चर्चा में विदेश

धर्म और राजनीति के घालमेल की सबसे खतरनाक मिसाल है तालिबान

शकील अख्तर
धर्म के नाम पर शासन मूलत: प्रगति विरोधी विचार है। धर्म एक पुरानी व्याख्या है और दुनिया अब नए आए विचारों और मूल्यों के अनुरूप शासन चाहती है। इसे चर्च ने सबसे पहले समझा और फ्रेंच रेव्यूलेशन के बाद वह राजनीति और शासन व्यवस्था से अलग हो गया। च्रर्च और स्टेट (राज्य) के अलग होने के बाद ही युरोप की समृद्धि और प्रगति का इतिहास लिखा जा सका। यह बताने की जरूरत नहीं है कि 1789 फ्रांसीसी क्रान्ति से पहले युरोप के राज्यों में धार्मिक शासन की पकड़ कितनी मजबूत थी। उसके बाद के दो सौ साल ही मानव प्रगति के सबसे अहम साल रहे। सारी वैज्ञानिक, औद्योगिक तरक्की के साथ राजनीतिक विचार और जनपक्षधर मूल्यों की चेतना उसके बाद ही आई। लोकतंत्र जो आज दुनिया में शासन करने का सबसे आधुनिक और सही विचार है उसके बाद ही अमल में आया।

लेकिन आज अफगानिस्तान में जो हो रहा है उससे लगता है कि कुछ लोग समय की सुई को वापस पीछे घुमाना चाहते हैं। अफगानिस्तान जो भारत और कई देशों से पहले ही आजाद हो गया था वापस एक नई गुलामी में फंसता नजर आ रहा है। तालिबान की वापसी के साथ अफगानिस्तान में जबर्दस्त -अफरातफरी मच गई। ऐसे भयानक दृश्य आ रहे हैं जो इससे पहले कभी देखना तो दूर सोचे भी नहीं गए। डर और घबराहट की वजह से लोग हवाई जहाज से लटक गए। उसकी छत पर चढ़ गए। रस्सी से चढ़कर अंदर गए!
और अमेरिका जो अफगानिस्तान में सामान्य स्थिति लाने के लिए आया था उसकी एयरफोर्स का जहाज लटके हुए लोगों को लेकर उड़ान भर गया। नतीजा वही हुआ। जो होना था। थोड़ी सी उंचाई पर जाते ही लटके हुए लोग गिरे और मर गए।

काबुल एयर पोर्ट पर लोगों की भीड़ और खड़े हुए हवाई जहाजों से लेकर रनवे पर स्टार्ट हो गए जहाज में लटकने की कोशिश यह बता रही है कि वहां कितना भय है। वीडियो में भी दिख रहा है और जाहिर है कि मुल्क छोड़कर भागने की कोशिश करने वाले ये सारे पुरुष हैं। महिलाएं और बच्चे इन स्थितियों में कोशिश भी नहीं कर सकते। ऐसी परिस्थितियों का सबसे बुरा प्रभाव उन पर ही पड़ता है।
ये हालत यह बताने के लिए पर्याप्त है कि अमेरिका जो वहां सत्ता पलट को सत्ता हस्तांतरण बताने की कोशिश कर रहा है किस तरह दुनिया को एक बार फिर बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहा है। बंदूक की दम पर सत्ता हथियाते तालिबान को वैधता देने के लिए अमेरिका उसे सत्ता हस्तांतरण का नाम दे रहा है। मगर पूरी दुनिया लाइव देख रही है कि यह बंदूक हाथ में लेकर कहा जा रहा है कि सत्ता प्यार से दो। लोकतंत्र के इस दौर में अगर अमेरिका चाहता तो चुनाव के जरिए भी सत्ता तालिबान को दिलवा सकता था। वह 20 साल वहां रहा। मगर वह एक तीर से बहुत साऱे शिकार करता है और हर बार दुनिया को इसे समझने में बहुत समय लगता है। इस बार तो हालत और भयावह है। अमेरिका के अलावा दुनिया की दूसरी दो बड़ी ताकतें चीन और रूस भी तालिबान का समर्थन कर रहे हैं।
यह तो सबको मालूम है कि तालिबान के साथ कतर में कोई डील हुई है। और उस डील का पहला हिस्सा है उन्हें अफगानिस्तान की सत्ता संभालने देना। इस गुप्त डील में कौन कौन से मुल्कों की सहमति है पता नहीं। मगर यह पता है कि इससे असहमत कोई नहीं है। हमारा देश भारत जिसके अफगानिस्तान से हमेशा बहुत नजदीकी मित्रवत संबंध रहे हैं वह भी इस समय किसी भूमिका में नहीं दिख रहा। फिलहाल हम बड़ी ताकत हैं और हम पर कोई सीधा असर पड़ता दिखाई नहीं दे रहा। मगर कश्मीर की स्थिति को देखते हुए हम निश्चिंत नहीं हो सकते। पाकिस्तान के लिए तालिबान बड़ी मुसीबत बनेंगे। मगर खतरा यही है कि वह अपनी समस्या से निपटने के लिए तालिबान को कश्मीर में डाइवर्ट करने की कोशिश करेगा। भारत पिछले 32- 33 साल से कश्मीर में सीमा पार के आतंकवाद से लड़ रहा है। एक तरह से यह एक युद्ध ही है, जिसे हम छद्म युद्ध कहते हैं। इसमें पाकिस्तान हमारे युवाओं को ट्रेनिंग देकर भेजता रहा और एक निश्चित मात्रा में अपने लोगों को भी। अब सबसे बड़ा खतरा बस यही है कि तालिबान की वजह से बढ़ने वाली समस्याओं से अपनी जनता का ध्यान हटाने के लिए पाकिस्तान उन्हें कश्मीर में घुसाने की कोशिश नहीं करे।


