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कृष्णकांत का लेखः अबकी बार जुमला 15 लाख का नहीं, 20 लाख करोड़ का है

इस भयानक आपदा में भी कोई सरकार जनता से इस कदर फरेब कैसे कर सकती है? सरकार इतना झूठ कैसे बोल सकती है कि मामूली पैसा खर्च करके कहा जाए कि 20 लाख करोड़ का पैकेज दे रहे हैं? लेकिन हमारी सरकार ऐसा कर रही है. फिस्कल पैकेज और मॉनिटरी पैकेज की अर्थशास्त्रीय मगजमारी में जाने की बजाय आसान शब्दों में कह दिया जाए कि, अबकी बार जुमला 15 लाख का नहीं, 20 लाख करोड़ का है.

यह जो 20 लाख करोड़ का सुर्रा छोड़ा गया है, यह फर्जीवाड़ा है. इसमें सरकार की ओर से कोई खास रकम नहीं खर्च की जा रही है. पहले के ही कई कार्यक्रमों को लागू करके बता रहे हैं कि पैकेज देंगे. जनता के ही पैसे को पैकेज बता रहे हैं, जैसे ट्रेन चलाने के लिए कह रहे थे कि जो सीटें खाली रहेंगी, वही हमारा योगदान है.

अब आप सोचिए कि पीएफ में कर्मचारी को 2 फीसदी कम देना है. लेकिन पीएफ का पैसा है तो कर्मचारी का ही. अगर कर्मचारी उसे पीएफ अकाउंट में न देकर अपनी जेब में रखेगा तो यह तो उसी का पैसा है. इसमें सरकार का क्या योगदान है? इसमें पैकेज जैसा क्या है?

अगर आपको ईएमआई भरने पर राहत दी गई है तो आप अभी नहीं चुकाएंगे, लेकिन बाद में इसे आपको ही चुकाना है और ब्याज समेत चुकाना है. अब इसमें पैकेज क्या दिया गया? ब्याज के साथ बढ़ी हुई रकम चुकाने में को जनता की ही कटेगी. सरकार इसमें पैकेज के नाम पर क्या दे रही है?

इसके पहले सरकार ने सिर्फ 1.7 लाख करोड़ रुपये का फिस्कल पैकेज दिया, लेकिन यह भी बजट में तय था.

वित्त मंत्री ने अभी करीब 5.94 लाख करोड़ रुपये के पैकेज का जो ऐलान किया है, उसमें मात्र 56,500 करोड़ रुपये की रकम सीधी सरकार की तरफ से खर्च होगी. टीडीएस और टीसीएस रेट की कटौती में करीब 50,000 करोड़ खर्च होंगे. एमएसएमई को सपोर्ट देने में 4,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे. 15 हजार से कम सैलरी वालों के पीएफ खाते में कर्मचारी-नियोक्ता का योगदान सरकार द्वारा देने पर करीब 2,500 करोड़ रुपये खर्च होंगे. बाकी कोई रकम सरकार की जेब से नहीं जानी है.

एमएसएमई को 3 लाख करोड़ की लोन गारंटी दी गई है. मतलब है ​कि अगर कोई कंपनी बैंक से लोन लेती है, और वह डिफाल्ट हो जाता है तो सरकार भर देगी. अब एनपीए से जूझ रहे बैंक लोन देंगे, यह तो बैंक जानें. लेकिन इसमें पैकेज जैसा क्या है? इस लोन गारंटी में भी सरकार की जेब से फिलहाल कुछ नहीं जाने वाला. यह किसी बच्चे की उस कल्पना जैसा है कि मैं बड़ा होकर प्रधानमंत्री बनूंगा, लेकिन वह इस पर ध्यान नहीं दे रहा है कि हाईस्कूल में ही गणित में फेल हो जाएगा.

लोगों को जान बचाने का संकट है और सरकार वोकल होकर ग्लोबल को लोकल बनाने जैसी लफ्फाजी कर रही है जिसका नतीजा बहुत संभव है नोटबंदी जैसा भयावह हो. इससे बेहतर होता कि हजार दो हजार करोड़ खर्च करके लोगों को उनके घर पहुंचा देते और भारत में बफर स्टॉक से जो तीन गुना ज्यादा राशन है, उसे बारिश में सड़ाने की जगह जनता में बांट देते. लेकिन इनसे न हो पाएगा, लच्छन ठीक नहीं दिख रहे.

(लेखक युवा पत्रकार एंव कहानीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)