अखंड भारत के सपने के साथ खंड खंड भारत करने वाली साम्प्रदायिक राजनीति का हिस्सा थे सावरकर

भारतीय इतिहास के बीसवी सदी में विनायक दामोदर सावरकर एक परस्पर विरोधी व्यक्तित्व का नाम है। सावरकर के जीवन पर अध्ययन करने के लिये उनके जीवन को दो भागों में बांट कर देखना होगा। एक अंडमान के पहले का जीवन, दूसरा अंडमान के बाद का जीवन। अंडमान के काले पानी की सज़ा उनके जीवन मे एक टर्निंग प्वाइंट की तरह रही है। यह तथ्य कभी कभी अचंभित भी करता है कि 1857 के विप्लव को देश का प्रथम स्वाधीनता संग्राम घोषित करने वाला, ब्रिटेन में आज़ादी की अलख जगाने वाला, कैसे अंडमान की त्रासद यातनाओं से टूट कर माफी मांग कर आज़ाद हो गया और फिर वह उन्हीं अंग्रेज़ों के निकट भी आ गया जिनको उखाड़ फेंकने के वह मंसूबे बांधा करता था। कैसे एक नास्तिक व्यक्ति अचानक हिन्दुत्व की अलख जगाते जगाते, मुस्लिम लीग के सरपरस्त एमए जिन्ना का बगलगीर बन गया।

इतिहास और राजनीति संभावनाओं का खेल होती है, यहां कुछ भी हो सकता है। अखंड भारत और हिंदुत्व का पुरोधा जिन्ना की मुस्लिम लीग के साथ मिलकर अंग्रेज़ों की कृपा से सरकार बनाता है, गांधी की हत्या का षडयंत्र रचता है और अंत मे बेहद उपेक्षित और खामोशी से आत्मार्पण कर के मर भी जाता है। अंडमान पूर्व और अंडमान बाद के सावरकर में यह विरोधाभासी अंतर क्यों है? यह सावरकर के जीवन और कृतित्व पर अगर कोई शोध कर रहा है तो उसे इन दृष्टिकोण से भी सोचना होगा।

प्रत्येक मनुष्य का जीवन एक ही पथ पर सदैव नहीं चलता है। पथ परिवर्तन होता रहता है। कब हो जाय यह पथ परिवर्तन, कहा नहीं जा सकता है। सावरकर के साथ भी यही बात थी। उनके जीवन को जैसा मैंने कहा दो खंडों में बांट कर देखना चाहिये बल्कि उनके जीवन के अंतिम समय को जो गांधी हत्या के बाद का है उसे भी अलग कर के देखना चाहिये। अंडमान के पहले के सावरकर, दृढ़ प्रतिज्ञ, स्वाधीनता के प्रशस्त पथ के सजग पथिक, एक इतिहास बोध सम्पन्न व्यक्तित्व के लगते हैं, अंडमान के बाद वही सावरकर अंग्रेज़ो के समक्ष आत्मसमर्पित, क्षमा याचिकाओं का पुलिंदा लिये और स्वाधीनता संग्राम से अलग हटते हुए, नास्तिकता को तिलांजलि देकर धर्म की राजनीति करते हुए नज़र आते हैं। गांधी की हत्या के बाद, वही सावरकर, निंदित और हत्या के षड़यंत्र के अभियुक्त के रूप में, जो बाद में अदालत से बरी हो जाता है और फिर पूरी ज़िंदगी अकेले संत्रास में गुजारता हुआ 1966 में अकेले ही प्राण त्याग देते हुए दिखते हैं। ज़िंदगी के तीन पक्षों में यही सावरकर अलग अलग दिखते हैं। पर किस सावरकर की सराहना की जाय, किस सावरकर की आलोचना की जाय और किस सावरकर की भर्त्सना की जाय यह सावरकर की देश के प्रति भूमिका से ही तय किया जा सकता है।

अक्सर सावरकर को माफीवीर और अंग्रेज़ो के दलाल तथा गांधी के हत्या के षड्यंत्रकर्ता के रूप में चित्रित किया जाता है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि उन्होंने अंडमान की यातना से तंग आकर माफी मांग ली और अंग्रेजों के दिशा निर्देश पर वह चलते हुये राजभक्त भी बने रहे, जिन्ना के सहयोगी भी बने, और उनका नाम गांधी हत्या के साजिशकर्ताओं में भी आया, पर सुबूतों के अभाव में वे बरी हो गये। लेकिन अंडमान के पहले उन्होंने आज़ादी के लिये जो कुछ किया उसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। उनके अंडमान के पहले की संघर्ष गाथा को भी याद करना होगा।

 

