जन्मदिन विशेष: दिलीप कुमार ‘बड़ी मुश्किल से होता है, चमन में दीदा-वर पैदा’

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ज़ाहिद ख़ान

अदाकारी के अज़ीमुश्शान बादशाह दिलीप कुमार उर्फ दिलीप साब आज हयात होते, तो 11 दिसम्बर को अपना 99वां जन्मदिन मना रहे होते। लेकिन इस साल 7 जुलाई को वह हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गए। एक दौर था, जब फ़िल्मों में एक्टिंग करना अच्छा नहीं माना जाता था, मगर दिलीप कुमार की शख़्सियत के जादू ने अदाकारी को भी एक मो’तबर फ़न बना दिया। यह उनकी अदाकारी का ही करिश्मा है कि वे फ़िल्मी दुनिया में ट्रेजेडी किंग और शहंशाहे-जज़्बात के तौर पर मशहूर हुए। दिलीप कुमार, नेहरू पीरियड के हीरो थे। उनकी 57 फ़िल्मों में से 36 फिल्में ऐसी हैं, जो साल 1947 से 1964 के दरमियान बनी थीं। ‘शहीद’, ‘मेला’, ‘नया दौर’, ‘पैग़ाम’ ‘मुग़ल-ए-आज़म’, ‘गंगा जमुना’ और ‘लीडर’ जैसी फ़िल्मों ने दिलीप कुमार को नेहरू-दौर के मसलों और नौजवानों के जज़्बात का तर्ज़ुमान बना दिया। दिलीप कुमार ने अपने साठ साल के फ़िल्मी करियर में बमुश्किल साठ फिल्में ही की होंगी, लेकिन इन फ़िल्मों में भी ज़्यादातर ऐसी हैं, जिनमें उनकी अदाकारी को लोग बरसों तक याद रखेंगे। उन्हें कोई भुला नहीं पायेगा। फ़िल्मों से दिलीप कुमार का सक्रिय तआल्लुक साल 1991 तक रहा। बाद में सियासी मसरूरफ़ियत और अपनी बढ़ती उम्र को मद्देनज़र रखते हुए, उन्होंने फिल्मों से पूरी तरह किनारा कर लिया।


दिलीप कुमार जब फ़िल्मों में आये, तब फ़िल्मों में अदाकार काफी लाउड और नाटकीय अभिनय करते थे। ‘पारसी थियेटर’ का सिनेमा पर असर बाकी था। दिलीप कुमार हिंदी सिनेमा के उन अभिनेताओं में से एक हैं, जिन्होंने इस परिपाटी को तोड़ा। फ़िल्मों में उन्होंने बड़े ही सयंत तरीके से अपने क़िरदारों को निभाया। वे बड़े आहिस्तगी से अपने संवाद बोला करते थे। डायलॉग के बीच में उनकी लंबी चुप्पी, जानबूझकर चुप रह जाने की अदा दर्शकों को काफ़ी पसंद आती थी। दिलीप कुमार ने फ़िल्मों में जो भी क़िरदार निभाये, डूबकर किए। फिल्म ‘देवदास’ का ग़मगीन नौजवान ‘देवदास’, ‘गंगा जमुना’ का बग़ावती तेवर वाला ‘गंगा’, ‘नया दौर’ का जुझारू ग्रामीण ‘शंकर’, ‘मुग़ल-ए-आज़म’ में मुगल शहजादा ‘सलीम’, ‘आदमी’ का जज़्बाती नौजवान ‘राजा’ जैसे क़िरदार उनसे बेहतर भला कौन निभा सकता था ? ट्रैजेडी हीरो का रोल हो, रोमांटिक या फिर एंटी हीरो का क़िरदार, वे हर क़िरदार में जान डाल देते थे। ख़ामोशी की आवाज़ और अपनी आंखों के अभिनय से उन्होंने फ़िल्मों में कई बार यादगार एक्टिंग की है। उनके अंदर एक्टिंग में टाइमिंग की ज़बर्दस्त समझ थी। यही नहीं अदाकारी में वे बेहद परफ़ेक्शनिस्ट थे। फिल्म ‘कोहिनूर’ में ‘मधुबन में राधिका नाचे रे’ गाने में सितार बजाने के लिए, उन्होंने उस्ताद अब्दुल हालिम जाफ़र खान साहब से महीनों सितार बजाना इसलिए सीखा कि वे सितार बजाते हुए स्वाभाविक दिखें। अदाकारी में आज ऐसा समर्पण दुर्लभ है। जब तक वे ख़ुद अपनी अदाकारी से पूरी तरह मुतमईन न हो जाते, एक के बाद एक टेक देते चले जाते थे। ‘फ़ुटपाथ’, ‘तराना’, ‘देवदास’, ‘मेला’ आदि फ़िल्मों में निराश प्रेमी से लेकर ‘आज़ाद’, ‘कोहिनूर’, ‘राम और श्याम’ आदि फ़िल्मों में उन्होंने ग़ज़ब की कॉमेडी की है।

