खुफिया तंत्र और सरकार की नाकामी हैं कश्मीर की आतंकी वारदातें

आर.के. जैन

लगता है कि कश्मीर घाटी एक बार फिर आतंकवादियों के निशाने पर हैं। पिछले पॉच दिनों में आतंकवादियों ने सात लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी है जिसमें चार अल्पसंख्यक ( हिंदू) और तीन मुस्लिम है। आतंकियों ने जिस तरह स्कूल पर हमला बोल कर दो लोगों की हत्या की है, उससे इनके इरादों का पता चल रहा है । घाटी में उन पुराने काले दिनों की लौट आने की पदचाप सुनाई देने लगी है। कश्मीर में शांति और अमन चैन को एक बार ख़तरा महसूस होने लगा है।

मैं न इसे आर्टिकल 370 से जोड़ रहा हूँ और न ही जम्मू कश्मीर राज्य के विभाजन से। मैं इसे सिर्फ़ सरकार और सुरक्षा बलों की लापरवाही मान रहा हूँ। लगता है कि हमारी इनटेलिजेस एजंसियां एक बार फिर बुरी तरह नाकाम रही है जो आतंकवादियों के मनसूबो और उनकी गतिविधियों को समय रहते नहीं भाँप सकी। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की वापसी से यह अंदाज़ा सबको लग रहा था कि घाटी का माहौल बिगाड़ने की पूरी कोशिश पाकिस्तान करेगा पर फिर भी पर्याप्त सावधानी नहीं रखी गई यह हैरत की बात है।

घाटी में पिछले तीन साल से भी अधिक समय से राष्ट्रपति/केंद्र का शासन है तो साफ़ है कि केंद्र अपनी ज़िम्मेदारीयो से नहीं बच सकता। कश्मीर घाटी पिछले दो साल से भी अधिक समय से पूरी तरह सुरक्षाबलों के हवाले है और एक रिपोर्ट के अनुसार घाटी में इस समय लगभग चार लाख से भी अधिक जवान व अधिकारी तैनात है। वायुसेना भी नियंत्रण रेखा की चौकसी कर रही है, देश की तमाम ख़ुफ़िया एजेंसियों के अफ़सर भी वहॉ पर तैनात है पर फिर भी कुछ आतंकवादी आते है और दहशत फैला कर चले जाते है तो यह हमारी व्यवस्था, प्रशासनिक क्षमता, और कार्य प्रणाली पर प्रश्न चिन्ह है।

जम्मू कश्मीर और लददाख पर केंद्र सरकार को अपनी नीतियो पर पुनर्विचार की ज़रूरत है। बिना स्थानीय व मूल निवासियों की सहमति व सहयोग के कोई भी नीति या बदलाव सफल नहीं होता। कश्मीर के बारे में कोई भी नीति या बदलाव वहॉ के नागरिकों को नाराज़ कर व दूसरे राज्यों के लोगों को खुश करने के लिये नहीं हो सकता। हरियाणा के युवाओं के लिए कश्मीरी दुल्हन लाने के लिए 370 नहीं हटाई गयी थी ।आतंकवादियों के मनसूबो को कुचलने के लिए स्थानीय नागरिकों का सहयोग हर हाल में ज़रूरी है और यह काम एक निर्वाचित सरकार ही कर सकती हैं । जनता के चुने हुऐ प्रतिनिधि ही जन आकांक्षाओं को समझ सकते है और नाराज़गी दूर कर सकते हैं। कश्मीरीयो को पहले की तरह यह अहसास होना ज़रूरी है कि वह भारतीय है और पूरा देश उनके साथ खड़ा है । हम अगर हिंदू मुस्लिम के नज़रिए से कश्मीर को देखेंगे तो समस्या कम होने के बजाय बढ़ती जाएगी। मैं आज भी जानता हूँ और मानता हूँ कि घाटी की अधिकांश जनता पूरी तरह भारतीय है और कभी पाकिस्तान परस्त नहीं हो सकती।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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