संख्या में माइग्रेंट आबादी का आना-जाना न हो। इसमें दशमलव एक प्रतिशत अनेपेक्षित कारणों से हो जाने वाली मृत्यु को ध्यान में रखकर ज्यादा रखा जाता है। भारत द्वारा प्राप्त किया गया यह स्तर क्या किसी भी बड़ी उपलब्धि से कम है वो भी बिना किसी बाध्यकारी कानून के?

पर भारत में जनसंख्या पर होने वाले विमर्श में धर्म और सांप्रदायिकता का लेंस हावी रहता है। इसमें सत्य को आधे-अधूरे या फिर गोल- मोल रूप से प्रचारित करके लोगों को उद्वेलित किया जाता है। एक बड़े तबके में यह समझ स्थापित कर दी गई है कि जनसंख्या की तीव्र वृद्धि में अल्पसंख्यकों और उनमें भी मुसलमानों की हिस्सेदारी ज्यादा है। इसके पीछे के कारणों में बहुसंख्यकों के बीच यह प्रचारित किया गया है कि इस समुदाय में बहुविवाह करके और जानबूझकर ज्यादा बच्चे पैदा कर अपने पक्ष में जनसंख्यकीय बदलाव लाने की इच्छा काम कर रही है। चार विवाह और कई बच्चों का जुमला इनके लिए प्रचलित कर दिया गया है। कुछ वास्तविक उदाहरण इसे मजबूत बनाने के लिए प्रस्तुत भी कर दिए जाते हैं। पर कुछ सेलेक्टिव लोग या अपवाद किसी समुदाय का पूरा सच नहीं हो सकते। इन बातों की ताकीद जनगणना या सरकार द्वारा वैज्ञानिक तरीके से जुटाए जाने वाले आंकड़े नहीं करते।

बेशक पिछले दशकों में मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर अन्य समुदायों से अधिक रही है, लेकिन फासला इतना भी अधिक नहीं रहा है कि कुल आबादी में हिस्सेदारी के प्रतिशत पर कोई बड़ा प्रभाव पड़े। और फिर वृद्धि दर का ये फासला घटते-घटते अब नगण्य के नज़दीक दिखाई देता है। पिछले दशक में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या वृद्धि में गिरावट की दर सभी समुदायों से अधिक भी रही है। वैसे भी किसी समुदाय में जनसंख्या वृद्धि का मामला उसकी आर्थिक स्थिति और शिक्षा के स्तर से अधिक प्रभावित होती है, बनिस्बत किसी और बात के। आइए, इसे आंकड़ों से समझते हैं।

सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे से मिले नए आंकड़ों के अनुसार भारत ने जनसंख्या प्रतिस्थापन दर को प्राप्त करके जनसंख्या स्थिरीकरण की स्थिति पर पहुंच गया है। प्रति महिला बच्चे पैदा करने की दर 2022 में 2.159 हो गई है। यह दर 2020 में 2.2 थी। 0.92% की यह गिरावट बहुत उल्लेखनीय है। यदि इसी आंकड़े को समुदायगत आधार पर देखें तो भी पता चलता है कि वृद्धि दर में अंतर मिटता जा रहा है और निरंतर गिरावट जारी है। पांचवे राउंड के नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक मुसलमानों में कुल फर्टिलिटी दर 2.2 पर आ गई है। हिंदुओं में ये दर 1.94, ईसाइयों में 1.88, सिखों और जैनों में 1.6 तो बौद्धों में 1.39% तक पहुंच गई है। कुल एफटीआर 2.0 होकर प्रतिस्थापन दर 2.1% से नीचे आ गई है, जो कि सुखद है। हालांकि कुल जनसंख्या में होने वाली वृद्धि पर इसका प्रभाव कुछ दशकों में जाकर दिखेगा। तब तक हम डेढ़ अरब से ज्यादा की आबादी के साथ सबसे बड़ी आबादी वाला देश हो जायेंगे।

कुल फर्टिलिटी दर में सबसे अधिक तेजी से गिरावट मुसलमानों में दिखाई दी है। 1992-93 से 2015-16 के बीच इसमें 0.8% की गिरावट के साथ ये 4.1 से 2.1 तक पहुंचकर वृद्धिदर में 41% की गिरावट दिखाती है। जोकि इसी दौर में हिंदुओं में इस वृद्धिदर में 35% की गिरावट से ज्यादा है। ये आंकड़े फैलाए गए प्रोपेगेंडा की हवा निकाल देते हैं। आज जब हम जनसंख्या वृद्धि के प्रतिस्थापन दर पर पहुंच गए हैं तब इसे रोकने को लेकर हो-हल्ला मचाना कहां तक सही है? क्या इतनी बड़ी उपलब्धि को हमें सेलिब्रेट नहीं करना चाहिए? पर बजाय इसके हमारे यहां कुछ लोग मुस्लिम विरोध में अंधे होकर चार विवाह और चालीस बच्चे जैसे अपमानजनक जुमले उछालकर इसे नफ़रत का जरिया बना रहे हैं। आख़िर इस स्तर पर पहुंच कर जनसंख्या वृद्धि नियंत्रण कानून लाने का सुर्रा यही तो है। जब हमें अपनी सबसे बड़ी युवा आबादी को बेहतरीन अवसर देकर अपने विकास के लिए इसे प्रयोग करना चाहिए, तब हम बेकार के विवादों में उलझ रहे हैं। याद रहे, जनसांख्यिकी का यह लाभ हमेशा नहीं बना रहेगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

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