दिलीप कुमार ने जो भी फ़िल्में की, उसमें अपनी ओर से हमेशा यह कोशिश की इन फ़िल्मों में ऐसी कहानी हो, जिसमें अवाम के लिए एक बेहतर पैग़ाम हो। मनोरंजन के अलावा वे फ़िल्मों से कुछ सीखकर अपने घर जाएं। अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था,‘‘मैंने इस बात की भरपूर से कोशिश की है कि मैं एक अच्छा रोल मॉडल बनूं। मैं इस बात से पूरी तरह यक़ीन करता हूं कि एक कलाकार को अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों की जानकारी होनी चाहिए और उसे इसके प्रति सजग होना चाहिए। उसे अपने प्रशंसकों के चरित्र-निर्माण का ध्यान रखना चाहिए। जो उसके काम और शख़्सियत से प्रेरणा लेते हैं।’’ दिलीप कुमार की कोई भी फ़िल्म उठाकर देख लीजिए, इनमें उनका यह उद्देश्य ओझल होता नहीं दिखाई देगा
फिल्मी दुनिया में दिलीप कुमार अकेले ऐसे अदाकार हैं, जिनकी अदाकारी ने अदीबों और दानिश्वरों को भी मुतासिर किया था। यहां तक कि सियासी लीडर भी उनकी शानदार शख़्सियत और बेहतरीन अदाकारी के मद्दाह थे। कौन नहीं उनकी अदाओं और अदाकारी का दीवाना था ? वे जीते जी एक लेजेंड बने रहे।

दिलीप कुमार की अदाकारी के दौर में उनके बारे में कई किदवंतियां प्रचलित थीं। मशहूर अफ़साना निगार कृश्न चंदर ने अपने एक लेख ‘फिल्मों की आबरू : दिलीप कुमार’ में उनकी अदाकारी के बारे में लिखा था,‘‘दिलीप कुमार का अपना रंग है, जुदा लहज़ा है। मख़्सूस (विशेष) तर्ज़े-अदा है। दिलीप कुमार की अदाकारी की सत्ह आलमी सत्ह की है। यूं तो दिलीप ने तरबिया (सुखान्त) अदाकारी में भी अपने जौहर दिखाये हैं, लेकिन हुज्निया और अल्मीया (दुखांत) अदाकारी में दिलीप ने एक क्लासिक का दर्जा इख़्तियार कर लिया है। इस मैदान में कोई उसे छू नहीं सका।’’ कृश्न चंदर की यह बात सोलह आने सही भी है। जिन लोगों का दिलीप कुमार की एक्टिंग से जरा सा भी तआरूफ़ है, वे उनकी इस बात से पूरी तरह इत्तेफ़ाक रखते हैं। नज़्म निगार और ड्रामा निगार नियाज़ हैदर भी दिलीप कुमार की अदाकारी के दीवाने थे। अपने लेख ‘फ़िल्मी सल्तनत का मुग़ले-आज़म’ में दिलीप कुमार की अदाकारी के फ़न की तारीफ़ करते हुए उन्होंने लिखा था,‘‘दिलीप कुमार की किरदार निगारी ने नई नस्ल के लिए एक बड़ा वरसा (धरोहर) जमा कर दिया है। दिलीप कुमार की अदाकारी एक मक्तब (स्कूल) है, जिससे नई नस्ल के अदाकारों को हमेशा फै़ज़ पहुंचता रहा है और आइन्दा भी वह मुस्तफ़ीद (लाभान्वित) होते रहेंगे।’’


औरों को छोड़ दें, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ख़ुद, दिलीप कुमार की अदाकारी के मुरीद थे। वहीं दिलीप कुमार की नज़रों में भी नेहरू के लिए बहुत एहतराम था। वे उनकी बहुत इज़्ज़त किया करते थे। पं. नेहरू के समाजवादी ख़यालात से वे बेहद मुतासिर थे। नेहरू के एक इशारे पर वे उनके साथ ख़ड़े हो जाते थे। साल 1962 के लोकसभा चुनाव में जब पं. नेहरू ने उनसे वीके कृष्ण मेनन के चुनाव प्रचार के लिए कहा, तो वे इंकार नहीं कर सके। दिलीप कुमार की धुआंधार चुनावी सभाओं का ही नतीज़ा था कि वीके कृष्ण मेनन ने आचार्य जेबी कृपलानी को चुनाव में करारी शिकस्त दी।

