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तो इसलिये दिलीप कुमार को कहा जाता है ट्रेजडी किंग

इज़हार आरिफ सैयद

हिंदी फिल्मो में 1960 से 1974 तक और  तमिल और तेलगु सहित फिल्मो के 1954 से लेकर 1978 तक के प्रोडूसर डायरेक्टर ए भीमसिंह का नाम पुरानी हिंदी फिल्मो में अक्सर देखा जाता था, लेकिन उनके बारे में बहुत ही कम लोग जानते है और उनके बारे में लिखा भी बहुत कम गया है। वो यूं तो दक्षिण भारत के थे  लेकिन हिंदी फिल्मे मेहरबान (सुनील दत्त, महमूद) साधु और शैतान (महमूद) आदमी (दिलीप कुमार, मनोज कुमार, वहीदा) गोपी (दिलीप, सायरा) मालिक (राजेश खन्ना) जोरू का गुलाम (राजेश खन्ना, नंदा) लोफर (धर्मेंद्र, मुमताज़) जैसी फिल्मे सफल फिल्मे उनके खाते में रही है।

दिलीप कुमार के साथ साधु और शैतान, आदमी, और गोपी में काम करके वो दिलीप साहब की हर राय और तकनीक तथा अभिनय पर उनकी भारी पकड़ के क़ायल हो चुके थे।  1974 में वो अपनी लिखी एक कहानी की स्क्रिप्ट लेकर दिलीप कुमार के घर पहुंचे और दिलीप साहब को बोला, सर, ये कहानी मैंने आपको ध्यान में रखकर ही लिखी है और मेरी ये फिल्म आपको ही करनी है।  कहानी के बारे में उन्होंने बताया के इस  कहानी में हीरो के एक-दो नहीं पूरे 9 रोल है।  दिलीप साहब कहानी के बारे में जानने को और उत्सुक हुए।  उन्होंने स्क्रिप्ट लेकर रख ली और उसे पढ़ा। बाद में भीम सिंह को उन्होंने कहा के तुम्हारी कहानी यक़ीनन बहुत अच्छी और यूनीक है लेकिन इस वक़्त मेरे पास बिलकुल भी समय नहीं है सिलए मैं माफ़ी चाहता हूँ, तुम इसके लिए संजीव कुमार को ले लो।  वो इस कहानी के लिए बिलकुल परफेक्ट रहेगा। काफी इसरार के बाद भी दिलीप साहब  अपनी बात पर अड़े रहे और भीम सिंह जानते थे के दिलीप एक साल में केवल एक ही फिल्म करते है।

उन्होंने ये कहानी जब संजीव कुमार के सामने रखीं तो संजीव कुमार ये सुनकर के दिलीप साहब ने उनका नाम प्रोपोज़ किया किया है, फ़ौरन तैयार हो गए और जया भादुड़ी के साथ उन्होंने ये फिल्म की जिसका नाम था “नया दिन नई रात” फिल्म कलेक्शन में तो औसत रही लेकिन क्रिटिक्स ने इसे काफी अपरिसीएट किया।  जिन्होंने फिल्म नहीं देखी है और दो घंटे से ज़्यादा बर्बाद नहीं करना चाहते है उन्हें मेरा मशविरा है के हुज़ूर फिल्म के आखरी तीन मिनट देख लें जिसमे सभी यानि 9 के 9 एक साथ शादी पर इकट्ठा होते है और स्पेशली वो कर्नल और ज़न्खा!!

अब विषय से थोड़ा हटकर में आपको बताते हैं कि एक बार फिल्म “कश्मीर की कली” के एक गाने “ये चाँद सा रोशन चेहरा, ये ज़ुल्फो  का रंग सुनहरा” की रिकॉर्डिंग के दौरान शम्मी कपूर ने ओ पी नैय्यर से कहा के इस गाने के मुखड़े की आखिरी लाइन को गाने के बिलकुल आखिर में, मैं चाहता हूँ के इसे  छह बार (हर बार नई तरह से गाया जाए)  रिपीट किया जाए और मैं हर रेपीटीशन पर अलग एक्शन दूँ।  नैय्यर ये बात सुनकर मुस्कराये और बोले बहुत ही बचकाना बात होगी और गाना इतना लम्बा हो जायेगा के लोग बोर होने लगेंगे।  शम्मी ने फिर ज़िद की तो इस बार नैय्यर साहब ने साफ मना कर दिया।  नैय्यर के गुस्से और ज़िद हो हरकोई जानता था।  शम्मी निराश होकर बाहर आ गए तभी रिकॉर्डिंग के लिए रफ़ी साहब पहुंचे और शम्मी को देखकर सीधे उन्ही के पास पहुंचे और पंजाबी में बोले “लाले यूँ मुँह लटका के क्यों बैठा है, गाने की रिकॉर्डिंग नहीं करानी (दरअसल शम्मी अपने हर गाने के रिकॉर्डिंग के वक्त रफ़ी के पास रहना पसंद करे थे ) शम्मी ने दुखी मन से से बताया के नैय्यर से उनकी क्या बात हुई और नैय्यर ने साफ मना कर दिया।

