ज़रा याद करो क़ुर्बानी: बहादुरी और आन-बान-शान से अंग्रेजों से लड़ने वाले मौलवी अहमदुल्लाह शाह फैज़ाबादी

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हमारे स्वाधीनता संग्राम का इतिहास उतना ही नहीं है जितना आज तक लिखा और हमें पढ़ाया गया है।उस संग्राम के कुछ ऐसे नायक भी रहे थे जिन्हें इतिहास और जनमानस ने विस्मृत कर दिया। उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे वास्तव में हकदार थे। इतिहास के हाशिए पर खड़े ऐसे ही एक नायक थे मौलाना अहमदुल्लाह शाह फैज़ाबादी। फ़ैजाबाद के एक ताल्लुकदार घर में पैदा हुए मौलाना अहमदुल्लाह शाह अंग्रेजी शासन के अत्याचारों को देखते हुए उसके प्रति गुस्से भरे हुए थे। कुछ क्रांतिकारियों के संपर्क में आने के बाद उनके इस गुस्से को दिशा मिली। अंग्रेजी गुलामी के खिलाफ़ वे क्रांतिकारी पर्चे लिखकर गांव-गांव में बांटने लगे।

पहले जंग-ए-आजादी के दौर का एक बेशकीमती दस्तावेज ‘फ़तहुल इस्लाम’ भी है जिसे मौलाना साहब सिकंदर शाह, नक्कार शाह, डंका शाह आदि कई नामो से खुद लिखा करते थे। इस पत्रिका में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान लिखते हुए अवाम से उनके ख़िलाफ़ जिहाद की गुज़ारिश की गयी है, जंग के तौर-तरीके समझाए गए हैं और फुट डालने की अंग्रेजों की तमाम साज़िशों से बचते हुए देश में हर कीमत पर हिन्दू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने की सिफारिश की गई है। उन्हें फैज़ाबाद और आसपास के इलाकों में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता था। उनकी गोपनीय पत्रिका ‘फतहुल इस्लाम’ ने उस समूचे क्षेत्र के लोगों में आज़ादी की आग भरने में बड़ी भूमिका निभाई थी।

उनकी इस पत्रिका के असर से अंग्रेजी हुकूमत इस क़दर ख़ौफ़ खाती थी कि1856 में उसने पत्रिका और मौलाना साहब की तमाम गतिविधियों पर रोक लगा दी थी। उनपर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी। पुलिस की चौतरफा निगरानी के बावजूद उनकी सक्रियता कम नहीं हुई तो 1857 में गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डाल दिया गया। कुछ महीनों में जेल से छूटने के बाद उन्होंने लखनऊ और शाहजहांपुर जनपदों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और घूम-घूमकर लोगो को अंग्रेजों के खिलाफ गोलबंद करना शुरू कर दिया। वे एक बेहतरीन वक्ता भी थे। उनकी प्रेरणा से बहुत सारे लोग उनके नेतृत्व में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ हथियार उठाने को तैयार हो गए।

उनके कार्यों और हौसलों को देखते हुए जंग-ए-आज़ादी के दौरान उन्हें विद्रोही स्वतंत्रता सेनानियो की बाईसवीं इन्फेंट्री का प्रमुख बनाया गया था। यह क्रांतिकारियों का वह दस्ता था जिसने चिनहट की प्रसिद्ध लड़ाई में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना को बुरी तरह पराजित किया था।यह विजय पहले स्वाधीनता संग्राम की कुछ सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण उपलब्धियों में एक थी। इस विजय ने मौलाना साहब को अपार जनप्रियता दिलाई।

चिनहट की ऐतिहासिक जंग के बाद भूमिगत मौलाना साहब  की गिरफ्तारी के लिए अंग्रेज सरकार ने हर मुमकिन कोशिश की लेकिन ब्रिटिश इंटेलिजेंस और पुलिस उनके जीते जी उन्हें नही पकड़ पाई। जनरल कैनिंग ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पचास हज़ार चांदी के सिक्कों का ईनाम घोषित किया था। अवाम में वे इतने लोकप्रिय थे कि इस प्रलोभन के बावजूद लोग उन्हें गिरफ्तार कराने की सोच भी नहीं सकते थे। उस दौर में लोगों का मानना था कि मौलाना साहब को ईश्वरीय शक्ति हासिल है जिसके चलते अंग्रेज उन्हें पकड़ नहीं सकते थे।

फ़रारी के दिनों में मौलाना साहब के एक मित्र और पुवायां के अंग्रेजपरस्त राजा जगन्नाथ सिंह ने 5 जून 1858 को उन्हें खाने पर आमंत्रित किया। जब वे महल में पहुंचे तो जगन्नाथ ने इनाम और अंग्रेजों की कृपा पाने के लोभ में धोखे से गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। हत्या के बाद उनका सिर काटकर उसने अंग्रेज़ जिला कलेक्टर के हवाले कर दिया। जंग-ए- आज़ादी का वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन फिरंगियों के लिए जश्न का दिन था। अंग्रेज अफसरों और पुलिस ने अवाम में दहशत फैलाने की नीयत से मौलवी साहब का कटा सिर शहर भर में घुमाने के बाद शाहजहांपुर की कोतवाली में नीम के एक पेड़ पर लटका दिया।

यह आश्चर्य है कि मौलाना साहब की कुर्बानियों को देश और हमारे इतिहासकारों ने भुला दिया। उनके क्षेत्र के लोगों को भी अब उनकी याद कम ही आती है। शाहजहांपुर में उनकी कब्र के सिवा उनकी कोई निशानी अब बाकी नहीं है। भारत के पहले स्वाधीनता संग्राम में उनकी भूमिका और कुर्बानियों का पता अंग्रेज लेखकों द्वारा दिए विवरणों से ज्यादा चलता है। एक अंग्रेज इतिहासकार होम्स ने उत्तर भारत में अंग्रेजी शासन का सबसे ख़तरनाक दुश्मन मौलवी अहमदुल्लाह शाह को बताया है।

थॉमस सीटन ने उन्हें महान क्षमताओं,  निर्विवाद साहस और कठोर दृढ़ संकल्प वाला अनोखा विद्रोही कहा। ब्रिटिश अधिकारी थॉमस सीटन ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ विद्रोही की संज्ञा दी थी। अंग्रेज इतिहासकार मालीसन ने लिखा है -‘मौलवी असाधारण आदमी थे। विद्रोह के दौरान उनकी सैन्य क्षमता और रणकौशल का सबूत बार-बार मिलता है। उनके सिवाय कोई और दावा नहीं कर सकता कि उसने युद्धक्षेत्र में कैम्पबेल जैसे जंग के माहिर उस्ताद को दो-दो बार हराया था। वह देश के लिए जंग लड़ने वाला सच्चा राष्ट्रभक्त था। न तो उसने किसी की धोखे से हत्या करायी और न निर्दोषों और निहत्थों की हत्या कर अपनी तलवार को कलंकित किया। वह बहादुरी और आन-बान-शान से उन अंग्रेजों से लड़ा, जिन्होंने उसका मुल्क छीन लिया था।’

(लेखक पूर्व आईपीएस हैं)

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