चर्चा में

रवीश का लेखः हिन्दू मुस्लिम की राजनीति आपके नागरिक अधिकारों और अस्तित्व को ख़त्म कर देती है। आप ख़त्म हो चुके हैं।

रवीश कुमार

UPP 49568 police भर्ती के 35568 अभ्यर्थी अपने मेडिकल और प्रशिक्षण का इंतज़ार कर रहे है जबकि मुख्यमंत्री जी ने 6 माह में नियुक्ति की बात कही थी जबकि 4 माह बीत चुके है कृपया #UPP49568_में35568 की नियुक्ति एक साथ करके अपना किया हुआ वादा पूरा करो। इस तरह के अनगिनत मैसेज भेजना भी किसी को ट्रोल करने के समान है। उचित कारणों से परेशान युवाओं को मुझे परेशान नहीं करना चाहिए था। वादा मुख्यमंत्री को पूरा करना है मुझे नहीं। मेरे इनबाक्स में सैकड़ों मैसेज भेजना अभद्रता है। आपकी परेशानी समझता हूँ लेकिन मैं परेशानी का कारण नहीं हूँ।

इन मैसेजों के भेजने की बेचैनी और लिखी बातों को देख कर मेरी समझ यह बनती है कि युवाओं को लेकर बहुत काम करने की ज़रूरत है। भारत के घटिया स्कूलों और कालेजों ने उनका बहुत नुक़सान कर दिया है। बीस बीस साल शैक्षणिक संस्थानों में गुज़ारने के बाद सार्वजनिक समझ की चुटकी भी हासिल नहीं होती है। इसमें युवाओं की गलती नहीं है। वे अगर सजग हो जाएँ तो अभी भी सुधार सकते हैं। किसी ने नहीं सोचा कि उनके इनबाक्स में अगर कोई पाँच सौ हज़ार मैसेज भेज दे तो क्या होगा। सारा काम छोड़ कर डिलिट और ब्लाक करने में ही लग जाएगा। इस बारे में कई बार लिख चुका हूँ। यह भी कि मैंने कुछ महीनों के लिए नौकरी सीरीज़ बंद कर दी है। इसके बारे में भी इसी पेज पर कई बार लिख चुका हूँ।

एक बात मेरे बारे में समझ लीजिए। मैं अपनी लोकप्रियता संवारने और सहेजने नहीं आया हूँ। इस मसले को दो साल तक लगातार किया।सैंकड़ों दिनों तक यही दिखाया है। अब बंद कर दिया है।उसके कारणों को फ़ेसबुक पर विस्तार से लिख चुका हूँ। मुझे यक़ीन हो गया है कि भारत का युवा अब जातिवाद और सांप्रदायिकता से कभी नहीं निकल पाएगा। इसकी चपेट में जाकर उसने अपनी राजनीतिक शक्ति खो दी है। नागरिक पहचान खो दी है। बिहार चुनावों के दौरान अपने हर शो में कहा करता था कि रोज़गार मुद्दे का आप समापन समारोह देख रहे हैं। राजनीतिक मुद्दे के रूप में रोज़गार का यह आख़िरी चुनाव है।नेताओं ने सामने से इस मुद्दे को ठोकर मार दिया। घोषणापत्र की औपचारिकताओं से ज़्यादा कुछ नहीं हुआ। उम्मीद है बिहार का युवा नई सरकार को 19 लाख नौकरियाँ देने पर मजबूर करेगा। मुझे बताएगा कि कितनी नौकरियाँ मिली हैं।

भारत का ख़ासकर हिन्दी प्रदेशों का अधिकांश युवा सिर्फ़ दो चीज़ों में सबसे अच्छा प्रदर्शन कर सकता है। सांप्रदायिक होने में। उसके बाद जातिवादी होने में। जातिवादी ही सांप्रदायिक होता है। सांप्रदायिक जातिवादी भी होता है। हिन्दी प्रदेश के युवाओं को उनकी जाति और धर्म के नायकों की तस्वीर दे दीजिए और उनके नाम और रंग का पट्टा दे दीजिए जिसे वे गले या सर में बांध सकें तो उन्हें ज़्यादा गर्व होता है। उनका पूरा व्यवहार ही बदल जाता है। चेहरे पर लाली आ जाती है। एक ग़ज़ब क़िस्म का कर्तव्य बोध आता है। उसे लगता है कि जाति और धर्म के उत्थान का काम ही उसे पोस्टर की तस्वीर के लायक़ बना सकता है। इसलिए परचून की दुकान से ज़्यादा धर्म और जाति के नाम पर संगठन हो गए हैं और इसके लिए मानव संसाधन की आपूर्ति युवाओं से ही होती है।

इस स्थिति को मैं अकेला नहीं बदल सकता। काश बदल देता। वैसे लगा तो हुआ हूँ। फ़िलहाल इन युवाओं के अधिकांश से किसी को इससे अधिक उम्मीद नहीं करनी चाहिए। जिस वक़्त वह अपनी नौकरी को लेकर मैसेज करता है उसी वक़्त अगर आप उसे यह मैसेज दे दें कि कोरोना मुसलमानों के कारण फैला है। तब्लीग के कारण फैला है। तो वह तुरंत इसमें व्यस्त हो जाएगा और एक काल्पनिक ख़तरे को वास्तविक समझ दिन रात लड़ने लगेगा।अपनी नौकरी का सवाल भूल जाएगा। इसीलिए गोदी मीडिया और आई टी सेल से ऐसे मसलों की लगातार सप्लाई होती रहती है।तभी भी तो मार्च के महीने में तब्लीग से जुड़ी फ़र्ज़ी ख़बरों को लेकर कई हज़ार रिपोर्ट छपी थी। इसका मतलब है कि ऐसी रिपोर्ट इस वक़्त की सबसे बड़ी ज़रूरतों में से एक है। मैं एक बात साफ़ साफ़ और सामने से कहता हूँ। मैं सांप्रदायिक सोच के नौजवानों का हीरो नहीं बनना चाहता। न उनसे तालियाँ चाहता हूँ। भारत का कोई भी नेता चाहे जितना बड़ा और लोकप्रिय हो यह बात नहीं कह सकता है। क्योंकि वह राष्ट्रवाद की चादर में लपेट कर सांप्रदायिकता की ही राजनीति करता है।

जब हिन्दी प्रदेश के युवाओं ने सांप्रदियकता और जातिवाद को ही अपनी पहचान चुन लिया है तो मैं क्या करूँ। यह सच्चाई है कि इस मुद्दे के लिए वह बेरोज़गार रहना चाहता है, नौकरी गँवा कर भी अर्थव्यवस्था के व्यापक सवालों को न समझना चाहता है और न व्यक्त करना चाहता है।मैं अपना काम अपने समय और अपनी शर्तों पर करता हूँ।दो से ढाई साल तक नौकरी सीरीज़ की ताकि इसे स्थापित किया जा सके। सरकारों का ध्यान जाए और कुछ ठोस बदलाव हो। अब इसे देखना आप युवाओं का काम है। मैं अब दूसरे विषयों की तरफ़ प्रस्थान करना चाहता हूँ। पर्यावरण और स्वास्थ्य जैसे विषयों को लेकर। मुझे नौकरी सीरीज़ को लेकर मैसेज मत भेजिए। समझिए इस बात को।

मेरी युवाओं से कोई दुश्मनी नहीं है और न ही उनसे दोस्ती है। कोई मुझसे पूछता है कि भारत के युवाओं की क्या कहानी है। मैं अपवाद कभी नहीं चुनता। सबको यही जवाब देता हूँ कि इनकी कोई कहानी नहीं है। इन्हें सिर्फ़ तब्लीग की स्टोरी चाहिए। ये विज्ञान को छोड़ कर कोरोना को मुसलमान से जोड़ सकते है और तीन महीने तक सुशांत सिंह राजपूत के अनर्गल कवरेज पर आंसू बहा सकते हैं। ऐसे विषयों की लोकप्रियता और निरंतरता भारत के नौजवानों की खंडहर होती जवानी के निशान हैं। मैं इंतज़ार करूँगा आप सभी के उस खंडहर से निकल आने की। बीस साल तो लगेंगे निकलने में।

पिछले साल 17 सितंबर को रोज़गार के मसले पर 35 लाख ट्विट किए गए थे। छोटी मोटी औपचारिकताओं के अलावा कुछ नहीं हुआ। जब इस देश में किसानों को आतंकवादी कह दिया गया तब बचा ही क्या। जनता होने का वह सबसे बड़ा तबका है। उस सबसे बड़े तबके की ये हालत है इसका मतलब है कि युवा भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। अगर हमारे युवा ऐसे न होते तो किसी की हिम्मत न होती किसानों को खालिस्तानी और आतंकवादी कहने की। चुनाव आने दीजिए। किसान भी इसे भूल जाएँगे और हिन्दू मुस्लिम राजनीति की आंधी में बहने लगेंगे। जो सच है वो सच है।

इसलिए आप लोग ज़रूर मंत्रियों के हैंडल पर ट्विट करें। उन्हें पता चल जाता ह ।वैसे उससे भी ख़ास होगा नहीं लेकिन अब यही करना होगा।मुझे मैसेज न करें। थोड़े दिनों के लिए तो मुझसे नाराज़ होइये कि मैंने ऐसा कह दिया। कुछ तो स्वाभिमान होना चाहिए कि नहीं आपमें।  अगर इतना लिखने के बाद भी आप मुझसे नाराज़ नहीं होते तो एक काम कीजिए। आप ये पंक्ति अपने कमरे की दीवार पर बड़े अक्षरों में लिख कर चिपका दीजिए। “हिन्दू मुस्लिम की राजनीति आपके नागरिक अधिकारों और अस्तित्व को ख़त्म कर देती है। आप ख़त्म हो चुके हैं।” रवीश कुमार

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक पेज से लिया गया है)