खेल

‘नतमस्तक’ हो जाइए! ये महज़ खिलाड़ी नहीं रणबांकुरे हैं।

आज तक भले हमने विजयगाथाओं को किताबों में पढ़ा हो लेकिन आज हम कह सकते हैं कि हमने इन वीरों को रण में लड़ते, हताश होते, गिरते, चोटिल होते, फिर उठ कर खड़े होते और अंत में विजयी होते हुए देखा है। हिंदुस्तान की ज़मीन से हज़ारों मील दूर ऑस्ट्रेलिया की धरती पर जैसे बीते दो महीनों में जीवन का पूरा सार लिख दिया गया। जीवन की वो पटकथा जिसकी शुरुआत में ही 36 रनों का इतिहास का सबसे कम स्कोर देखा गया।

मायूस आंखें, टीम से अलग होता कप्तान, झुके हुए कंधे और हर ओर से सवाल पूछती निगाहें। जैसे, पहले मुकाबले के बाद ही अंत का परिणाम घोषित हो चुका हो। लेकिन जीवन इतना काला-सफेद कब रहा है। इसमें कई रंग मौजूद हैं। नए कप्तान ने कमान संभाली और निराश हो चुके अपने युवा साथियों के सामने जीवन का वो रंग पेश किया जिसे ‘जीत का रंग’ कहते हैं। मेलबर्न में मिली जीत जैसे एक आहट थी, विदेशी पाले को सचेत करने के लिए, कि इनका कप्तान भले नया तो पर हौसले वही दो साल पुरानी जीत जितने ही दृढ़ हैं। इस आहट ने सामने वाले को भी हैरत में डाला और उनकी तरफ से शुरू हुई कुछ और नई चालें। कुछ मैदान के भीतर और कुछ बाहर।

उनकी गेंदों ने उछाल मारना शुरू किया और दर्शकों ने अपनी ज़ुबान से वार करना। सिडनी में इस टीम ने तमाम लड़ाइयों पर फतह हासिल की। ऐसी फतह जहां कई साथी घायल हुए, दर्द से कराहे, लेकिन एक दूसरे का कंधा ना छोड़ा। जीवन के इस पड़ाव ने इन्हें परिपक्वता से भरा। लेकिन फतह और विजयी होने में अब भी एक फासला था। अंतिम रणभूमि उस गाबा में सजी थी, जहां विपक्षी ऑस्ट्रेलिया बीते 32 सालों से ना हारा था। एक ऐसा अचूक किला जहां वो सबसे मुश्किल दुश्मन को ला खड़ा करता और कहता कि ‘अब दिखाओ अपना हौसला’।

एक तरफ 1000 से ज्यादा शिकार कर चुके गेंदबाज, कई शतकों का तमगा थामे बल्लेबाज तो दूसरी तरफ उस मैदान की घास को हाथ से छूने की कोशिश करते ऐसे युवा, जो शायद यहां तक आने से पहले टीम की सूची में भी दर्ज ना थे। इनके हक़ में कुछ था तो बस इतना कि इनके पास खोने के लिए अब कुछ बाकी ना था। इसी पड़ाव पर पहुंचकर जीवन बेफिक्र हो जाता है। जब कुछ खोने का डर ना रहे। ये निडर साथी, इसी भाव से गाबा में लड़े। ऐसा लड़े कि अंत आते-आते विपक्षी भी उन पर मोहित हो उठे। वो जान चुके थे कि वो खिलाड़ियों से नहीं रणबांकुरों से यह जंग लड़ रहे थे। जिनके सामने कुछ कहा नहीं जाता, सिर्फ़ नतमस्तक हुआ जाता है।

(बीबीसी संवाददाता नवीन नेगी के सौजन्य से, BBC फेसबुक पेज से सभार)