रफ़ी साहब कभी किसी का दिल नहीं दुखाते नहीं देख सकते थे, फ़ौरन बोले तू यही बैठ मैं नैय्यर से बात करता हूँ।  नैय्यर को उन्होंने वही बात दोहराई और नैय्यर बार बार अपनी पुरानी रट लगते रहे।  अंत में रफ़ी ने कहा कि एक बार करके  देख लेने में क्या हर्ज है।  पसंद नहीं आये तो मैं दुबारा गा दूंगा और आप दोबारा शूट कर लेना।  इस बात पे नैय्यर सहमत हो गए। बना रिकॉर्ड हुआ और शूटिंग हुई तो नैय्यर बार बार उसी गाने को ही देखे जा रहे थे। अंत में उन्होंने पहले हँसते हुए रफ़ी को गले लगाया और फिर शम्मी को और बोले बहुत शानदार गाना बन पड़ा है, लोग दीवाने हो जाएंगे।

जहाँ तक शम्मी का सवाल है उन्हें शायद इस बात का शौक़ था के वो गाने की लाइने रिपीट करना पसंद करते थे और हर बार नयी तरह का एक्शन देते थे।  मैं खुद उनकी फिल्म “जंगली” के गाने “दी सारा गुज़ारा तेरे अंगना, अब जाने दे मुझे मोरे सजना, मेरे यार शब्बा खैर-मेरे यार शब्बा खैर, मेरे यार शब्बा खैर ” का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ।  फिल्म में  मुखड़े के अलावा तीन अन्तरे थे।  शम्मी ने हर बार अलग स्टाइल से लखनवी (फर्शी  अदबी) सलाम किया जिसे देखकर दिल खुश हो गया।  इतनी डिफरेंट स्टाइल तो मैं भी नहीं जानता था।

दिलीप कुमार के अभिनय की पराकाष्ठा

दिलीप कुमार के अभिनय की ये पराकाष्ठा थी के वो किरदार को खुद में जीना शुरू कर देते थे यही कारण था के वो गंभीर भूमिकाओं के इतना गहरे तक उतर  जाते के खुद स्ट्रेस फील करने लगते थे। अंदाज़, दीदार, देवदास जैसी मूवीज के बाद अब 60 के दशक की शुरुआत उनकी बेहद धमाकेदार “मुग़ले आज़म” से शुरू हो चुकी थी और और स्पेशली उनके  लिए ही कहानियां लिखी जाने लगी थी तभी एक दिन फिल्म “दिल दिया दर्द लिया”  की शूटिंग के दौरान एक हादसा हुआ जिसमे शॉट देने के बाद वो अपनी कुर्सी पर बैठ गए और टाई की नॉट ढीली करके कमीज का बटन खोलने जा रहे थे। बटन आसानी से नहीं खुल रहा था तो उन्होंने खड़े होकर पागलों की तरह उसे घसीटा जिससे शर्ट फट गयी लेकिन उनकी आँखों से अभी तक गुस्से की चिंगारियां निकल रही थी। उनका ये रूप इससे पहले  कभी भी देखा या सुना नहीं गया। उन्हें ठंडा पानी पिलाया गया, पंखा क़रीब करके  उन्हें रिलैक्स किया गया। थोड़ी देर के लिए ऐसा लगा जैसे वो सो गए हों। जब जगे तो थोड़ी देर बाद सभी उपस्थित करीबियों ने उनसे खैरियत पूछी मगर जैसे वो थोड़ी देर पहले घटी उस घटना से बिलकुल अनजान थे। ये बात दूर तक गयी और लोगों ने उन्हें चेक-अप करने के लिए बोला।  डॉक्टर्स ने उन्हें सलाह दी कि उन्हें इंग्लैंड जाकर जाँच करानी चाहिए क्योंकि तब तक इतनी मेडिकल सुविधाएँ हमारे देश में उपलब्ध नहीं थी।

दिलीप साहब इंग्लैंड गए तो वहां डॉक्टर्स ने जाँच करके उन्हें कुछ समय वही गुजरने को कहा ताकि माहौल चेंज हो सके और वो डिप्रेशन से बाहर आ सकें। लगभग 6 महीने बाद उन्हें वापिस लौटने की अनुमति दी गयी लेकिन कहा गया के अब वो अभिनय से दूर रहें। दिलीप साहब इसके लिए तैयार नहीं थे तो अंत में ये फैसला हुआ कि भविष्य में वो कोई भी गंभीर या ट्रेजडीकल भूमिकाएं नहीं करेंगे। केवल हलके फुल्के और कॉमेडी मिश्रित रोल ही करेंगे और तनाव वाले माहौल से दूर रहेंगे। इस सलाह को गांठ बंधे दिलीप कुमार ने “लीडर” वैजयंती माला और “नया दौर” वैजयंती माला यशराज बैनर्स  जैसी धमाकेदार सुपरहिट कॉमेडी मूवीज की और वो ” एक्टिंग की पाठशाला ” कहे जाने लगे ।