वे अंडमान पूर्व काल मे न केवल स्वाधीनता-संग्राम के एक तेजस्वी सेनानी थे अपितु महान क्रान्तिकारी, चिन्तक, सिद्धहस्त लेखक, कवि, ओजस्वी वक्ता तथा दूरदर्शी राजनेता भी थे। वे एक ऐसे इतिहासकार भी हैं जिन्होंने 1857 के विप्लव के इतिहास को अलग दृष्टिकोण से  लिपिबद्ध किया है। उन्होंने इस विप्लव को प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम कह कर इतिहास लेखन में एक नयी बहस की शुरुआत कर दी। अंग्रेजों की सिपाही विद्रोह की थियरी से बिल्कुल अलग यह नामकरण था। वे एक वकील, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक और नाटककार थे। उनके राजनीतिक दर्शन में उपयोगितावाद, तर्कवाद और सकारात्मकवाद, मानवतावाद और सार्वभौमिकता, व्यावहारिकता और यथार्थवाद के तत्व थे। सावरकर एक नास्तिक और एक कट्टर तर्कसंगत व्यक्ति थे जो सभी धर्मों में रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते थे।

लेकिन वही सावरकर अंडमान की भयंकर यातना के कारण टूट गए और माफी मांग कर अंग्रेज़ो की सरपरस्ती में आ गए। उन्होंने धर्म की राजनीति शुरू कर दी। हिन्दू महासभा से जुड़े, और हिंदुत्व का सिद्धांत दिया। अगर आप एमए जिन्ना का भी अपने अतीत देखें तो धर्म के बारे में सावरकर और जिन्ना के बीच आश्चर्यजनक समता मिलेगी। जिन्ना भी मजहबी मुस्लिम नहीं थे। न रोजा न नमाज़, न हज न जकात। पर जब वह मुस्लिम लीग के सदर बने तो, फिर मुसलमानों के सबसे बड़े नेता बन कर उभरे।

सावरकर भी यही चाहते थे कि वह हिंदुओं की एकल आवाज़ होकर उभरें। दोनों ही गांधी और उनके ब्रिटिश राज विरोधी आंदोलनों के विरुद्ध थे। दोनों ही अपने अपने धर्म के लिये अलग देश चाहते थे। अंग्रेज़ो के इशारे पर एक दूसरे के धर्म के विरुद्ध लड़ने वाले सावरकर और जिन्ना ने साझा सरकार चलायी, अंग्रेजों का साथ दिया और स्वाधीनता संग्राम के सबसे प्रखर आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन का विरोध किया ! पर जिन्ना जहां धर्म के आधार पर अलग मुल्क पाने में सफल रहे वही सावरकर बुरी तरह से नकार दिए गए और उनके हिंदू राष्ट्र की थियरी को हिंदुओं ने ही कूड़ेदान में फेंक दिया।  लंदन में गांधी को मांसाहार न करने पर ‘बिना मांस खाये कैसे अंग्रेज़ो से लड़ोगे  कह कर खिल्ली उड़ाने वाले सावरकर, गांधी के विराट प्रभा मंडल में ब्लैक होल की तरह खो गये। हिंदू राष्ट्र का तर्क किसी भी सनातनी हिंदू के गले नहीं उतरा। सबने गांधी, पटेल, नेहरू, आज़ाद, सुभाष आदि धर्मनिरपेक्ष सोच के नेताओं का साथ दिया, और भारत आज़ाद होकर स्वाधीनता संग्राम की सांझी विरासत के सहारे ही समृद्ध होता गया और आज भी उसी पर अडिग है।

लेकिन इन तमाम पथ विचलन, और साम्प्रदायिक राजनीति और द्विराष्ट्रवाद के प्रवर्तन के बाद भी, सावरकर के अंडमान पूर्व जीवन को नजरअंदाज कर देना उनके साथ अन्याय होगा। हम अक्सर जब किसी की समीक्षा करते हैं तो या तो उसे नायक बनाकर न भूतो न भविष्यति के रूप में महिमामंडित कर चित्रित कर देते हैं या फिर उसे खलनायक बनाकर दशानन की तरह देखने लगते हैं। सावरकर की आलोचना और निंदा, उनकी अंडमान बाद गतिविधियों और गांधी हत्या में भूमिका के लिये की जानी चाहिये, क्योकि, अखंड भारत के सपने के साथ खंड खंड भारत करने वाली साम्प्रदायिक राजनीति के वे एक हिस्सा रहे हैं, पर अंडमान पूर्व जिस उत्साह और ऊर्जा के साथ वे स्वाधीनता संग्राम में थे को भी याद करना चाहिये।

(लेखक पूर्व आईपीएस हैं)

विजय शंकर सिंह

A retired IPS officer of UP cadre. Reading and writing is my hobby. Retired from service in 2012. I belong to Varanasi but living in Kanpur.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *