पूर्व आईपीएस का लेख: चिंताजनक हैं भारत चीन सीमा पर बढ़ती चीन की गतिविधियां

नए साल के दिन गलवान घाटी में चीनी सैनिकों द्वारा अपने राष्ट्रीय ध्वज को कथित तौर पर फहराने के वीडियो के वायरल होते ही गलवां घाटी में लम्बे समय से चले आ रहा भारत चीन सीमा विवाद फिर से चर्चा में आ गया। सरकार हमेशा की तरह, चीन की, भारतीय सीमा के निकट होने वाली चीनी गतिविधियों पर चुप रहती है, और वह अब भी चुप है। यह चुप्पी किसी कूटनीतिक रणनीति के कारण है या इसका कारण कुछ और है, इस पर अनुमान ही लगाया जा सकता है। पर चीन चाहे डोकलां में घुसपैठ करता रहा हो, या अरुणांचल में गांव बसा कर, नामकरण संस्कार करता रहा हो, सरकार ने चुप रहने की अपनी चिर परिचित नीति इस बार भी बरकरार रखी है।

हालांकि, अखबारों में छपी खबरों के अनुसार, सेना के सूत्रों ने कहा कि 15-16 जून, 2020 की रात को संघर्ष स्थल पर,  जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे, कोई चीनी झंडा नहीं फहराया गया था। संघर्ष स्थल, बाद में बने, बफर ज़ोन में आता है, जो कई दौर की बातचीत में डी-एस्केलेशन प्रक्रिया के हिस्से का एक रूप है। सेना के सूत्रों ने कहा कि यह वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के चीनी पक्ष के अंदर उनके आधार शिविर के पास शूट किया गया यह एक प्रचार वीडियो था।

यह बात सही हो सकती है। पर ट्विटर द्वारा “चीन राज्य-संबद्ध मीडिया” के रूप में चिह्नित एक पत्रकार द्वारा वीडियो पोस्ट किए जाने के 48 घंटे से अधिक समय तक, न तो विदेश मंत्रालय और न ही भारतीय सेना ने आधिकारिक रूप से इस पर कोई प्रतिक्रिया दी, जबकि सोशल मीडिया में यह खबर तेजी से वायरल होती रही। 45 सेकंड के इस वीडियो में चीनी झंडे को चट्टान के एक खुरदुरे चेहरे के सामने फहराते हुए दिखाया गया है। वीडियो क्लिप में बड़ी संख्या में सैनिकों को लाइन में खड़ा दिखाया गया है और पृष्ठभूमि में चीनी सैनिक चीन का राष्ट्रगान गा रहे हैं। वीडियो पोस्ट करते हुए, पत्रकार शेन शिवेई ने ट्वीट किया, “चीन का राष्ट्रीय ध्वज 2022 के नए साल के दिन गलवान घाटी पर उगता है। यह राष्ट्रीय ध्वज बहुत खास है क्योंकि यह एक बार बीजिंग में तियानमेन स्क्वायर पर फहराया गया था।” दूसरे ट्वीट में, उन्होंने एक और वीडियो पोस्ट किया और कहा, “गलवान घाटी में, चीनी पीएलए सैनिकों ने 2022 के नए साल के दिन चीनी लोगों को नए साल की शुभकामनाएं भेजीं।”

अब जरा फ्लैशबैक में चलते हैं। 1962 में चीन के हांथो हुयी शर्मनाक पराजय के बाद भारत चीन का सीमा विवाद अभी तक अनसुलझा है और चीन अपनी हरकतों और बयान से बार बार इतना अधिक अविश्वसनीय साबित होता रहा है कि, उससे कोई भी बात स्थिर रूप से हो, यह संभव भी नहीं है। 1962 की पराजय के बाद, 1993 मे भारत चीन के बीच एक समझौता हुआ था। समझौते की शर्तें, इस प्रकार हैं।

 

भारत चीन सीमा के संदर्भ में, दोनो पक्ष, इस बात पर सहमत हैं कि, वे इस विवाद को शांतिपूर्ण और दोस्ताना बातचीत से हल करेंगे। कोई भी पक्ष एक दूसरे को न तो धमकी देगा और न ही बल का प्रयोग करेगा। इसका अर्थ यह है कि, जब तक सीमा विवाद का शांतिपूर्ण समाधान न हो जाय तब तक, दोनो ही पक्ष एलएसी की स्थिति का सम्मान करेंगे। किसी भी परिस्थिति में कोई भी पक्ष एलएसी का उल्लंघन नहीं करेगा। अगर ऐसा किसी भी पक्ष ने किया भी है तो वह तुरन्त वापस अपने क्षेत्र में चला जायेगा। अगर आवश्यकता होती है तो दोनो ही पक्ष मिल बैठ कर इस मतभेद को सुलझाएंगे।

