सुशांत केस से बस एक आदमी का फायदा हुआ है-अर्नब गोस्वामी का।

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नदीम एस अख़्तर

‘लगता है एक्ट्रेस कंगना रनौत अब राजनीति में फुलटाइम आने का मन बना चुकी हैं। Bollywood में सबको नशेड़ी कह रही हैं। नाम तक लिख दे रही हैं। सो ये तय कि इस अदावत के बाद बॉलीवुड में उनका एक्टिंग कैरियर अब ज्यादा आगे नहीं जाएगा। वह टीभी न्यूज़ के पर्दे पर आकर खुद अर्नब गोस्वामी को कहती हैं कि लोग उन्हें पागल कहते हैं पर ऐसा है नहीं। मतलब साफ है कि कंगना को भी पता है कि उनके अतिउत्साही बड़बोलेपन के चलते उनकी पब्लिक इमेज क्या बन रही है।

 

अनुपम खेर, कंगना के biggest supporter हैं। अनुपम की पत्नी किरण खेर सांसद हैं। ज़ाहिर है, बिना किसी बैकअप के कोई इतना नहीं बोलता। लगता है कंगना को एहसास हो गया है कि एक्टिंग-फेक्टिंग में अब कुछ रखा नहीं। जो करना था, कर लिया। अब राजनीति में आने का समय आ गया है। मान-सम्मान, प्रतिष्ठा और पावर भी। वह सीधे सोनिया गांधी पर हमला कर सकती हैं। शायद स्मृति ईरानी से वह प्रेरणा ले रही हों, जिन्होंने राहुल को उनके ही घर में सांसदी का चुनाव हरा दिया। स्मृति भी एक्टिंग की दुनिया से ही आई हैं पर वह उतनी बड़ी एक्ट्रेस नहीं रहीं, जितनी कंगना है। स्मृति को राजनीति में प्रमोद महाजन लेकर आए और शुरुआती दौर में वह नरेंद्र मोदी की कटु आलोचक रहीं। पर राजनीति में उन्होंने अपना कद इतना बढ़ाया और ऐसा पाला बदला कि मोदी जी की पहली केंद्रीय कैबिनेट में देश की मानव संसाधन मंत्री बन गईं।

 

कंगना बॉलीवुड में पहचान बना चुकी हैं, उनकी एक बड़ी फैन फॉलोइंग है, “राष्ट्रवादी” बनकर देश के मुद्दों पर बोलती रहती हैं, सो उनकी राजनीति में एंट्री और भी आसान होगी। उनके तेवर के आगे विरोधी पनाह मांगेंगे। हर कुछ बहुत ही calculated होता है। यूँ ही नहीं कोई सुशांत मामले या अन्य मुद्दों पर एक लाइन लेकर बोलना शुरू कर देता है। इसे slow nurturing कहते हैं। अब फसल पक चुकी है। सही टाइम पे कंगना राजनीतिक पार्टी की सदस्यता ले सकती हैं। फिर वह अर्नब गोस्वामी को “सर” कहना बंद कर देंगी। सिर्फ अर्नब बोलेंगी। उनका कद अर्नब से बड़ा हो जाएगा। अर्नब भी राज्यसभा जा सकते हैं। एक दूसरे टीभी चैनल के मालिक alreday सांसदी निभा रहे हैं।

 

अब ये मत पूछिएगा कि कंगना और अर्नब किस राजनीतिक दल में शामिल होंगे? या किस दल की तरफ से राज्यसभा भेजे जाएंगे? अयोध्या पर फैसला चंद महीनों में सुनाने वाले चीफ जस्टिस राज्यसभा सांसद बनकर retirement benifit कमा चुके हैं। अब वह उसी पार्टी की तरफ से असम में चीफ मिनिस्टर भी बन सकते हैं, ऐसी खबर आई थी। ज़रा सोचिए। देश का चीफ जस्टिस रहा आदमी, चीफ मिनिस्टर बनेगा?? इतना पतन!! फिर इस देश में नामुमकिन क्या है? जनता व्यर्थ में मुद्दों पे बहस करती है। मलाई खाने वाले आराम से खाते रहते हैं। उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।

 

