चर्चा में

“पी” फॉर पैसा “के” फॉर कमाऊं रणनीतिकार!

इस्लाहुद्दीन अंसारी

उत्तर प्रदेश चुनावी नतीजों के बाद हमारे एक बहोत अच्छे मित्र और कांग्रेस के सीनियर वा वालंटियर ने फेसबुक पर टिप्पणी करते हुए लिखा था की “महात्मा गाँधी, सरदार पटेल, जवाहर लाल नेहरु और इंदिरा के नाम पर चलने वाली कांग्रेस जब प्रशांत किशोर जैसे किसी भाड़े के रणनीतिकारों की बदौलत चलने लग जाए. तब नतीजे उत्तर प्रदेश की तरह भयावह होते है।

युवा पत्रकार कृष्णकांत ने आज ही प्रशांत किशोर को लेकर फेसबुक पर टिप्पणी की है की “जिन प्रशांत किशोर की छवि राजनीतिक और चुनावी मैनेजर की है, सबसे आदर्शवादी बातें वही करते दिख रहे हैं कि ‘आप गांधी और गोडसे- दोनों के साथ नहीं खड़े हो सकते.” कृष्णकांत की इसी पोस्ट पर किसी साथी ने टिप्पणी करते हुए लिखा है की “प्रशांत किशोर सच्चे सेकुलर हैं, सारी राजनीतिक पार्टियों को समान नज़रो से देखते हैं। जिस तरफ जनता खड़ी रहे, पहले से भांपकर उनकी तरफ हो लेतें हैं।

2014 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के साथ काम करके सुर्खियों में आए कथित चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर एक बार फ़िर चर्चाओं में हैं वजह आम आदमी पार्टी की दिल्ली चुनावों में ऐतिहासिक जीत का एक कारण लोग प्रशांत किशोर को भी मान रहे हैं। इससे पहले प्रशांत किशोर कांग्रेस और अंतरात्मा स्पेशलिस्ट नितीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के साथ उसके पूर्णकालिक सदस्य के रूप में भी काम कर चुके हैं हाल फिलहाल नितीश से संबंध विच्छेद होने के बाद प्रशांत फिर से अपनी किसी नई भूमिका की तलाश में रणनीतिक बिसात बिछाते नज़र आ रहे हैं।

सवाल ये उठता है की क्या दशकों से देश की राजनीति में भीतर तक़ पैठ बना चुकी पार्टियों को क्या सच में चुनाव जीतने के लिये प्रशांत किशोर सरीखे के किसी भाड़े के चुनावी रणनीतिकार की जरूरत होती है ? या की फिर मीडिया के बनाएं झूठ के आभामंडल में बिलावजह ही प्रशांत जैसे रणनीतिकारों की हवा बनाकर उनकी कथित रणनीति को “चुनाव जिताऊ मंतर” की तरह प्रचारित करके पार्टी के असली और कर्मठ कार्यकर्ताओं के काम करने के तरीकों और उनकी ज़मीनी रणनीति को प्रभावित करने और उनकी जी तोड़ मेहनतों पर प्रशांत किशोर सरीखे किसी रणनीतिकार का पानी फेरकर उनका मनोबल तोड़ने की दिशा में किसी सोची समझी रणनीति के तहत दखल देने की कोशिश की जाती है ?

अगर प्रशांत को अपनी क्षमता पर इतना ही भरोसा है तो वो क्यों पार्टी के किसी सच्चे कार्यकर्ता की भांति किसी एक पार्टी से जुड़कर नहीं रह पाते? पिछले सात आठ सालों में क्यों वो अलग-अलग पार्टी और विचारधारा के साथ काम करते नज़र आएं हैं? वो अगर इतने ही क़ाबिल है तब क्यों कोई एक पार्टी इस कथित चुनाव जिताऊ रणनीतिकार को आसानी से अपने हाथ से जाने दे रही है जबकि पार्टियां आज के दौर में हर कीमत पर चुनावों के जीतने के लिये आतूर नज़र आती है।

उदाहरण के लिये देखा जाए तो अमित मालवीय सरीखे सोशल मीडिया दिग्गज को इतने साल बीत जाने के बाद भी BJP जैसी पार्टी किसी कीमत छोड़ने तैयार नहीं है। क्योंकि उसे उसकी काबिलियत पर भरोसा है।

अहमद पटेल, कैलाश विजयवर्गीय, संजय सिंह आप और लालू यादव/तेजस्वी यादव के चुनावी संजय यादव की अपेक्षा प्रशांत किशोर में तटस्थता और ईमानदारी का जमकर अभाव है और अगर सही तरीके से तलाशा जाए और काम करने का मौका दिया जाए तो भाजपा, कांग्रेस में सैकड़ों और आप, राजद, सपा में दर्जनों प्रशांत किशोर सरीखे ऐसे दिग्गज ज़मीनी रणनीतिकार निकल कर बाहर आ सकते हैं जिनकी क्षमता के आगे प्रशांत का तिलिस्म दो मिनट भी नहीं ठहर सकता है।

बहरहाल पार्टी और मतदाता दोनों को समझना होगा की कुछ समय के लिये अनुबंधित कोई चुनावी प्रबंधक चुनावी नतीजों को इतना ही प्रभावित करता है जितना कोई टेंट का ठेकेदार शादी और बियाह में बेहतरीन पंडाल लगाकर रिश्तेदारों और मेहमानों को।

(लेखक रणनीतिकार समीक्षक हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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