हालांकि इस समय तक स्थिति बहुत अनिश्चित बनी हुई है। लेकिन एक बात बहुत स्पष्ट हैं। वह यह कि अब दुनिया तालिबान से टकराने के मूड में नहीं है। उसके साथ संबंध बनाकर नई सरकार को मान्यता देने में किसी को कोई एतराज नहीं है। इसी तरह एक बात जो कुछ साफ और कुछ धुंधली सी है वह यह कि तालिबान कितना बदले हैं? क्या वे सरकार की तरह सरकार चलाने आ रहे हैं? शासन चलाने की उदार विचारधारा को अपनाएंगे? या धर्म और राजनीति के खतरनाक जाल में ही उलझे रहेंगे?

कहना मुश्किल है! क्योंकि एक अमेरिका नहीं, चीन, रुस, पाकिस्तान और कुछ हद तक भारत और तुर्की, ईरान इन सबके साथ जो एक न्युनतम सहमति बनी दिखती है वह तो यह बता रही है कि तालिबान ने अपने अंदर कुछ सुधार का वादा किया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बात करने का अर्थ ही यह है कि वह समझ गया कि उसकी कट्टरपंथ की नीति अब चलने वाली नहीं है। लेकिन उदारवाद को वह कितना मानेगा यह अभी तक बिल्कुल स्पष्ट नहीं है। काबुल में घुसना एक प्रतीक था। उसे उसी समय कुछ बहुत अहम और जोर देकर ऐलान करना थे। आममाफी जैसी बातें काफी रुटीन की चीजें हैं। इसका कोई प्रभाव नहीं है। अगर होता तो लोग इस तरह भागने के लिए हवाई जहाजों से नहीं लटकते।

जहां दुनिया के कई देशों से ब्रिटेन दूसरे विश्वयुद्ध के बाद गया वहां अफगानिस्तान से वह पहले विश्व युद्ध के बाद ही चला गया था। अफगानिस्तान ने प्रगति का एक दौर देखा है। लेकिन अमेरिका और रुस के शीत युद्ध में वह सबसे बुरा शिकार बन गया। जहां महिला शिक्षा और समानता का माहौल आज से 50 साल पहले बन गया था वहां महिलाएं ही आज सबसे बड़ी चिन्ता का विषय बन गई हैं। तालिबान ने उनकी शिक्षा और नौकरी करने पर रोक पर ही सबसे ज्यादा जोर दिया था।

पाकिस्तान का हाल आज सबके सामने है। धार्मिक कट्टरपंथ उसकी तरक्की की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनकर खड़ा हो जाता है। पिछले सात सालों से हम भी अपने यहां सांप्रदायिकता को तेजी से बढ़ता हुआ देख रहे हैं। ऐसे में ही सन 1800 में च्रर्च की कही यह बात याद आती है कि हमारा काम राजनीति या शासन में हस्तक्षेप नहीं है। सिर्फ धर्म तक सीमित है। आज समझ में आता है कि समय से कितने पहले की यह चेतना थी। जो युरोप की तरक्की का आधार बनी।

धर्म और राजनीति बिल्कुल अलग मामले हैं। एक दूसरे के साथ मिलकर दोनों दुषित हो जाते हैं। बात अफगानिस्तान में तालिबान की हो रही है इसलिए यहां यह देखना भी जरूरी है कि दुनिया में इतने मुस्लिम मुल्क हैं। क्या किया इन्होंने मुसलमानों की तरक्की के लिए? तालीम जो तरक्की का सबसे बड़ा आधार है उसके लिए इनके पास कौन सी ऐसी यूनिवर्सिटि है जिसमें पढ़ना तालिबान (स्टूडेंटों) का ख्वाब हो। दुनिया की सारी नामी यूनिवर्सिटि इंग्लेंड, अमेरिका, युरोप में ही हैं। अगर आज वहां भी चर्च हस्तक्षेप करता होता तो क्या ऐसी शानदार शिक्षा व्यवस्था बनी रहती? बाल अब तालिबान के ही पाले में है। उन्हें बहुत जल्दी और व्यापक घोषणाओं के साथ सामने आना होगा। उन्हें लेकर जो शंकाएं हैं वे सरकारें नजरअंदाज कर सकती हैं मगर दुनिया की न्यायप्रिय, समानता, धर्मनिरपेक्षता, प्रगति, उदारवाद और शांति चाहने वाली जनता नहीं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)