बलात्कार की बढ़ती घटनाएं और उनका समाधान

शुक्रवार, दिनांक 13-अगस्त 2021 को मुझ फक़ीर ने पहाड़गंज, जयपुर की तैबा मस्जिद में आज की सबसे बड़ी चुनौती बलात्कार के बढ़ते ग्राफ के बारे में खुलकर बात की, जिसकी बहुत तारीफ हुई और इस संदेश को आम करने की मांग भी की गई इसलिए उचित समझा कि कुछ बिन्दुओं को लिखित रूप दे दिया जाए, शायद वो समाज के लिए उपयोगी हों।

पर्दे का मतलब केवल बुर्का या हिजाब पहनना ही नहीं होता बल्कि असल पर्दा चेहरे, कलाइयों और पैरों के थोड़े हिस्से के अलावा अपने शरीर की बनावट को दूसरों की नज़रों से बचाना है, जिसमें आज कल के फैशनेबल बुर्के कारगर नहीं हैं, लड़कियों को पाक दामनी (पवित्रता) की शिक्षा देते हुए ग़ैरत मंद बनाना चाहिए और पर्दे के नाम पर कपड़ों के दिखावे से ज़्यादा इस्लामी उसूलों (सिद्धांतों) से सरोकार रखना चाहिए।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की हदीस के मुताबिक बलात्कारी और शराबी आख़िरत के अ़ज़ाब के अ़लावा बलात्कार करने और शराब पीने के ठीक समय बे-ईमान होते हैं जबकि इसकी आदत बना लेने वाला ईमान के नूर से पूरी तरह वंचित रहता है।

क़ुरआन मजीद ने ग़लत काम के क़रीब जाने से भी मना किया, यानी इस्लाम ने हर उस रास्ते पर पाबंदी लगाई है, जिससे बलात्कार के दरवाज़े खुलते हों, भले ही वो दरवाज़ा आंखें हों, सोशल मीडिया हो, कपड़ों का पहनावा हो या फिर मिला-जुला माहौल, जिसका बेहतर फैसला हर आदमी अपने आप को ध्यान में रखते हुए अपनी समझ के आधार पर कर सकता है।

बलात्कार के क़ुदरती नुकसान ये हैं कि बलात्कारी बेशर्म, बेईज़्ज़त, निर्धन, मूर्ख, उजड्ड, निर्दयी, और दिमाग़ी व जिस्मानी से से बेकार होता जाता है। क़ुरआन मजीद में मौजूद शब्द “फाहिशा” (बे-हयाई) में सभी बुरे व्यवहार शामिल हैं।

बलात्कार ऋण (क़र्ज़) है, जो लिया जाता है तो देना भी पड़ता है, पैग़म्बरे इस्लाम ने क़ुदरत के निज़ाम के इस रहस्य को उजागर कर दिया ताकि कोई ग़लत फहमी का शिकार ना हो, दूसरों की बहन, बेटियों पर डोरे डालने वाले बलात्कारी को अपने घर को भी गंभीरता से देखना चाहिए, संसार में बलात्कार का यह एक ऐसा सबसे बुरा और सबसे दुखद बदला है जो ऐसे व्यक्ति के पैरों में भी बेड़ियां डाल सकता है जिसे बलात्कार की लत लग गई हो।

इस बात को सुनिश्चित करें कि बच्चे केवल उतना ही मोबाइल फ़ोन, मीडिया, सोशल मीडिया का उपयोग करें, जितनी उन्हें ज़रूरत हो और चूंकि आज के समय में इन सबसे उन्हें पूरी तरह से बचाना मुमकिन नहीं है, इसलिए उनकी निगरानी बढ़ाई जानी चाहिए और उसके लिए हमें ज़्यादा कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, गूगल (Google) समेत बहुत सी कंपनियों की ऐसी ऐप्स उपलब्ध हैं, जिनकी सहायता से घर का मुखिया अपने सभी अधीनस्थों की आसानी से निगरानी कर सकता है। हर वह व्यक्ति जो किसी का पिता है, उसके मोबाइल फ़ोन में कुछ और हो या ना हो, इस प्रकार की ऐप्स का होना बहुत ज़रूरी है।