दोनो ही पक्ष, एलएसी के पास अपना न्यूनतम बल तैनात करेंगे जैसा कि दोस्ताने और अच्छे पड़ोसी वाले देशों के बीच होता है। दोनों ही पक्ष आपस मे बात कर के अपने अपने सैन्यबल को कम संख्या में नियुक्त करेंगे। सैन्यबल, एलएसी से कितनी दूरी पर, किस समय और कितना कम रखा जाय, यह दोनो देशों से विचार विमर्श के बाद तय किया जाएगा। सैन्यबल की तैनाती दोनो ही पक्षो के बीच आपसी सहमति से तय की जाएगी।

दोनो ही पक्ष आपसी विचार विमर्श से एक दूसरे पर भरोसा बनाये रखने के उपाय, आपसी विचार विमर्श से ढूंढेंगे।  दोनो ही पक्ष एलएसी के पास कोई विशेष सैन्य अभ्यास नहीं करेंगे। दोनो ही पक्ष अगर कोई विशेष सैन्य अभ्यास करते हैं तो, वे एक दूसरे को इसकी सूचना देंगे।

अगर एलएसी के पास कोई आकस्मिक बात होती है तो दोनो ही पक्ष आपस मे बैठ कर इस समस्या का समाधान, सीमा सुरक्षा अधिकारियों के साथ मिल कर निकालेंगे। ऐसी आपसी मीटिंग और संचार के चैनल का स्वरूप क्या हो, यह दोनो ही पक्ष आपसी सहमति से तय करेंगे।

दोनो ही पक्ष इस बात पर सहमत है कि, दोनो ही क्षेत्र में कोई वायु घुसपैठ भी न हो, और अगर कोई घुसपैठ होती भी है तो उसे बातचीत से हल किया जाय। दोनो ही पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि, उस क्षेत्र के आसपास, दोनो मे से, कोई भी देश वायु अभ्यास नहीं करेंगे।

दोनो ही पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि, यह समझौता,  जिसमें, एलएसी के बारे में जो तय हुआ है वह सीमा पर अन्यत्र जो सैन्य नियुक्तियां हैं, उन पर कोई प्रभाव नहीं डालता है। दोनो ही पक्ष इस बात पर सहमत होंगे कि, आपसी विचार विमर्श से ही सैन्य निरीक्षण का कोई तँत्र विकसित करेंगे जो सैन्य बल को कम से कम करने पर और इलाके में शांति बनाए रखने पर विचार करेगी।

दोनो ही पक्षो के इंडो चाइना वर्किंग ग्रुप, कूटनीतिक और सैन्य विशेषज्ञों के दल गठित करेंगे जो आपसी विचार विमर्श से इस समझौते को लागू कराने का विचार करेंगे। संयुक्त कार्यदल के विशेषज्ञ एलएसी के दोनों तरफ की समस्याओं के समाधान को सुझाएंगे, और कम से कम सेना का डिप्लॉयमेंट कैसे बना रहे, इसकी राह निकलेंगे। विशेषज्ञ, संयुक्त कार्यदल को इस समझौते के लागू करने में सहायता देंगे। समय समय पर अगर कोई समस्याएं उत्पन्न होती हैं तो, उन्हें सदाशयता और परस्पर विश्वास के साथ हल करेंगे।

यह समझौता यूएन की साइट पर उपलब्ध है और सार्वजनिक है। 15 जून 2020 को अचानक, गलवां घाटी से एक हृदयविदारक घटना की सूचना मिलती है, जिसमे एक कर्नल, बिहार रेजिमेंट के संतोष बाबू सहित 20 सैनिक, चीन के सैनिकों के साथ धोखे से हुए एक झड़प में शहीद हो गए। पूरा देश इस घटना से, उद्वेलित था, और इसी की कड़ी में 19 जून 2020 को प्रधानमंत्री द्वारा सर्वदलीय बैठक बुलाई गयी, और उस सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री जी ने कहा, ” न तो हमारी सीमा में कोई घुसा था, और न ही हमारी चौकी पर किसी ने कब्जा किया था। हमारे 20 जवान शहीद हो गए। जिन्होंने, भारत माता के प्रति ऐसा दुस्साहस किया है, उन्हें सबक सिखाया जाएगा।”

