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PM मोदी के गुरुद्वारा जाने पर रवीश का गोदी मीडिया पर तंज, ‘बंदगी नौटंकी नहीं होती’

नई दिल्लीः दिल्ली के चारों ओर चल रहे किसान आंदोलन के बीच पीएम मोदी अचानक गुरुद्वारा रकाबगंज पहुंचे। बता दें कि केन्द्र सरकार द्वारा बनाए गए तीन कृषि सुधार क़ानून के विरोध में किसानों का आंदोलन जारी है। आंदोलन कर रहे किसानों में बड़ी संख्या पंजाब के किसानों की है। अब इस आंदोलन में लगभग 30 किसान सर्दी की वजह से अपनी जान गंवा  चुके हैं। कई बार सरकार के साथ किसानों ने वार्ता की लेकिन यह बात चीत बेनतीजा रही है। अब पीएम मोदी अचानक गुरुद्वारा रकाबगंज पहुंचे और वहां उन्होंने मत्था टेका। पीएम मोदी के गुरुद्वारा जाने पर एनडीटीवी के जाने माने पत्रकार रवीश कुमार ने सवाल उठाए हैं।

रवीश ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हमने गुरुद्वारा बंगला साहिब जी पर प्राइम टाइम किया था। मैं मानता हूँ कि यह गुरुद्वारा भारत के लोकतांत्रिक आंदोलनों का मददगार है।लंगर सेवा के ज़रिए ख़ाली पेट किसानों और जवानों को नारे लगाने की ताक़त देता है। आज प्रधानमंत्री जब रकाबगंज साहिब जी के आँगन में गए तो भावना सच्ची होगी। प्रचार की नीयत नहीं होगी। जिस तरह से गोदी मीडिया के पत्रकार दनादन ट्विट कर रहे हैं और इस बात पर ख़ास तौर से ज़ोर दे रहे हैं कि प्रधानमंत्री अचानक और बिना किसी सुरक्षा बंदोबस्त के पहुँचे और किसी को हटाया नहीं गया। बंदगी नौटंकी नहीं होती है।

रवीश ने कहा कि गोदी मीडिया हर चीज को नौटंकी बना देता है। एक अच्छे मक़सद से की गई यात्रा को आई टी सेल और गोदी मीडिया ने प्रोपेगैंडा में बदल दिया है। रकाबगंज साहिब के बाहर भी आपको कई कामयाब लोग ग़रीबों की सेवा करते मिल जाएँगे। बंगला साहिब और रकाबगंज साहिब की दूरी ज़मीन पर भले कुछ किलोमीटर की है लेकिन भावना और मक़सद तो एक ही है।

एनडीटीवी के पत्रकार ने कहा कि बात ये है कि सरकार किसानों के आंदोलन को इमेज मैनेजमेंट की नज़र से न देखें। एक तरफ़ सरकार के मंत्री बीजेपी के सांसद इन किसानों को नक्सल और खालिस्तानी बताने में लगे हैं दूसरी तरफ़ प्रधानमंत्री गुरुद्वारा रकाबगंज जा रहे हैं। सच्चा संदेश देना था तो उसी रास्ते में थोड़ा और आगे बढ़ जाते और सिंघु बार्डर पर जमा किसानों से मिल आते। लेकिन किसानों की लड़ाई को सरकार कभी भ्रमित लोगों का आंदोलन बताने लगती है तो कभी सिखों का। इस आंदोलन में सिख हैं मगर लड़ाई तो क़ानून की है। इसके पहले भी एक आ-बुकलेट करोड़ों लोगों को भेजा गया जिसमें प्रधानमंत्री पगड़ी में दिखा गए हैं। दुखद है कि सरकार पूरे आंदोलन को छवियों की नौटंकी से ज़्यादा कुछ नहीं देख रही।