आख़िर क्यों शाहरुख़ सबसे बड़ा अभिनेता है?

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नवनीत झा

फ़िल्म की कहानी के मुताबिक वीर-ज़ारा का यह गाना फ़िल्म की कहानी के सबसे अहम मोड़ पर आता है, लेकिन इस फ़िल्म के लिए शाहरुख़ ख़ान ने सबसे पहले शूटिंग इसी गाने से शुरु की थी। वह भी तब जब शाहरुख़ को इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट तक पता नहीं थी। हालांकि इस गाने में ख़ुद शाहरुख़ के लिए एफ़र्ट डालने के लिए कुछ नहीं है। फ़िल्म के कहानी के अनुसार इस गाने में शाहरुख़ को डोमिनेट ही करना है लेकिन यह भी भले ही वीर नहीं कर सकता था लेकिन शाहरुख़ ख़ान के लिए यह करना बाएं हाथ का खेल था। इस गाने को यह सोचकर देखना कि शाहरुख़ ख़ान को फ़िल्म की कहानी नहीं पता है बड़ा दिलचस्प है। गाने में भी यह बात कई जगह महसूस होती है लेकिन फ़िल्म देखते समय इस गाने में यह बात पकड़ पाना इतना आसान नहीं हे कि ख़ुद शाहरुख़ को नहीं पता कि वह इस गाने में क्या कर रहा है? वह भी तब जब शाहरुख़ को छोड़कर इस गाने में मौजूद तमाम क़िरदारों(प्रीति ज़िंटा, मनोज वाजपेयी और बमन ईरानी) को पता है कि वह क्या कर रहे हैं?

काफ़ी फ़िल्म समीक्षों की राय में शाहरुख़ ख़ान के करियर में आया ब्रेक इसी कारण से है क्योंकि शाहरुख़ ख़ान फ़िल्मी पर्दे पर शाहरुख़ ख़ान को प्ले करता है, न कि उस क़िरदार को। यह दावा बहुत हद तक सही भी है लेकिन शाहरुख़ ख़ान ख़ुद शाहरुख़ ख़ान ऐसे ही नहीं बन गया कि वह अपने आप को पर्दे पर प्ले करने में सक्षम बन सके। ख़ुद को ही प्ले करने का यह ऑप्शन शाहरुख़ के दौर वाले किसी भी अन्य अभिनेता के पास नहीं है और यही मुकाम शाहरुख़ ख़ान को अन्य अभिनेताओं के मुक़ाबले अलग खड़ा करती है।

लेकिन क्या शाहरुख़ पूरी फ़िल्म मेंं सिर्फ़ शाहरुख़ को ही प्ले करता है? इस बारे में तस्दीक करने पर वीर-ज़ारा में ही कोर्ट रूम का एक सीन मिलता है जिसमें एक तरफ़ सिर्फ़ 28 वर्ष की उम्र में, ‘सारांश’ में बुज़ुर्ग का क़िरदार निभाकर अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाले अनुपम खेर हैं, दूसरी तरफ़ एक ही फ़िल्म में एयरफ़ोर्स पायलट और एक बुज़ुर्ग का क़िरदार निभाने वाला शाहरुख़ ख़ान है। कहानी एक है, क़िरदार भी एक ही है लेकिन फ़िल्म में क़िरदार के लगातार बदल रही उम्र के साथ न्याय करता शाहरुख़ का अभिनय है।

कथित राष्ट्रवाद को फ़िल्म और अभिनेता से जोड़ने वालों को राष्ट्रवाद भी वीर-ज़ारा के नायक से सीखने की ज़रूरत है। वह पाकिस्तान में जाकर हैंडपंप नहीं उखाड़ता, उसे मारधाड़ करने की ज़रूरत महसूस नहीं होती, उसका राष्ट्रवाद किसी समुदाय, किसी देश से नफ़रत की अवधारणा पर नहीं टिका,

वह पाकिस्तानी लड़की को गाने में आईडिया ऑफ़ इंडिया भी समझा डालता है, लेकिन उसी गाने में पाकिस्तानी लड़की द्वारा यह दावा करने पर कि उसका देश भी हिंदुस्तान जैसा ही है, नायक को कोई दिक्कत महसूस नहीं होती। बल्कि फ़िल्म के क्लाईमैक्स में वह ख़ुद अपनी कविता से हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोगों को एक साथ खड़ा कर डालता है। कोर्ट रूम में मुस्लिम जेलर कहता है “मुझे नहीं पता कि यह राजेश राठौड़ है या वीर प्रताप सिंह, लेकिन ‘यह हिंदू, अल्लाह ताला का नेक बंदा है’, इसे इसके वतन भेज दीजिए।” कोर्ट रूम में ही बैठा जज उसके जीवन के क़िमती दो दशकों को छिने जाने के लिए उससे माफ़ी मांगता है। कुछ ही देर पहले पाकिस्तान और हिंदुस्तान में समानताएं बताने वाला नायक जब सरहद पार करता है तो एक बार फिर अपने देश को सबसे महान करार दे डालता है और यह सब कुछ वह पूरी फ़िल्म में बिना हैंडपंप उखाड़े, बिना किसी को दोष दिए, बिना किसी से बदला लिए ही मुक़म्मल कर देता है। जो कि सिर्फ़ वही कर सकता था।