प्रधानमंत्री के इस बयान पर सबसे चिंताजनक प्रतिक्रिया देश के भूतपूर्व सैन्य अफसरों की आयी। सेना के अफसर गलवां घाटी के सामरिक महत्व को समझते है औऱ पीएम द्वारा यह कह दिए जाने से कि ‘कोई घुसपैठ हुयी ही नहीं थी’, हमारी सारी गतिविधयां जो भारत चीन सीमा पर अपनी ज़मीन को बचाने के लिये हो रही हैं, वह अर्थहीन हो जाएंगी। अब कुछ भूतपूर्व सैन्य अधिकारियों की इस बयान पर उनकी प्रतिक्रिया देखें।

कर्नल अजय शुक्ला का कहना था

“क्या हमने नरेन्द्र मोदी को आज टेलिविज़न पर भारत-चीन की सीमा रेखा को नए सिरे से खींचते हुए नहीं देखा ? मोदी ने कहा कि भारत की सीमा में किसी ने अनुप्रवेश ( घुसपैठ ) नहीं किया । क्या उन्होंने चीन को गलवान नदी की घाटी और पैंगोंग सो की फ़िंगर 4-8 तक की जगह सौंप दी है, जो दोनों एलएसी में हमारी ओर पड़ते हैं, और जहां अभी चीनी सेना बैठ गई है ? मोदी यदि आज कहते हैं कि भारत की सीमा में किसी ने भी अनुप्रवेश नहीं किया है तो फिर झगड़ा किस बात का है ? क्यों सेना-सेना में संवाद हो रहा है, क्यों कूटनीतिक बातें चल रही है, सेनाओं के पीछे हटने का क्या मायने है, क्यों 20 सैनिक मारे गए?

भारत के 20 सैनिकों ने भारत की सीमा में घुस आए अनुप्रवेशकारियों को पीछे खदेड़ने के लिये अपने प्राण गँवाए हैं। लेकिन मोदी कहते हैं कि भारत की सीमा में कोई आया ही नहीं । तब उन सैनिकों ने कहाँ जान गँवाई ? क्या मोदी चीन की बात को ही दोहरा रहे हैं कि उन्होंने चीन में अनुप्रवेश किया था ? ”

लेफ़्टिनेंट जैनरल प्रकाश मेनन ट्वीट कर के कहा था, ” मोदी ने समर्पण कर दिया है और कहा है कि कुछ हुआ ही नहीं है । भगवान बचाए ! उन्होंने चीन की बात को ही दोहरा कर क्या राष्ट्रद्रोह नहीं किया है ? इसमें क़ानूनी/ संवैधानिक स्थिति क्या है । कोई बताए ! “मेजर जैनरल सैन्डी थापर ने जो ट्वीट किया वह इस प्रकार था,” न कोई अतिक्रमण हुआ और न किसी भारतीय चौकी को गँवाया गया ! हमारे लड़के चीन की सीमा में घुसे थे उन्हें ‘खदेड़ने’ के लिए ? यही तो पीएलए कह रही है । हमारे बहादुर बीस जवानों के बलिदान पर, जिनमें 16 बिहार के हैं, महज 48 घंटों में पानी फेर दिया गया ! शर्मनाक !”

मेजर बीरेन्दर धनोआ ने सीधे स्स्वाल पूछा था,” क्या हम यह पूछ सकते हैं कि ‘मारते-मारते कहाँ मरें ?” मेजर डी पी सिंह जो उस इलाके में सेवा दे चुके है, की प्रतिक्रिया थी, ” प्रधानमंत्री को सुना । मेरे या किसी भी सैनिक के जज़्बे को कोई नुक़सान नहीं पहुँचा सकता है । मैंने सोचा था वे उसे और ऊँचा उठायेंगे । मैं ग़लत सोच रहा था।” हालांकि, प्रधानमंत्री के पहले, रक्षा मंत्री और विदेश मंत्री ने चीनी घुसपैठ की बात स्वीकार कर चुके थे। उनके बयान देखें।