आप बहस करते रहिए सुशांत सिंह राजपूत की मौत पे। ढूंढते रहिए कत्ल था या खुदकुशी। मीडिया के एक तबके ने जिस मकसद से ये मुद्दा उठाया था, सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने सीमा लांघते हुए उसे आनन-फानन में #CBI को सौंपा था( नियमों के मुताबिक वह केस सीबीआई को नहीं दे सकते थे, इस पे फिर कभी) और जिस तरह सीबीआई मामले में hyper active होकर लग गई थी, उस सब की हवा निकल रही है। कोई पॉलिटिकल motive नहीं सध रहा। ले-देकर मामला अब ड्रग्स रैकेट की तरफ मोड़ दिया गया है। इज़्ज़त बचाने के लिए। किसे नहीं मालूम कि बड़े शहरों और हाई प्रोफाइल सोसाइटी में ड्रग चलता है? पहली बार मंगल ग्रह से आज ही धरती पे उतरे हो का बे? और किसे नहीं मालूम कि सेक्स रैकेट भी इस देश में हर जगह चलता है? चाहो तो वो एंगल भी डाल दो। पर होना कुछ नहीं है। सुशांत को इंसाफ दिलाने के बहाने मीडिया ने सुशांत का चरित्र हनन ही किया। कि उसकी इतनीं गर्ल फ्रेंड थी, वह मस्ती करने यहां जाता था, वह ड्रग्स लेता था, उसकी बाप और बहनों से नहीं बनती थी, रिया उसको इस्तेमाल करती थी, जैसे वह दूध पीता बच्चा था, वह डिप्रेशन में था और पता नहीं क्या-क्या? सुशांत के घर वाले भी बदनाम हुए, हो रहे हैं, रिया और रिया के घरवालों को तो विलेन बना ही दिया गया है और सीबीआई की भी प्रतिष्ठा दांव पे है कि वह इस केस से कुछ ढूंढकर निकाले! कुछ नहीं मिल रहा तो ड्रग्स पे आ गए हैं सब। मीडिया भी और जांच एजेंसियां भी। अब आज AIIMS की विसरा रिपोर्ट का शायद इंतज़ार है। देखिएगा, वहां से भी ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा।

 

सुशांत केस से बस एक आदमी का फायदा हुआ है-अर्नब गोस्वामी का। उनका चैनल रिपब्लिक भारत TRP में नम्बर ONE बन गया है।लगातार। AAJTAK के सिर से नम्बर एक का ताज छिन गया है। सो टीभी पत्रकारिता में अभी चीखने चिल्लाने का दौर और तेज़ होगा। आज सुशांत पे चीख रहे हैं, कल चीन पे चीखेंगे, परसों ममता बनर्जी पर और so on. खेल जारी रहेगा। हर बार बस जनता बुड़बक बनती है और जनता है कि मानती नहीं। उसे बार-बार बुड़बक बनाना क्यों आसान है, इस पे भी कोई शोध होना चाहिए।

नदीम एस अख़्तर

‘लगता है एक्ट्रेस कंगना रनौत अब राजनीति में फुलटाइम आने का मन बना चुकी हैं। Bollywood में सबको नशेड़ी कह रही हैं। नाम तक लिख दे रही हैं। सो ये तय कि इस अदावत के बाद बॉलीवुड में उनका एक्टिंग कैरियर अब ज्यादा आगे नहीं जाएगा। वह टीभी न्यूज़ के पर्दे पर आकर खुद अर्नब गोस्वामी को कहती हैं कि लोग उन्हें पागल कहते हैं पर ऐसा है नहीं। मतलब साफ है कि कंगना को भी पता है कि उनके अतिउत्साही बड़बोलेपन के चलते उनकी पब्लिक इमेज क्या बन रही है।

 

अनुपम खेर, कंगना के biggest supporter हैं। अनुपम की पत्नी किरण खेर सांसद हैं। ज़ाहिर है, बिना किसी बैकअप के कोई इतना नहीं बोलता। लगता है कंगना को एहसास हो गया है कि एक्टिंग-फेक्टिंग में अब कुछ रखा नहीं। जो करना था, कर लिया। अब राजनीति में आने का समय आ गया है। मान-सम्मान, प्रतिष्ठा और पावर भी। वह सीधे सोनिया गांधी पर हमला कर सकती हैं। शायद स्मृति ईरानी से वह प्रेरणा ले रही हों, जिन्होंने राहुल को उनके ही घर में सांसदी का चुनाव हरा दिया। स्मृति भी एक्टिंग की दुनिया से ही आई हैं पर वह उतनी बड़ी एक्ट्रेस नहीं रहीं, जितनी कंगना है। स्मृति को राजनीति में प्रमोद महाजन लेकर आए और शुरुआती दौर में वह नरेंद्र मोदी की कटु आलोचक रहीं। पर राजनीति में उन्होंने अपना कद इतना बढ़ाया और ऐसा पाला बदला कि मोदी जी की पहली केंद्रीय कैबिनेट में देश की मानव संसाधन मंत्री बन गईं।

 

