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अगर मुसलमान बनाने का काम तलवार से हुआ होता तो लाल क़िले की बाउंड्री पर बसा चाँदनी चौक हिंदू बहुल न रह पाता।

मुस्लिम शासक पिछले कुछ वर्षों से राजनीति का केंद्र बने हुए हैं। भाजपा और दक्षिणपंथी नेताओं द्वारा अक्सर मुग़लों पर निशाना साधा जाता रहा है। हाल ही में एक गीतकार ने मुग़लों को डकैत कहा तो बॉलीवुड के ही मशहूर फिल्म निर्देशक कबीर ख़ान ने मुग़लों को मज़बूत भारत की नींव रखने वाला बताया। अब इस बहस में पत्रकार दिलीप मंडल भी कूद पड़े हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर टिप्पणी लिखी है। उनकी टिप्पणी यहां प्रकाशित की जा रही है।

दिल्ली पर 900 साल तक मुस्लिम शासन रहा और उन्होंने दिल्ली, गुड़गाँव, फ़रीदाबाद, लोनी, सोनीपत और मेरठ के तमाम तो छोड़िए, आधे लोगों को भी मुसलमान नहीं बनाया!  मेरी थीसिस है कि उन शासकों का मक़सद राज करना था। उन्होंने हिंदुओं की प्रभावशाली जातियों को साथ में लेकर ये काम किया और उन्हें निम्न जातियों का शोषण जारी रखने की छूट दे दी।

प्रभावशाली जातियों ने मुसलमान शासकों की केंद्रीय सत्ता मान ली और मोहल्ले और गाँव में हिंदू मध्यम और निम्न जातियों के मालिक बने रहे।  यह तलवार नहीं, सवर्ण जातियों के लालच और स्वार्थ से संभव हुआ। उन प्रभावशाली जातियों के कुछ लोग लालच में शासकों के रिश्तेदार बन गए। ये हुई एक कटेगरी के मुसलमान। दूसरी कटेगरी के मुसलमान वे हैं जो हिंदू धर्म व्यवस्था से नाराज़ थे, उनमें काफ़ी लोग मुसलमान बन गए।

अगर मुसलमान बनाने का काम तलवार से हुआ होता तो लाल क़िले की बाउंड्री पर बसा चाँदनी चौक हिंदू बहुल न रह पाता। मुग़लों और तुर्कों आदि के लंबे शासन के बाद 1881 में जनगणना हुई तो दिल्ली हिंदू बहुल शहर था।

मुस्लिम शासकों पर आरोप

मेरा मुसलमान शासकों पर आरोप है कि उन्होंने इतने लंबे समय तक शासन करने के बावजूद, हिंदुओं में समाज सुधार का कोई काम नहीं किया। हालाँकि इसका उन्हें फ़ायदा भी मिला। 900 साल में कभी कोई विद्रोह नहीं हुआ। ये शासक सुधार के चक्कर में पड़े ही नहीं। उन्होंने हिंदू सवर्णों को बड़ी संख्या में मनसबदार, दरबारी, नवरत्न, सेनापति, राजा आदि बनाकर उन्हें सत्ता में हिस्सा दिया। बाक़ी जनता के ये लोग कंट्रोल करते थे।

वहीं, अंग्रेज हिंदुओं को सभ्य बनाने की कोशिश करने की गलती कर बैठे। सती पर रोक लगा दी। विधवा विवाह शुरू करा दिया। महिला के साथ सेक्स करने की न्यूनतम उम्र तय करके बाल विवाह को कंट्रोल करने की कोशिश की। बच्चों की बलि बंद करवा दी। शूद्रों को स्कूल ले जाने लगे। अछूतों को फौज में भर्ती कर लिया।  फिर क्या था। विद्रोह हो गया। 1857 के विद्रोह के बाद क्वीन विक्टोरिया ने क़सम खाई कि हिंदुओं के आपसी मामले में हाथ नहीं डालना है। उनका शासन 90 साल और चल गया।