इसी सम्बंध में 2 जून को रक्षामंत्री ने कहा, “महत्वपूर्ण संख्या ( साइज़ेबल नम्बर ) में चीनी सेनाओं में लदाख में घुसपैठ की है, और अपने इलाके में होने का दावा किया है।” विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि, चीन की पीएलए हमारे इलाके में घुस कर बंकर बना रही है। 13 जून को, थल सेनाध्यक्ष जनरल प्रमोद नरवणे ने कहा, ” चीन से लगने वाली हमारी सीमा पर स्थिति नियंत्रण में है, दोनों पक्ष चरणों में अलग हो रहे हैं। हमलोगों ने उत्तर में गलवान नदी क्षेत्र से शुरुआत की है।” 15 जून को यह दुःखद शहादत होती है और फिर प्रधानमंत्री का 19 जून को यह  बयान आता है, जिससे भ्रम उत्पन्न हो गया है। यह भी सवाल उठता है कि, क्या मंत्रिमंडल में गलवां घाटी और चीन को लेकर कोई मतभेद है या लोगों के अलग अलग स्टैंड क्यों हैं?

अब फिर आज के ताजा हालात पर आते हैं। झंडा भले ही चीन ने अपने इलाके में फहराया हो, पर एक सैटेलाइट तस्वीर जो इसी इलाके से सामने आई है, से पता चलता है कि, चीन द्वारा पैंगोंग झील पर एक पुल बनाया जा रहा है जो विवादित सीमा के उसके अपने हिस्से में है। यह निर्माण पिछले कुछ महीनों से जारी है। मीडिया के अनुसार, यह पुल पैंगोंग झील के उत्तरी/दक्षिणी किनारों को आपस मे जोड़ेगा। इंडिया टुडे के अनुसार, ‘पैंगोंग झील का यह क्षेत्र पिछले साल दोनों सेनाओं के बीच टकराव का मुख्य बिंदु था। अब कहा जा रहा है कि झील के ऊपर बन रहे इस पुल से चीनी सैनिकों तक रसद और हथियार बड़ी आसानी से पहुंच सकते हैं।’ यह सैटेलाइट तस्वीरें जियो इंटेलीजेंस के एक्सपर्ट डेमियन सिमोन ने जारी की हैं। इन तस्वीरों को जारी करते हुए उन्होंने कहा कि, ‘इससे संकेत मिलता है कि यह पुल झील के संकरे रास्ते पर लगभग पूरी तरह बनकर तैयार हो चुका है।’

भारत ने अगस्त 2020 में झील के दक्षिणी तट पर कैलाश रेंज की प्रमुख ऊंचाइयों पर कब्जा कर लिया था, जिससे भारतीय सैनिकों को एक रणनीतिक लाभ मिला था। हालांकि पिछले साल फरवरी में पैंगोंग झील इलाके मे डिसइंगेजमेंट के दौरान, तनाव कम करने के लिए इन ऊंचाइयों से, भारत को पीछे हटना पड़ा था। इस पुल के बन जाने के बाद यह माना जा रहा है कि ‘यह पुल चीन की सेना को तुरंत एक्शन लेने में मदद करेगा। इस पुल के जरिए चीन पैंगोंग झील के विवादित क्षेत्रों तक जल्दी पहुंच सकता है। इसके साथ ही यह पुल झील के दोनों किनारों को भी जोड़ देगा। जिससे झील के दोनों तरफ आसानी से वे पहुंच सकते हैं।

बीबीसी में छपी एक खबर के अनुसार, इतिहास में जाएं तो चीन हमेशा से परोक्ष रूप से आधिपत्य जमाने के लिए जाना जाता रहा है। वह दो क़दम आगे बढ़ाकर एक क़दम पीछे लेने की नीति पर काम करता है। उसका अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ यही रवैया रहा है। इसका सबसे मज़बूत उदाहरण दक्षिण चीन सागर है जहां चीन ने धीमे-धीमे अपनी जगह बनाई है। लेकिन अगर भारत और चीन संबंधों की बात करें तो चीन के लिए भारत अकेला एक ऐसा पड़ोसी देश है जो कि एक बड़ा देश है और जिसकी सेना बेहद सक्षम है। चीन ने यह देखा है कि यहां ज़ोर-ज़बर्दस्ती से आधिपत्य जमाना संभव नहीं है। ऐसे में उनकी रणनीति यह है कि सीमावर्ती इलाकों में बड़े साज़ो-सामान के साथ भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती बनाए रखे। यह एक-दूसरे को एक तरह से थकाने की कोशिश और रणनीति है।