कंगना बॉलीवुड में पहचान बना चुकी हैं, उनकी एक बड़ी फैन फॉलोइंग है, “राष्ट्रवादी” बनकर देश के मुद्दों पर बोलती रहती हैं, सो उनकी राजनीति में एंट्री और भी आसान होगी। उनके तेवर के आगे विरोधी पनाह मांगेंगे। हर कुछ बहुत ही calculated होता है। यूँ ही नहीं कोई सुशांत मामले या अन्य मुद्दों पर एक लाइन लेकर बोलना शुरू कर देता है। इसे slow nurturing कहते हैं। अब फसल पक चुकी है। सही टाइम पे कंगना राजनीतिक पार्टी की सदस्यता ले सकती हैं। फिर वह अर्नब गोस्वामी को “सर” कहना बंद कर देंगी। सिर्फ अर्नब बोलेंगी। उनका कद अर्नब से बड़ा हो जाएगा। अर्नब भी राज्यसभा जा सकते हैं। एक दूसरे टीभी चैनल के मालिक alreday सांसदी निभा रहे हैं।

 

अब ये मत पूछिएगा कि कंगना और अर्नब किस राजनीतिक दल में शामिल होंगे? या किस दल की तरफ से राज्यसभा भेजे जाएंगे? अयोध्या पर फैसला चंद महीनों में सुनाने वाले चीफ जस्टिस राज्यसभा सांसद बनकर retirement benifit कमा चुके हैं। अब वह उसी पार्टी की तरफ से असम में चीफ मिनिस्टर भी बन सकते हैं, ऐसी खबर आई थी। ज़रा सोचिए। देश का चीफ जस्टिस रहा आदमी, चीफ मिनिस्टर बनेगा?? इतना पतन!! फिर इस देश में नामुमकिन क्या है? जनता व्यर्थ में मुद्दों पे बहस करती है। मलाई खाने वाले आराम से खाते रहते हैं। उनको कोई फर्क नहीं पड़ता।

 

आप बहस करते रहिए सुशांत सिंह राजपूत की मौत पे। ढूंढते रहिए कत्ल था या खुदकुशी। मीडिया के एक तबके ने जिस मकसद से ये मुद्दा उठाया था, सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने सीमा लांघते हुए उसे आनन-फानन में #CBI को सौंपा था( नियमों के मुताबिक वह केस सीबीआई को नहीं दे सकते थे, इस पे फिर कभी) और जिस तरह सीबीआई मामले में hyper active होकर लग गई थी, उस सब की हवा निकल रही है। कोई पॉलिटिकल motive नहीं सध रहा। ले-देकर मामला अब ड्रग्स रैकेट की तरफ मोड़ दिया गया है। इज़्ज़त बचाने के लिए। किसे नहीं मालूम कि बड़े शहरों और हाई प्रोफाइल सोसाइटी में ड्रग चलता है? पहली बार मंगल ग्रह से आज ही धरती पे उतरे हो का बे? और किसे नहीं मालूम कि सेक्स रैकेट भी इस देश में हर जगह चलता है? चाहो तो वो एंगल भी डाल दो। पर होना कुछ नहीं है। सुशांत को इंसाफ दिलाने के बहाने मीडिया ने सुशांत का चरित्र हनन ही किया। कि उसकी इतनीं गर्ल फ्रेंड थी, वह मस्ती करने यहां जाता था, वह ड्रग्स लेता था, उसकी बाप और बहनों से नहीं बनती थी, रिया उसको इस्तेमाल करती थी, जैसे वह दूध पीता बच्चा था, वह डिप्रेशन में था और पता नहीं क्या-क्या? सुशांत के घर वाले भी बदनाम हुए, हो रहे हैं, रिया और रिया के घरवालों को तो विलेन बना ही दिया गया है और सीबीआई की भी प्रतिष्ठा दांव पे है कि वह इस केस से कुछ ढूंढकर निकाले! कुछ नहीं मिल रहा तो ड्रग्स पे आ गए हैं सब। मीडिया भी और जांच एजेंसियां भी। अब आज AIIMS की विसरा रिपोर्ट का शायद इंतज़ार है। देखिएगा, वहां से भी ज्यादा कुछ नहीं मिलेगा।

 

सुशांत केस से बस एक आदमी का फायदा हुआ है-अर्नब गोस्वामी का। उनका चैनल रिपब्लिक भारत TRP में नम्बर ONE बन गया है।लगातार। AAJTAK के सिर से नम्बर एक का ताज छिन गया है। सो टीभी पत्रकारिता में अभी चीखने चिल्लाने का दौर और तेज़ होगा। आज सुशांत पे चीख रहे हैं, कल चीन पे चीखेंगे, परसों ममता बनर्जी पर और so on. खेल जारी रहेगा। हर बार बस जनता बुड़बक बनती है और जनता है कि मानती नहीं। उसे बार-बार बुड़बक बनाना क्यों आसान है, इस पे भी कोई शोध होना चाहिए।

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