पद्मश्री हरेकला हजब्बा: खुद पढ़ ना सके, लेकिन फल बेचकर पहले मस्जिद में स्कूल खोला फिर उसे बनाया आधुनिक स्कूल..

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नई दिल्ली: ‘हर सफर की शुरुआत एक सोच से होती है’ ऐसा करके दिखाया है, संतरे बेचने वाले हरेकाला हजब्बा ने। 64 वर्ष के हरेकाला को शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए देश के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाजा गया है। यह पुरस्कार उन्हें सोमवार को राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा दिया गया।

शिक्षा के क्षेत्र में काम करना का ऐसे आया जज्बा

मूलरूप से कर्नाटक के रहने वाले हरेकाला हजब्बा को ‘अक्षर संत’ के नाम से जाना जाता है। उनके गांव न्यूपाडापु में कोई स्कूल नहीं थी। इसलिए उन्हें प्रारंभिक शिक्षा भी नसीब नहीं हुई। ऐसे में वह पैसे का सिर्फ जोड़-घटाना कर लेते थे। लेकिन उन्हें पढ़ना नहीं आता था। परिवार का खर्च चलाने के लिए वो संतरे की दुकान चलाते थे।

हर दिन की तरह एक दिन वो दुकान पर संतरे बेच रहे थे। इस दौरान उनके पास कुछ विदेशी टूरिस्ट आए और उनसे संतरे का भाव इंग्लिश में पूछने लगे। लेकिन पढ़ा-लिखा नहीं होने के चलते वो दाम नहीं बता पाए। इस वाकये से उन्हें काफी शर्मिंदगी महसूस हुई। इस बारे में वह कई दिनों तक सोचते रहे कि जो फल मैं बरसों से बेचता आ रहा हूं, मैं उसका दाम तक नहीं बता पाया’।

बस यहीं से उनके दिमाग में स्कूल खोलने का आइडिया आया। उनके गांव न्यूपाडापु में कोई स्कूल नहीं था और गांव के सभी बच्चे स्कूल शिक्षा से महरुम थे। हजब्बा नहीं चाहते थे कि जो उन्होंने झेला, आने वाली पीढ़ियां भी वही झेलें। इसके बाद उन्होंने संतरे बेचकर अपनी जमा पूंजी से साल 2000 में गांव की सूरत ही बदल दी और एक एकड़ में एक स्कूल बनाया, ताकि बच्चे स्कूली शिक्षा हासिल कर सकें।

गांव में प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज खोलने का है सपना

हरेकाला के स्कूल में अभी प्राथमिक लेवल पर ही पढ़ाई होती है। लेकिन भविष्य में उनका सपना अपने गांव में एक प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज का है। जल्द से जल्द गांव में एक प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज खुल सके, इसको लेकर वो लगातार तैयारियां कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय

जामिया स्कॉलर निसार सिद्दीक़ी ने सोशल मीडिया पर टिप्पणी करते हुए लिखा “पैर में चप्पल नहीं‌ लेकिन हाथ में पद्मश्री। हरेकला हजब्बा के लिए ये सबसे बड़ा सम्मान है। कर्नाटक के फल विक्रेता हजब्बा खुद पढ़ ना सके, लेकिन फल बेचकर पहले मस्जिद में स्कूल खोला। फिर मेहनत करके आधुनिक स्कूल बनाया, ताकि गांव के बच्चों को पढ़ा सकें। उनको पद्मश्री मिलना अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का सम्मान है।”

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