रवीश का लेख: नेता बनने का टूलकिट, कथा का आयोजन करें और हमेशा मंदिर में दिखें, नौकरी देने की चिन्ता न करें

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जो नौकरी का वादा कर रहा है और जो सरकार में आकर वादा नहीं निभा रहा है, दोनों के रास्ते संकरे होते चले जाएंगे। इस प्रक्रिया में भले नौजवान एक दो चुनावों तक इस दल और उस दल के बीच ठगा जाता रहेगा लेकिन नौकरी की समस्या इतनी भयावह हो चुकी है कि कोई इससे बच नहीं सकता है। कोई भी दल हो। शायद यही वो आग है जिस पर पानी डालने के लिए नेता धर्म का सहारा ले रहे हैं ताकि कहीं तो सही सही नज़र आए और ग़लत भी करें तो धर्म के नाम पर सही हो जाएं। मुमकिन है इससे एक दो चुनाव और गुज़र जाएगा लेकिन जिनकी उम्र बर्बाद हो रही है उनमें मन में यह बात रह जाएगी। यह सही है कि इसके बाद भी नौजवानों को भटकाना आसान है, कुछ नया मुद्दा आ जाएगा तो भटक जाएगा जैसे 2019 में पुलवामा का नौकरी के मुद्दे से कोई संबंध नहीं था फिर भी युवाओं ने बेरोज़गारी का जीवन चुन लिया लेकिन पुलवामा के नाम पर वोट दिया। तो नौजवान किस मुद्दे पर वोट देगा यह उसके हाथ में नहीं है। इसके बाद भी नौकरी का मुद्दा पीछा कर रहा है। कांग्रेस का भी और बीजेपी का भी।

पंजाब मेंं खबर है कि मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में जब नौजवान बेरोज़गारी के सवाल को लेकर प्रदर्शन करने जाते हैं तो पुलिस उनके मुंह पर हाथ रख देती है। उन्हें बोलने नहीं देती है। पुलिस को लगता है कि यह कोई कम हिंसक तरीका है तो वह भ्रम है। यह लाठी चलाने जैसा ही क्रूर है। अगर ये हालत है तो जल्दी ही कांग्रेस इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरने का नैतिक अधिकार खो देगी।कांग्रेस ने नौकरी देने का वादा किया है तो उसे इस विषय पर ज़्यादा पारदर्शी होना होगा और नौकरी के साथ काम करने की शर्तों में बदलाव करना होगा। उसे अपनी आर्थिक नीति बदलनी होगी और अंग्रेज़ी अखबारों में लिखने वाले संपादकों और अर्थशास्त्रियों को पढ़ना बंद करना पड़ेगा। उसे बीजेपी से अलग अपनी सरकार को परिभाषित करने की ज़रूरत है। पंजाब में नौकरी को लेकर वादे के बारे में कांग्रेस को साफ साफ बताना होगा। बेशक वो चाहे तो आम आदमी पार्टी से दिल्ली को लेकर सवाल कर ले कि इतने पैसे वाले छोटे से राज्य में कितनी सरकारी नौकरी दी गई है। क्यों नहीं सरकार नौकरियां पैदा कर रही है या फिर साफ साफ बोल दे कि नौकरी नहीं देंगे। जो नौकरी दी गई है उसकी सेवा शर्तें और वेतन क्या हैं।

आज यूपी के छात्रों ने दरोगा परीक्षा को लेकर कोई तेरह लाख ट्विट किए हैं। इससे कम ट्विट में आई टी सेल मेरे बारे में गांव-गांव में अफवाह फैला देता है। इस ट्विट से इन युवाओं को इतना तो पता चल गया होगा कि वे सत्ता के खेल में कहां हैं। ट्विटर पर इतना बड़ा प्रदर्शन करने के बाद भी उन्हें किसी ने नोटिस तक नहीं लिया। यूपी और बिहार में राजनीति बहुत आसान है। वहां अगर आप नेता हैं तो नौकरी और शिक्षा जैसे मुद्दों से दूर रहें। बहुत काम करना पड़ जाएगा। उससे अच्छा है जाति और धर्म की बात करें। दिन भर खाएं सोएं और शाम को लेकर दूसरे धर्म को गाली दे दें और अपने धर्म को लेकर भव्य आयोजन कर दें। आपका बेड़ा पार हो जाएगा। वही युवा जो नौकरी न मिलने पर आपको गाली दे रहे थे, धार्मिक आयोजन के कारण खूब वोट देंगे।

