रवीश का सवाल: क्या वाक़ई रेज़िडेंट डॉक्टर तानाशाही के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे हैं?

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पुलिस का जब व्यवहार सभी के साथ ऐसा होता है तो डॉक्टर के साथ अलग क्यों होगा, प्रथम पंक्ति का यही मतलब है कि डॉक्टर इस बात को लेकर अतिरिक्त आहत न हों कि दिल्ली पुलिस ने डॉक्टरों को कैसे टांग लिया, उन्हें बसों में भर लिया या जो भी डॉक्टरों ने आरोप लगाए हैं कि पुलिस ने लाठी का प्रयोग किया है। ऐसा करना पुलिस की रूटीन क्रूरता है जो हर दिन किसी न किसी के साथ घटती रहती है और आज डॉक्टरों के साथ घटी है। वैसे पुलिस का बयान आया है कि डॉक्टरों के खिलाफ कोई मुक़दमा दर्ज नहीं किया है और न किसी के साथ ज़बरदस्ती की है । एक महीने से सरकार ने उनकी माँग को लेकर कुछ नहीं किया, यह अपने आप में काफ़ी है कि सरकार इन डॉक्टरों को क्या समझती है।

स्टेट का चरित्र डॉक्टर या किसान सबके लिए एक होता है। एक अख़बार में पुलिस का बयान छपा है कि डॉक्टर ट्रेफ़िक जाम कर रहे थे तो हमने उन्हें रोका। जैसे कोई स्टेट पर हमला हो ट्रैफ़िक जाम करना। कुछ इसी तरह से किसान आंदोलन को भी देखा जा रहा था। इसमें हैरानी की बात नहीं है कि पुलिस ने डॉक्टरों पर कैसे हाथ डाला। ग़लत ज़रूर है।

डॉक्टर नारे लगा रहे हैं कि तानाशाही नहीं चलेगी। तानाशाही भी स्टेट पावर का स्थायी किरदार है जो हमेशा चलती रहती है लेकिन इसके ख़िलाफ़ नारे तब लगते हैं जब पुलिस लाठी मारती है या कुछ लोगों को बस में डाल कर किसी थाने में बिठा देती है। तानाशाही तब चल सकती है जब कोई कंपनी किसी पार्टी को करोड़ों का चंदा दे और जनता कंपनी का नाम न जान सके। तानाशाही तब चल सकती है जब मामूली आरोपों के साथ UAPA लगाकर साल साल भर किसी को जेल में डाला जा सकता है। तानाशाही तब चल सकती है जब किसी समुदाय के नरसंहार के नारे लगते हैं और संसद के भीतर मनमोहन सिंह को गोली मारने की बात कही जाती है और उन पर कोई UAPA तक नहीं लगता। यह ख़्याल तब कौंधा जब डॉक्टरों को नारे लगाते सुना कि तानाशाही नहीं चल सकती है।

अगर डॉक्टर तानाशाही का केवल सीमित अर्थ में प्रयोग कर रहे हैं तब भी ग़लत नहीं हैं। बस पूरी तरह सही नहीं है। उनसे उम्मीद की जाती है कि तानाशाही को वे समग्रता से समझें और जब भी तानाशाही के विरोध में नारे लगाएँ, उन सभी को शामिल करें जिसमें तानाशाही आराम से चलती रहती है। वे जानते होंगे कि कोविड के समय अस्पतालों के भीतर क्या हुआ था। उन्हें सरकारी अस्पतालों की हक़ीक़त मालूम है। मैं उनसे उम्मीद करता हूँ कि वे उस सच को उगल दें। उस समय के झूठ का विरोध करें। आज भी करें और आने वाले कल में भी करें।

वैसे तानाशाही तो यह भी है कि रेज़िडेंट डॉक्टर बीस बीस घंटे काम करते हैं। किसी ने कहा कि वे तीन दिन तक लगातार काम करने के बाद घर जाते हैं। कई दिनों तक छुट्टी नहीं मिलती है। काम करने के लिए जगह और सामान की तो अलग ही समस्या है। इतने ख़राब माहौल में रेज़िडेंट डॉक्टरों से काम कराने के लिए बहुत कम वेतन दिए जाते हैं। इस ख़राब हालत को चलते रहने दिया गया है। जब डॉक्टर इस अमानवीय व्यवहार को सहन कर सकते हैं, उनके साथ यह तानाशाही रोज़ चल सकती है तो पुलिस वाली क्यों नहीं चल सकती है। कहने का मतलब है कि तानाशाही तो चल ही रही है।