इसी क्रम  में उनकी अगली मूवी ” राम और श्याम ” ने तो रिकॉर्ड तोड़ कर रख दिए और शादी के बाद अगली सायरा बानो के साथ गोपी भी सुपर हिट रही। गंगा जमुना, आदमी, संघर्ष से बैराग तक ये सिलसिला चलता रहा इसके बाद 1976 से लेकर 1981 का लम्बा अंतराल लेकर वो वो अपनी दूसरी पारी के लिए “क्रांति” मनोज कुमार, शशि कपूर और हेमा मालिनी, शत्रुधन सिन्हा के साथ और “विधाता” दिलीप, शम्मी, संजीव कुमार, पद्मिनी कोल्हापुरे, सारिका, अमरीशपुरी, सुरेश ओबरॉय आदि के साथ गुलशन राय की मूवी में संजय दत्त को इंट्रोडुइस कराने के लिए उपस्थित हुए। ये फिल्म ब्लकबस्टर साबित हुई और शम्मी तथा संजीव को उनके सामने अपने को परखने का मौक़ा मिला। नरगिस दत्त जब बहुत ज़्यादा बीमार थी तो उनके घनिष्ट पारिवारिक मित्र गुलशन राय से उन्होंने संजय दत्त के बारे में एक वचन लिया था के संजय को तुम अपने तरीके से धूम धाम से इंट्रोड्यूस करोगे।

नरगिस तो नहीं रह गयीं थी मगर गुलशा राय ने अपना वडा निभाया और फिल्म इंडस्ट्री को एक और लम्बी रेस वाला घोडा मिल गया। जब दिलीप कुमार इलाज करके इंग्लैंड से लौटे तो यहाँ उनके बेहद क़रीबी मित्र गुरुदत्त एक स्क्रिप्ट लिए उनका इंतज़ार ही कर रहे थे। गुरुदत्त के महान फ़िल्मकार और नायब अभिनेता होने पर कोई शक ही नहीं लेकिन उन्होंने वो स्क्रिप्ट दिलीपकुमार को ध्यान में रखकर अपने अभिन्न मित्र अबरार अल्वी से लिखवाई थी। खैरियत पूछने के बाद उन्होंने कहा मैंने ये फिल्म आपके लिए ही लिखवाई है अबरार से। दिलीप ने कहा रख दो रात को पढ़ लूंगा। कल बात करेंगे, तृम्हें कैसे इंकार कर सकता हूँ। अगले दिन जब गुरुदत्त उनके पास पहुंचे तो वो गुरुदत्त का ही इंतज़ार कर रहे थे, उन्हें देखते ही बोले, ये क्या किया मेरे भाई मैं तो मर जाऊंगा इस फिल्म को करके, भाई मेरे मैं नहीं कर पाउँगा ये फिल्म, ये तो मुझे पागल कर देगी, तू क्यों मुझे मारना चाहता है। बहुत बहस के बाद भी वो अपनी ही बात पर अड़े रहे के मैं पागल हो जाऊंगा इस फिल्म को करके , गुरुदत्त निराश  हो गए और बोले फिर तो मुझे ही करनी पड़ेगी ये फिल्म और ये फिल्म फिर गुरुदत्त ने वहीदा रहमान , माला सिन्हा, रहमान के साथ एसडी बर्मन और साहिर के साथ की  प्रोडूसर-डायरेक्टर वो खुद थे। ये फिल्म हर लिहाज़ और पक्ष से भारतीय सिनेमा के लिए मील का पत्थर बन गयी। फिल्म थी ” प्यासा”  अशोक कुमार दिलीप साहब से सीनियर एक्टर थे जिन्होंने दिलीप के साथ एक मूवी “दीदार” की थी। दीदार हिट रही लेकिन इसके बाद जब भी कभी अशोक कुमार दिलीप साहब से मिलते थे तो अपनी ही स्टाइल में एक बात ज़रूर कहते “यार युसूफ, एक बार अंधे की एक्टिंग तो करके दिखा” और फिर एक्शन देख कर ही छोड़ते।  इस फिल्म में दिलीप ने अंधे का रोल किया था।

मैंने ऋषि कपूर की किताब “खुल्लम – खुल्ला”  नहीं पढ़ी है इसलिए मुझे ये पता नहीं के ऋषि ने उसमे उस घटना का ज़िक्र किया या नहीं जब राजकपूर फिल्म प्रेम रोग डायरेक्ट कर रहे थे। ऋषि के एक शॉट से वो बिलकुल संतुष्ट नहीं थे और बार बार रिटेक हो रहे थे जिससे राजकपूर झल्ला गए और चिल्लाकर बोले ,  समझता क्यों नहीं है, इस सीन में मैं युसूफ चाहता हूँ, युसूफ, ऋषि कुछ शर्मिंदा से होकर अपने टैंट में चले चले गए और वहां से आधा घंटा बाद कैमरे के सामने आए और इस बार जो उन्होंने शॉट दिया तो राजकपूर ने ख़ुशी से चिल्लाते हुऐ उन्हें गले लगा लिया।