शख़्सियत

प्रदीप कुमार: सिने जगत का वह सितारा जिसे अक्सर बादशाह का किरदार निभाना पसंद आता था

कभी माँ ज्यादा बीमार हो जाती तो घर पर एक प्रौढ़ पंडिज्जी सुबह का दाल-भात पकाने आने लगते ताकि हम भाई-बहनों को समय पर स्कूल भेजा जा सके। पंडिज्जी बाबू के दफ़्तर में कुछ छोटा-मोटा काम करते थे। बेस्वाद खाना पकाने में उन्हें महारत हासिल थी। उनके बनाए भात की रंगत अलग तरह की होती थी क्योंकि वे उसे पकाते वक्त साबुत कालीमिर्च के कुछ दाने भी दाल दिया करते।  एक बार बाबू ने बताया कि जवानी के दिनों में पंडिज्जी बम्बई में रहे थे और कई साल तक मशहूर फिल्म अभिनेता भारत भूषण के घर रसोइये का काम कर चुके थे। ओ दुनिया के रखवाले सुनता हूँ तो मुझे पंडिज्जी के पकाए कालीमिर्च वाले भात और भुनी मेथी पड़ी लौकी की सब्जी की याद आ जाती है।

नानाजी एक ज़माने में बरेली शहर में बैंक की नौकरी करते थे। उनका एक दोस्त था गुलाटी। गुलाटी का बरेली में एक बड़ा होटल था। जब कभी किसी बम्बइया पिक्चर की शूटिंग रानीखेत-नैनीताल जैसी जगहों में होनी होती, सारी यूनिट रेल में  बैठ कर पहले बंबई से बरेली आती और एक रात के लिए गुलाटी के होटल में ठहरती। उस रात गुलाटी नानाजी को रात के खाने पर बुला लेता और वे हीरो-हीरोइन के साथ डिनर किया करते। एक बार दिलीप कुमार और मधुबाला आए। डिनर के बाद दिलीप कुमार ने कुछ देर वॉक करने की इच्छा जताई। गुलाटी का होटल रेलवे स्टेशन के नजदीक शहर के व्यस्ततम चौराहे पर था जहाँ चौबीसों घंटे लोगों की आवाजाही चलती थी। हीरो-हीरोइन सड़क पर वॉक करते तो दंगा हो सकता था, पुलिस बुलानी पड़ती। नानाजी मधुबाला और दिलीप कुमार को अपने स्कूटर पर बिठा, ट्रिपल सवारी करते हुए श्मशान घाट लेकर गए। “घूमने लायक तो बरेली में एक वही जगह हुई नाती!” नानाजी बताया करते थे।

हल्द्वानी से बरेली जाएं तो शहर के आते ही रेलवे लाइन के दाईं तरफ श्मशान को जाने वाले रास्ते का बोर्ड लगा हुआ है। उसे देखता हूँ तो भीतर “सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं” बजने लगता है और घंटों तक चीड़ के जंगल से गुज़रते, कंधे पर थैला टाँगे दिलीप कुमार की छवि को दिमाग से हटा पाना मुश्किल हो जाता है।

शुरुआती स्कूल के बाद आगे पढ़ने के लिए मुझे नैनीताल के एक हॉस्टल में भेज दिया गया। जाड़ों के महीने में लखनऊ के मोतीमहल में हमारे स्कूल के उन बच्चों का विंटर स्टडी कैम्प लगा करता जिन्हें हाईस्कूल-इंटर बोर्ड देना होता था। मुख्य बिल्डिंग से लगी एक दोमंजिली हवेलीनुमा इमारत थी। हमारे सीनियर बताते थे उसकी दूसरी मंज़िल पर अभिनेता प्रदीप कुमार रहते थे और अक्सर धूप में बैठ मूंछों पर खिज़ाब लगाते नजर आते थे। पिक्चरों में प्रदीप कुमार अक्सर बादशाह का रोल किया करते थे। पाउडर से लिथड़े उनके चेहरे पर मुग़ल इमारतों के घुमावदार बेलबूटों जैसी कलमें और मूंछ पारसी शैली के मेकअप का अपरिहार्य हिस्सा होते। जब भी ताजमहल को देखता हूँ पहले कंगूरे पर निगाह पड़ते ही प्रदीप कुमार और फिर मोतीमहल याद आते हैं। 1982 के जाड़ों में वहाँ रहते हुए मैंने लालबाग स्थित नॉवेल्टी में अमीताच्चन की कालिया देखी थी।

जिन दिनों हल्द्वानी-दिल्ली राजमार्ग पर फ्लाईओवर नहीं बने थे, उस रूट पर चलने वाली गाड़ियां चाय-खाने के लिए गजरौला में रुकती थीं। गजरौला में एक सिख सज्जन का पुराना ढाबा था जिसकी दीवारों पर खाना खाते धरमेन्दर के अनेक धुंधला गए फोटो टंगे रहते थे। फिर ऐसे फ़ोटो रामपुर-बिलासपुर में दिखे और चंडीगढ़-संगरूर में भी। यह रहस्य पूरी तरह खुलने में करीब तीस साल लगे कि यूपी-पंजाब का शायद ही कोई ढाबा होगा जहाँ धरमेन्दर ने दाल मखनी और पालक पनीर के साथ तंदूरी रोटी न खाई हो। दुनिया के किसी भी ढाबे-रेस्तरां में दाल मखनी में तंदूरी रोटी का पहला कौर डुबोते ही मुझे धरमेन्दर की याद आती है। इस याद ने अपरिहार्य रूप से हेमामालिनी पर जा पहुंचना होता है जिसके करारे हाथ पैर देख कर गब्बर सिंह पूछता था। “ये रामगढ़ वाले अपनी छोरियों को कौन-सी चक्की का आटा खिलाते हैं रे सांभा!”

(लेखक जाने माने पत्रकार हैं, यह लेख उनके फेसबुक वॉल से लिया गया है)