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कृष्णकांत का लेखः भक्त होना भी किसी तपस्या से कम नहीं है, दिमाग बिल्कुल नहीं लगाना है।

एक दिन पहले जब हमने लिखा कि 48000 गरीब परिवारों का घर नहीं उजाड़ना चाहिए या उन्हें कहीं और बसाना चाहिए तो कुछ भक्त कह रहे थे कि तो उनको अपने घर में बसा लो. अब आज प्रधानमंत्री समेत पूरी भाजपा 1.75 लाख गरीब परिवारों को घर देने को लेकर प्रचार कर रही है. जाहिर है भक्त इन दोनों घटनाओं को मास्टरस्ट्रोक ही कहेंगे. उजाड़ना भी मास्टरस्ट्रोक और बसाना भी मास्टरस्ट्रोक.

भक्त होने की प्राथमिक शर्त यही है कि न गरीबों को घर दिए जाने के बारे में सोचो, न गरीबों का घर उजाड़ने के बारे में सोचो. जितना वॉट्सएप यूनिवर्सिटी के नोट्स में मिला है, वही रट लो और दोहराते रहो. ऐसा लगता है कि भक्त सवेरे उठते हैं तो दिमाग खोलकर तकिया के नीचे मूंद देते हैं और दिन भर इधर उधर सिर मारते रहते हैं.

उनके दिमाग में इतनी बात नहीं घुसती कि किसी वजह से कोई बस्ती खाली करानी है तो जिनका घर जमीदोज किया जाएगा, उनके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए. भक्त को ये बात सिर्फ तब समझ में आ सकती है, जब उसका अपना घर उजाड़ दिया जाए. उसके पहले तक वह कान में ढेंपी लगाए ट्रोल करता रहता है.

भक्त होना भी किसी तपस्या से कम नहीं है. दिमाग बिल्कुल नहीं लगाना है. पार्टी जिसके समर्थन में हो, उसका समर्थन करना है. पार्टी विरोध में हो तो विरोध करना है. जायज और नाजायज की ऐसी की तैसी. आंख मूंद कर चलते रहना है और ठोकर लगे अंगूठा टूट जाए तो उसे पार्टी का प्रसाद मानकर ग्रहण कर लेना है.

इधर हजारों झुग्गियां उजाड़ देने का समर्थन करना है, सरदार सरोवर जैसे मसले में पुनर्वास का विरोध करना है, लेकिन गरीबों को घर देने का समर्थन करना है. क्या सही, क्या गलत, बेचारे भक्त समर्थन या विरोध से आगे कुछ समझ नहीं पाते. जब तक वे सोचते हैं कि गरीब जनता का विरोध करना है, तब तक पार्टी खुद समर्थन में दिख जाती है. भक्त इस पर सोचने की जगह किसी नये यूजर को ट्रोल करने में लग जाता है.

(लेखक युवा पत्रकार एंव कहानीकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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