श्री श्री रविशंकर द्वारा ऑस्ट्रेलिया को “अस्त्रालय” बताए जाने पूर्व आईपीएस ने सुनाई खरी खोटी

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हे श्री श्री, आर्ट ऑफ लिविंग में आर्ट ऑफ लाइंग का घालमेल आप की प्रतिष्ठा ही गिरायेगा। एक वीडियो सोशल मीडिया पर घूम रहा है कि, जब एक भक्त श्री श्री रविशंकर से यह सवाल पूछ रहे हैं कि, “महाभारत में ब्रह्मास्त्र और पाशुपतास्त्र आदि घातक अस्त्र कहाँ रखे जाते थे” तो, श्री श्री इसका उत्तर देते हैं कि, “यह सब ऑस्ट्रेलिया में रखे जाते थे। ऑस्ट्रेलिया शब्द ही अस्त्रालय से आया है।” और भक्त इस दुर्लभ रहस्योद्घाटन पर कृत्य कृत्य होते हैं।

श्री श्री रविशंकर, एक आध्यात्मिक गुरु हैं और दुनियाभर में वे जाने जाते हैं। आर्ट ऑफ लिविंग उनकी संस्था है जो प्राणायाम की सुदर्शन क्रिया सिखलाती है। सारे प्राणायाम की एक ही पद्धति है जो पतंजलि के योगशास्त्र ने निकली है। उसी को, बौद्धों की विपश्यना, महेश योगी के भावातीत ध्यान, ओशो की अपनी ध्यान पद्धति, श्री श्री की सुदर्शन क्रिया और बाबा रामदेव की कपालभाति आदि प्राणायाम है। मूल एक ही है, पर इन धर्म गुरुओं ने उसमे अपनी अपनी शैली मिला कर नए नाम दिए हैं। विपश्यना अलग है और उसकी विधि जटिल है।

दुनियाभर में बढ़ते पूंजीवाद और उससे उत्पन्न जटिल जीवन शैली के काऱण तनाव भी बढ़ा और इसके दुष्प्रभाव भी सामने आए। तब मस्तिष्क को शान्त बनाये रखने और तनाव मुक्त करने के लिये यह सब ध्यान और प्राणायाम की शैलियां सामने आयी और लोगों को इनका लाभ भी मिला।

पर श्री श्री का, अस्त्रालय से ऑस्ट्रेलिया की यात्रा कथा न केवल हास्यास्पद है बल्कि यह उनकी प्रतिष्ठा हानि ही कराती है। ऑस्ट्रेलिया नाम (ऑस्ट्रेलियाई अंग्रेजी में उच्चारण /əˈstreɪliə/) लैटिन ऑस्ट्रेलिया से लिया गया है, जिसका अर्थ है “दक्षिणी”, और विशेष रूप से यह पूर्व-आधुनिक भूगोल में काल्पनिक टेरा में आस्ट्रेलिया को कहा जाता है। 1804 से एक्सप्लोरर मैथ्यू फ्लिंडर्स द्वारा यह नाम ऑस्ट्रेलिया, कहा गया और उसी के बाद यह नाम लोकप्रिय भी हुआ।

इस लघु महाद्वीप का, ऑस्ट्रेलिया नाम 1817 के बाद से ही, आधिकारिक उपयोग में है। पहले एक डच अन्वेशक एबेल तस्मान ने 1643 में, इस महाद्वीप का नाम, “न्यू हॉलैंड” दिया था।

महाभारत में ब्रह्मास्त्र और पाशुपतास्त्र का उल्लेख मिलता है। पाशुपतास्त्र, के बारे में यह मान्यता है कि यह पशुपति नाथ यानी शिव का अस्त्र है, जिसे महाभारत के अनुसार, अर्जुन और कर्ण को शिव ने प्रसन्न होकर दिया था। कर्ण को यह अस्त्र परशुराम की कृपा से मिला था, पर अपनी पहचान छुपा पर, कर्ण ने इसे प्राप्त किया था, तो परशुराम ने इस अस्त्र के साथ साथ, केवल एक बार, इसके प्रयोग करने का भी शाप दे दिया था। महाभारत में यह उल्लेख तो मिलता है कि, पांडवों ने, अपनी अज्ञातवास की अवधि के दौरान, अपने अस्त्र शस्त्र शमी के एक वृक्ष के कोटर मे छुपा कर रख दिए थे, पर वह शमी वृक्ष ऑस्ट्रेलिया में नही था, राजा विराट के राज्य में था।

इतिहास, भुगोल, आस्था, अतीतजीविता, गर्वप्रियता, मिथ्याभिमान, आत्मममुग्धता, और सर्वज्ञता का जब घालमेल होने लगता है तो, ऐसे दावे हमे हास्यास्पद ही बनाते हैं। वेदव्यास जो नहीं ढूंढ और लिख पाए, वह श्री श्री लिख रहे हैं!

(लेखक पूर्व आईपीएस हैं)