शिक्षा और रोज़गार के कारण मिले-जुले माहौल में रहने वाले बच्चों, बच्चियों की विशेष निगरानी माता पिता की ज़िम्मेदारियों में से एक है।

कई बार माता-पिता की लापरवाही, उदासीनता बच्चों को पाप करने के लिए प्रोत्साहित करती है, ऐसे ग़ैर ज़िम्मेदार माता-पिता को पालन-पोषण करना सीखना चाहिए और चूंकि आज के इस टेक्नोलॉजी के समय में बच्चों का अच्छा पालन-पोषण (Parenting) एक चैलेंज बन चुका है, इसलिए हर माता-पिता को वैसे भी Parenting सीखना चाहिए।

चचेरे, फुफेरे, ख़लेरे भाईयों, पड़ोसी, क्लासमेट, फ्रेंड्स जैसी निकटता का मेहरम और ग़ैर-मेहरम की गलत धारणा भी बलात्कार का एक प्रमुख कारण है। इस संबंध में, हमें केवल इस्लामी उसूलों को ही मानक बनाना चाहिए, वरना हर बार धोखा खाएंगे और हर बार इज़्ज़त नीलाम होगी।

अब तो बलात्कार के बाद हत्या करना भी दरिंदगी का हिस्सा बन चुका है, तो हमें फैशन के बहाने अपनाए जाने वाले बनाव-श्रंगार और पहनावे पर कड़ी नज़र रखने की ज़रूरत है, वरना ईमान से जाने वाले आज के समय में जान से भी जाएंगे।

समय पर विवाह ना होना और विवाह के ग़लत रिवाजों ने पीढ़ियों को बर्बाद कर दिया है, यदि हमें अपनी इज़्ज़त, अपनी पीढ़ियों की आबरू और समाज की मर्यादा बचाना है तो दोबारा हमें समय पर सादे विवाह की इस्लामी संस्कृति की ओर लौटना होगा।

टेलीविज़न हमें क्या दे रहे हैं? यह सबको मालूम है, लेकिन हम में से हर एक को ख़ुद से यह सवाल करना चाहिए कि हम मुसलमान होने की हैसियत से अपनी पीढ़ियों को क्या दे रहे हैं?

ग़ैरों के साथ मुस्लिम बच्चियों के फरार होने पर इस समय सोशल मीडिया में धमाल मचा हुआ है, सवाल यह है कि क्या इतने बड़े क़दम रातों रात उठा लिये जाते हैं? अगर नहीं! और यक़ीनन ऐसा नहीं है, तो क्या वो माता पिता उन लड़कियों से अधिक दोषी नहीं हैं जिन्हें अपने घरों का ज्ञान नहीं है?

बलात्कार और शराब जैसी बुराइयों की ओर वही समाज आकर्षित होता है, जो निकम्मा हो, क्योंकि ख़ाली दिमाग़ ही शैतान का घर बनते हैं। हमारे समाज में इन बीमारियों का फैलना इस बात की ओर इशारा है कि हमारी पीढ़ियां बेकार, असंवेदनशील हो गई हैं, यह अपने आप में एक बहुत ही गंभीर मुद्दा है, माता-पिता होने की हैसियत से हमारे पास इसका क्या इलाज है?

जब तक घरों में इस्लामी शिक्षा और दीनी माहौल नहीं होगा, घर से बाहर निकलने और वापस आने का समय निर्धारित नहीं होगा, सोने जागने, खाने पीने और सोशल मीडिया इस्तेमाल करने का कोई शेड्यूल नहीं होगा, तब तक हम अतीत की तरह अपनी पीढ़ियों के दुर्व्यवहार को नियंत्रित करने में विफल रहेंगे।

इसलिए समाज का रोना-रोने और अपनी ज़िम्मेदारियों से भागने की बजाय अपनी भूमिका निभाएं और फिर देखें, परिवर्तन आता है कि नहीं।