रक्षा विशेषज्ञ स्वर्ण सिंह के अनुसार, दोनों देशों के कोर कमांडर्स के बीच अब तक 13 दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं। इनमें शुरुआत में चीन की ओर से सकारात्मक रुख नज़र आया था क्योंकि अगस्त 2020 में भारतीय सेना ने दक्षिण पैंगोंग झील में प्रीएंपटिव एडवांस किया था। इससे चीन के माल्दो स्थित अग्रिम मुख्यालय को ख़तरा था क्योंकि वह सीधे निशाने पर आ जाता था। ऐसे में चीन को ज़रूरत थी कि वह सकारात्मक माहौल बनाए और वहां से दक्षिण और उत्तर पैंगोंग झील से दोनों तरफ़ से सेनाओं को पीछे हटाया गया. इसके बाद से चीन को लगता नहीं है कि वह कहीं से अपने आपको कमज़ोर पाता है।

अब चीन की कोशिश ये है कि वह लंबे समय तक सीमा पर भारी सैन्य साज़ो-सामान और भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती कर सके. इसका सबसे दिलचस्प संकेत चीन में पारित किए गए हालिया क़ानून में मिलता है जिसमें उन्होंने सीमावर्ती गाँवों में हर तरह की सुविधाएं मुहैया कराने का प्रावधान रखा है। चीन इन सीमावर्ती गाँवों को आदर्श गाँव बनाने की बात कहते हुए इनमें रेल और सड़कों से लेकर यातायात के सभी साधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ दूसरी सहूलियतें उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है।

ये सब इस नज़रिए से किया जा रहा है कि इन अग्रिम इलाकों में चीनी सेना पीएलए तैनात हैं और इन्हें इन इलाकों में देर तक बने रहने के लिए सहायता और सहूलियतें मिल सकें, क्योंकि इन दोनों बलों में आम चीनी नागरिक शामिल होते हैं जिन्हें इन इलाकों की ज़्यादा जानकारी नहीं होती है। इतनी ठंड और ऊंचाई पर उन्हें बनाए रखना थोड़ा मुश्किल होता है। ऐसे में भविष्य में इन गाँवों से जोड़ने का और इन इलाकों से भर्ती किए जाने की योजना है ताकि इस इलाके में तैनाती बनाकर रखी जा सके।

चीन को लेकर अक्सर सरकार का रवैया चुप्पी भरा रहता है। चीनी घुसपैठ पर भारत की प्रतिक्रिया भी बहुत ठंडी होती है। इससे बार बार यह सवाल भी उठता है कि, आखिर इसका कारण क्या है। एक दिलचस्प पहलू और है कि, भारत चीन में सामरिक तनातनी भले ही हो, लेकिन भारत और चीन के परस्पर व्यापारिक सम्बंध निरन्तर बढ़ते जा रहे हैं। लेकिन पिछले 7 सालों में भारत चीन सीमा पर, चाहे वह गलवां घाटी हो, या डोकलां या अरुणाचल, हर जगह चीन की आक्रामकता बढ़ी है। जबकि नरेंद्र मोदी सरकार ने चीन से सम्बंध सुधार के प्रयास बहुत गम्भीरता से किये और उभय देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की परस्पर कई आत्मीय मुलाकातें हुयी। फिर भी 2020 की गलवां घाटी की झड़प से यही साबित हुआ कि सतह पर परस्पर दिखने वाला आत्मीय वार्तालाप और देहभाषा, एक कॉस्मेटिक डिप्लोमेसी की तरह है, जबकि अंदर कुछ और ही पक रहा होता है। सरकार को गलवां घाटी में बढ़ती चीनी गतिविधियों, पैंगोंग झील पर बन रहे पुल और अरुणाचल में बस रहे गांव और सीमा को लेकर नए चीनी कानून के प्रति बेहद सतर्क रहना होगा। विस्तारवाद, चीन की कूटनीति का मूल है। इसी नीति का परिणाम, पाकिस्तान का सी पैक, और ओआरबीआर जैसी महत्वाकांक्षी चीनी योजनाएं हैं। इसी का परिणाम, अफ़ग़ानिस्तान से लेकर, दखिण चीन सागर से होते हुए प्रशांत महासागर में स्थित श्रीलंका, मालदीव तक चीन की गतिविधियां है। चीन की अनिश्चितता भरी कूटनीति और अविश्वसनीयता को देखते हुए, भारत को सतर्क रहना होगा।

(लेखक पूर्व आईपीस हैं)

विजय शंकर सिंह

A retired IPS officer of UP cadre. Reading and writing is my hobby. Retired from service in 2012. I belong to Varanasi but living in Kanpur.

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