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पदोन्नति में आरक्षण: भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर ने दायर की पुनर्विचार याचिका, जानें क्या है पूरा मामला?

नयी दिल्लीः भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर ने सरकारी सेवाओं में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) को पदोन्नति में आरक्षण के मामले में उच्चतम न्यायालय के हालिया फैसले की समीक्षा के लिए मंगलवार को पुनर्विचार याचिका दायर की। चंद्रशेखर और बहादुर अब्बास नकवी ने उत्तराखंड के मामले में दिए गए उस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है जिसमें कहा गया है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण का दावा करना मौलिक अधिकार नहीं है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील मंसूर अली द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका में कहा गया है कि ये निर्णय त्रुटिपूर्ण है और इस पर शीर्ष अदालत को फिर से विचार करना चाहिए। गौरतलब है कि न्यायमूर्ति एल. नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता की पीठ ने कहा था कि पदोन्नति में आरक्षण नागरिकों का मौलिक अधिकार नहीं है और इसके लिए राज्य सरकारों को बाध्य नहीं किया जा सकता। इतना ही नहीं, न्‍यायालय भी सरकार को इसके लिए बाध्य नहीं कर सकता।

शीर्ष अदालत ने कहा था कि संविधान के अनुच्‍छेद 16(4) तथा (4ए) में जो प्रावधान हैं, उसके तहत राज्‍य सरकार अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) के अभ्‍यर्थियों को पदोन्‍नति में आरक्षण दे सकती हैं, लेकिन यह फैसला राज्‍य सरकारों का ही होगा। अगर कोई राज्‍य सरकार ऐसा करना चाहती है तो उसे सार्वजनिक सेवाओं में उस वर्ग के प्रतिनिधित्व की कमी के संबंध में डाटा इकट्ठा करना होगा, क्योंकि आरक्षण के खिलाफ मामला उठने पर ऐसे आंकड़े अदालत में रखने होंगे, ताकि इसकी सही मंशा का पता चल सके, लेकिन सरकारों को इसके लिए बाध्‍य नहीं किया जा सकता।

पीठ का यह आदेश उत्‍तराखंड उच्च न्यायालय के 15 नवंबर 2019 के उस फैसले पर आया, जिसमें उसने राज्‍य सरकार को सेवा कानून, 1994 की धारा 3(7) के तहत एससी-एसटी कर्मचारियों को पदोन्‍नति में आरक्षण देने के लिए कहा था, जबकि उत्‍तराखंड सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला किया था। यह मामला उत्‍तराखंड में लोक निर्माण विभाग में सहायक इंजीनियर (सिविल) के पदों पर पदोन्नति में एससी/एसटी के कर्मचारियों को आरक्षण देने के मामले में आया है, जिसमें सरकार ने आरक्षण नहीं देने का फैसला किया था, जबकि उच्च न्यायालय ने सरकार से इन कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने को कहा था। राज्य सरकार ने इस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी।

उच्च न्यायालय ने कहा था कि सहायक अभियंता के पदों पर पदोन्नति के जरिये भविष्य में सभी रिक्त पद केवल एससी और एसटी के सदस्यों से भरे जाने चाहिए। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के दोनों फैसलों को अनुचित करार देते हुए निरस्त कर दिया है।

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