दिलीप कुमार के लिए सियासत में हिस्सेदारी का मतलब इंसानियत और अवाम की ख़िदमत था। जब भी देश में भूकंप, बाढ़ या अकाल जैसी आपदाएं आती, तो वे उसके लिए सरकारी राहत कोष के लिए चंदा इकट्ठा करने की मुहिम में जुट जाते। बावजूद इसके वे सक्रिय राजनीति से दूर ही रहे। रजनी पटेल और शरद पवार जो उनके अच्छे दोस्त थे, के इसरार पर उन्होंने मुम्बई का शेरिफ़ बनना मंजूर किया। आगे चलकर वे महाराष्ट्र से राज्यसभा के मेंबर भी चुने गए। राज्यसभा मेंबर के तौर पर उन्होंने मुंबई में काफ़ी काम किया। स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी कामों को पूरा कराने के लिए हमेशा पेश-पेश रहे। वह नेशनल ब्लाइंड एसोसिएशन के कई सालों तक अध्यक्ष रहे और इसके लिए हर साल चंदा इकट्ठा करते थे। ताकि दिव्यांगजनों को मदद हो सके।

अदाकारी के अलावा दिलीप कुमार के जो शौक़ रहे हैं, उनसे मालूम चलता है कि उनका ज़ौक़ कितना अच्छा था। मिसाल के तौर पर उन्हें बचपन से ही पढ़ने का बेहद शौक था। उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेजी अदब की उन्होंने ख़ूब किताबें पढ़ी थीं। यूजीन ओ नील, फ्योदोर दास्तोव्यस्की और टेनिसन विलियम्स उनके पसंदीदा लेखक थे। वहीं उम्दा शायरी, क्लासिकल म्यूजिक, डांस आदि में भी उनकी दिलचस्पी रही। अपने फ़न को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने कई ज़बानें सीखीं।

अदाकारी हो या फिर सार्वजनिक जीवन दिलीप कुमार ने हमेशा भारतीय जीवन मूल्यों, बहुलतावादी चरित्र की देश-दुनिया में नुमाइंदगी की। धर्म-निरपेक्षता और समाजवाद में उनका गहरा यकीन था। दुनिया भर के सभी धर्मों, जातियों, समुदायों और नस्लों को वह ए​हतिराम की नज़र से देखते थे। कभी किसी में उन्होंने फ़र्क नहीं किया। फिल्मी दुनिया में दिलीप कुमार पहले ऐसे अदाकार रहे, जिन्होंने अपने समकालीन और बाद की पीढ़ी के अदाकारों को यह राह दिखलाई कि अपने स्टारडम का इस्तेमाल, राष्ट्रीय संकट के दौर में सरकार की मदद के लिए करना चाहिए। सरकारी राहत कोष के लिए चंदा इकट्ठा करना कोई गलत काम नहीं। यह उनकी सामाजिक ज़िम्मेदारी है। जिस समाज ने उनको बहुत कुछ दिया, उन्हें ऊंचे मुक़ाम पर पहुंचाया, वक़्त आने पर उसको भी कुछ लौटाया जाए। जब भी देश को ज़रूरत पड़ी, उन्होंने रोड शो, कल्चरल प्रोग्राम और बेनिफ़िट मैचों के ज़रिए चंदा इकट्ठा किया। मुंबई में फिल्म इंडस्ट्री के लिए फ़िल्म सिटी और नेहरू सेंटर उन्हीं की कोशिशों से मुमकिन हुआ।


फ़िल्मों में अदाकारी और समाजी, सियासी खि़दमत के लिये दिलीप कुमार कई पुरस्कार-सम्मान से नवाज़े गए। उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का आठ बार फ़िल्मफेयर अवार्ड मिला। साल 1995 में वे ‘दादासाहेब फ़ाल्के सम्मान’, साल 1997 में ‘एनटी रामाराव पुरस्कार’, साल 1998 में रामनाथ गोयनका पुरस्कार और साल 2000 में ‘राजीव गांधी सद्भावना पुरस्कार’ से सम्मानित किये गए। भारत सरकार के बड़े नागरिक सम्मानों में से एक ‘पद्मभूषण’ और ‘पद्म विभूषण’ के अलावा साल 1998 में पाकिस्तान सरकार ने उन्हें अपने सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज़’ से सम्मानित किया।

जब इस सम्मान का एलान हुआ, तो शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे ने यह फतवा जारी कर दिया कि दिलीप कुमार को यह सम्मान नहीं लेना चाहिए। यहां तक कि उनकी वतनपरस्ती पर भी सवाल उठाए गए। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह पर दिलीप कुमार ने यह पुरस्कार स्वीकार किया। दिलीप कुमार जैसी शख़्सियत सदियों में एक बार पैदा होती हैं। अल्लामा इक़बाल का यह शाहकार शे’र, शायद उन जैसी आला शख़्सियतों के लिए ही लिखा गया है-

हजारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है

बड़ी मुश्किल से होता है, चमन में दीदा-वर पैदा।

(लेखक मप्र के विवपुरी के महल कॉलोनी में रहते हैं उनसे 94254 89944 पर संपर्क किया जा सकता है)

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