इसी कारण मैंने नौकरी सीरीज़ बंद कर दी। बेशक मेरे लगातार कवरेज से यह राजनीतिक मुद्दा बना है और हर दल नौकरी देने का वादा करने लगा है और नौकरी के सवाल पर सरकार को घेरने लगा है। वर्ना सरकारी नौकरी की बात चुनावों में कहां इतनी प्रमुखता से उठा करती थी। इस मामले में मैं प्रधानमंत्री की अब तारीफ करता हूं कि वे अकेले राजनेता हैं जो नौकरी का नाम नहीं लेते हैं और युवाओं का खूब वोट मिलता है। उनसे आप पूछेंगे कि केंद्र सरकार ने कितनी नौकरियां दीं तो किसी मंदिर में दो दिन तक कार्यक्रम करने लगेंगे और 55 कैमरों से उसका ऐसा प्रसारण होगा कि आपको लगेगा कि प्रधानमंत्री नहीं, ये तो देवता हैं तब फिर आप उनके चरणों में लेट जाएंगे। नौकरी का सवाल भूल जाएंगे। युवाओं की नाराज़गी हवा हो जाएगी। युवा अपनी डीपी में उनकी तस्वीर लगा लेंगे। इस तरह राजनीति में नौकरी कोई मुद्दा नहीं है। विपक्ष जितना सवाल करेगा कि रोज़गार और महंगाई को लेकर जनता का हाल बुरा है प्रधानमंत्री क्यों चुप हैं, तो इसके जवाब में प्रधानमंत्री चुप ही रहेंगे, बस किसी मंदिर में चले जाएंगे। वहां भी चुप रहेंगे मगर कैमरों के ज़रिए दिन भर टीवी पर छाए रहेंगे और उन्हीं के बारे में बात होती रहेगी और गुणगान होगा। इस तरह वे सारे सवालों से ख़ुद को बचा लेंगे। लोग मोदी जी में देवता का अवतार देख लेंगे।

तो यह सभी दलों के लिए आराम का टाइम है। इसके लिए उन्हें प्रधानमंत्री का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि राजनीति इतनी आसान बना दी है। धर्म को इतना लोकप्रिय बना दिया है कि हर बड़ा छोटा नेता अपने इलाके में आरती या भजन का आयोजन कराने में लगा है। खूब भीड़ है और समर्थन भी है। कोई शिव की कथा करा रहा है तो कोई साईं संध्या करा रहा है। इसका अध्ययन कीजिए। विपक्ष के युवा नेताओं से अपील है कि वे युवाओं के मुद्दे से खुद को अलग रखें और अपने इलाके में किसी कथा का आयोजन करें। सबका आशीर्वाद मिलेगा। जब राजनीति में इतनी आसानी से नंबर मिल सकता है तो बिना मतलब का परिश्रम न करें। बाकी बचे समय में अच्छा जीवन व्यतीत करें।

हमारे युवाओं की राजनीतिक क्वालिटी ऐसी ही रहेगी। भारत का युवा सांप्रदायिकता और जातिवाद का कॉकटेल है। अगर इससे बाहर निकल रहा है तो आरक्षण को लेकर कुछ भी बोल दीजिए, किसी भी तरफ की बात, भले सरकारी नौकरी नहीं होगी लेकिन आरक्षण के होने और न होने की बहस तो हमेशा रहेगी और इसमें सारे उलझे मिलेंगे। किसी को याद ही नहीं रहेगा कि सारी नौकरियां तो ठेके पर हो गईं। वेतन कम हो गए। पेंशन खत्म हो गए। अस्थायी नौकरी से भी सामाजिक परिवर्तन की उम्मीद बनी रहेगी और इस तरह आपको सरकारी नौकरी को लेकर ठोस करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। बिना काम किए आप नेता बन जाएंगे। बाकी जो आई टी सेल कहे वही मानिए क्योंकि इससे आपके बुद्धिमान होने पर कोई शक नहीं करेगा।

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक पेज से लिया गया है)

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