रेज़िडेंट डॉक्टरों की माँग ऐसी नहीं है कि सरकार एक महीने में सुलझा नहीं सकती थी। सरकार तो किसी की भी माँग के साथ यही करती है। दो साल पहले नागरिकता क़ानून का विरोध करने पर पुलिस लाइब्रेरी में घुस गई। छात्रों को मारा। उन्हें दोनों हाथ उठाकर यूनिवर्सिटी से बाहर आपने पर मजबूर किया गया। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जो हुआ आज तक ठीक से पता नहीं चला। डॉक्टरों ने उस समय इसे कैसे देखा यह मैं नहीं बता सकता। मैं इनके व्हाट्स एप ग्रुप से तो नहीं जुड़ा था। उम्मीद करता हूँ तानाशाही के लिए इस्तमाल होने वाले एक और शब्द ‘मज़बूत नेता’ का कभी इस्तमाल नहीं किया होगा और न कभी इसकी चाह रखी होगी।

लेकिन क्या इन डॉक्टरों ने नहीं देखा होगा कि सात साल से देश में चल क्या रहा है? क्या मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि सांप्रदायिकता उनके बीच नहीं पहुँची है? यह मैं क्यों कह रहा हूं ? इसलिए कह रहा हूँ कि अगर आप इस आधार पर हैरानी ज़ाहिर कर रहें हैं कि डॉक्टर ‘पढ़े लिखे’ हैं और पुलिस को उन्हें टांग कर बसों में नहीं भरना चाहिए तब तो ‘पढ़े लिखे’ के आधार पर बाक़ी चीज़ों की भी जानकारी तो होगी ही? या नहीं है? इन पढ़े लिखे लोगों के बीच दिल्ली में ही जामिया और जे एन यू के छात्रों के साथ हुई बर्बरता पर क्या प्रतिक्रिया हुई थी? किसानों के साथ क्या हुआ था ? याद है?

क्या डॉक्टर वाक़ई अपने व्हाट्स एप ग्रुप से लेकर सोच के भीतर तक से तानाशाही के उन तत्वों को अब नहीं चलने देंगे जो उनके भीतर घुस गया है। जो केवल डॉक्टर ही नहीं किसी भी तबके के भीतर घुसा दिया गया है। क्या डॉक्टर अब उन शब्दों का इस्तमाल नहीं करेंगे जिनके सहारे ज़हन में तानाशाही घर बनाती है और फिर बड़े आराम से ‘पढ़े लिखे’ डॉक्टर भी चलने देते हैं। अगर तानाशाही का इस स्तर पर विरोध है तो बहुत सुंदर बात है। वैसे ये उनके बस की बात नहीं है।

इतना लंबा लेख तो रेज़िडेंट डॉक्टर नहीं पढेंगे। यह लेख मेडिकल की प्रवेश परीक्षा भी मुश्किल है। वे चिढ़ जाएँगे कि हर मुद्दे में मैं यह सब क्यों घुसा देता हूँ। डॉक्टर भी तो हर रोगी के साथ कई टेस्ट करते हैं ताकि बीमारी का पता चले। मैं पूरी तरह मानता हूँ कि जल्दी और ज़्यादा सीखने के नाम पर जो व्यवस्था चली आ रही है जिसमें हर रेज़िडेंट डॉक्टर का खून चूसा जाता है उसे ख़त्म किया जाए ताकि डॉक्टर अपने क्लिनिक और अस्पताल के भीतर दवा कंपनियों की दादागिरी पर लगाम लगाएँ और गरीब मरीज़ों के साथ तानाशाही न चले। इसका चक्र हर जगह से टूटे। इसे लेकर डॉक्टरों में चेतना आए।

सरकार का अहंकार चरम पर है। धर्म की आड़ में वह और अहंकारी हुई जा रही है। रेज़िडेंट डॉक्टरों के साथ पुलिस की रूटीन क्रूरता और उनकी माँगों को अनदेखा करने के लिए सरकार को कितना क्रूर होना पड़ता होगा, इसे आप केवल उनकी हड़ताल की नज़र से मत देखिए। उन हज़ारों गरीब और सामान्य लोगों की नज़र से देखिए जिनका ऑपरेशन होना है। जिसमें देरी से किसी की जान जा सकती है। वे गरीब और सामान्य लोग भी इन सवालों को भूल जाएँगे जब वही सरकार उन्हें एक किलो तेल, एक किलो नून मुफ़्त में देगी और खाते में पाँच सौ का नोट भेज देगी। फिर सरकार धर्म के नाम पर अवतार बन कर सामने आ जाएगी। रेज़िडेंट डॉक्टर से लेकर आम लोग अवतार पुरुष की पूजा करेंगे, उनके हर झूठ को सत्य वचन मान लेंगे और क्रूरताओं को अवतार पुरुष की संवेदना घोषित कर देंगे। यह कहते हुए कि दूसरा विकल्प नहीं है। मेरा सवाल यही है। जब विकल्प को लेकर ‘पढ़े लिखे’ डॉक्टरों की इतनी ही समझ है तो कैसे मान लूँ कि उनके इस नारे में सच और सोच है कि तानाशाही नहीं चलेगी।

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक पेज से लिया गया है)