हिजाब पर तानाकशी से तंग आकर इस्तीफा देने वाली प्रिंसपल का छलका दर्द, ‘मेरे पास यही विकल्प था या तो खामोश रहूं, या इस्तीफा दूं’

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नई दिल्लीः महाराष्ट्र के विरार शहर स्थित VIVA कॉलेज ऑफ लॉ की प्रिंसिपल डॉ. बतूल हमीद ने बीते दिनों हिजाब पहनने को लेकर कॉलेज में होने वाली छींटाकशी से तंग आकर इस्तीफा दे दिया था। अब डॉ बतूल हमीद ने एक प्रेस बयान जारी किया है। जिसमें उन्होंने कहा कि “मेरे पास दो ही विकल्प थे या तो चुप रहूं या इस्तीफा दूं और अपने नागरिक और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ बोलूं। इसलिए मैंने अपनी गरिमा, धार्मिक पहचान और संस्कृति के लिए बोलने का फैसला किया है।” डॉ. बतूल हमीद ने अब एक विस्तृत बयान जारी किया है, जिसमें उन्होंने अपनी तैनाती से लेकर इस्तीफा देने तक के बारे में विस्तार से बताया है।

क्या लिखा बयान में

डॉ. बतूल हमीद ने अपने बयान में कहा कि मेरे इस्तीफे की खबर फैलने के बाग, VIVA कॉलेज ऑफ लॉ के प्रबंधन की ओर से कई वीडियो लगातार प्रसारित किये जा रहे हैं। जिसमें मेरे द्वारा इस्तीफा देने के तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया और मुझे बदनाम करने की कोशिशें जारी हैं। मैंने कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए VIVA कॉलेज ऑफ लॉ विरार के आई/सी प्रिंसिपल के रूप में स्पष्ट रिक्ति पर नियुक्त किया गया था।

डॉ. बतूल हमीद ने बताया कि साक्षात्कार के समय मैं हिजाब पहन कर आयी थी और वे अच्छी तरह से जानते थे कि मैंने डॉ. सैयदना मुफद्दल सैफुद्दीन के नेतृत्व वाले दाऊदी बोहरा समुदाय से हूं जहां मुस्लिम महिलाओं की परंपराओं का सख्ती से पालन किया जाता है। कॉलेज प्रधबंधन ने मेरे शिक्षण अनुभव और मेरी योग्यता को देखते हुए, साक्षात्कार समिति ने मेरा चयन परिवीक्षा यानी ‘परखने’ के लिये किया। मुझे 19 जुलाई, 2019 को VIVA कॉलेज ऑफ लॉ की प्राचार्य के पद पर नियुक्त किया। एक वर्ष के के बाद, मेरी सेवाओं की स्पष्ट रूप से पुष्टि की गई, इस दौरान न तो मुझे छुट्टी पर भेजा गया और न न ही परिवीक्षा अवधि बढ़ाने के लिए कोई नोटिस जारी किया गया। मैंने लगभग ढाई साल तक वीवा कॉलेज में सेवाएं दी हैं, प्राचार्य के पद पर सराहनीय कार्य किये हैं।

कई और भी कारण हैं

डॉ. बतूल ने कहा कि मुझे कॉलेज के योग्य प्राचार्य के रूप में दिखाते हुए निरीक्षण भी किया गया था। उन्होंने कॉलेज प्रशासन पर आरोप लगात हुए कहा कि ऐसा लगता है कि या तो लॉ कॉलेज चलाने के लिए सभी स्वीकृतियां प्राप्त होने के बाद या फिर मुझे एक योग्य प्राचार्य के रूप में प्रस्तुत करने की स्वीकृति प्राप्त करने की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद कॉलेज में मेरी उपयोगिता समाप्त हो गई और प्रबंधन चालबाज़ी के तहत मुझसे छुटकारा पाना चाहता था। उन्होंने कहा कि, मैं हिजाब पहनने और अपनी धार्मिक पहचान के कारण प्रबंधन समिति की नज़र में आ गयी थी। और हिजाब पर कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले के बाद कॉलेज के माहौल के लिए “अनुकूल” नहीं था।

उन्होंने बताया कि प्रबंधन समिति का आचरण और व्यवहार बाद में, एक घटना से और प्रभावित हुआ। दरअस्ल 14 अक्टूबर, 2021 को दाऊदी बोहरा समुदाय के गणमान्य बुजुर्गों का एक प्रतिनिधिमंडल ने मेरे दफ्तर आकर मुझसे मिलने के लिए कहा था, क्योंकि मैं अकेली बोहरा मुस्लिम महिला हूं, जिसने संवैधानिक कानून पर पीएचडी की डिग्री हासिल की है और लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में कार्यरत हुई थी। इसलिये दाऊदी बोहरा मुसलमानों में से एक वर्ग ने इसे गर्व की बात मानकर मेरे कार्यालय में मेरा अभिनंदन करना चाहा और लॉ कॉलेज में प्रवेश के लिए कॉलेज के नियमों को जानना चाहा। मैंने उन्हें अनुमति दी क्योंकि मुझे लगा कि इससे संस्थान को ही लाभ होगा। मैंने अन्य वरिष्ठ कर्मचारियों को भी इस कार्यक्रम में अपने कार्यालय में आमंत्रित किया। यह कार्यक्रम बिना किसी प्रतिक्रिया के समाप्त हो गया लेकिन कर्नाटक हिजाब मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर आने के बाद, मुझे भी इस घटना को धार्मिक गतिविधि के रूप में ‘इवेंट’ बनाने को लेकर सवाल करके निशाना बनाया गया।

और फिर बदलने लगा व्यवहार

वीवा कॉलेज की पूर्व प्रिसंपल कहती हैं कि अफवाहें शुरू हुईं कि मैं कॉलेज में धार्मिक गतिविधियों में शामिल थी। डॉ. बतूल ने अपने बयान में लिखा कि कॉलेज प्रशासन बिना किसी सबूत के इस घटना के बाद परेशान करना शुरू दिया,मेरे बारे में कानाफूसी शुरू कर दी कि प्रिंसिपल धार्मिक गतिविधि कर रही थीं और उसने हर समय हिजाब लगाकर कॉलेज का माहौल खराब कर दिया हैष एक स्टाफ सदस्य ने मुझसे बात करते हुए कहा कि आपको साड़ी पहनकर कॉलेज में आना चाहिए हिजाब में नहीं। मुझ पर यह दबाव दिन-ब-दिन बढ़ता गया। ज्यादातर कर्माचारियों का व्यवहार मेरे साथ बदल गया, गैर-शिक्षण कर्मचारियों ने मेरा अपमान करना शुरू कर दिया और प्रबंधन ने तो यहां तक किया कि मेरी चाय की मात्रा पीने के पानी और मेरे बैग को कार से मेरे कार्यालय तक ले जाने पर आपत्ति जताई।

उन्होंने कहा कि इन सब परिस्थितियों के बावजूद मुझे 14 दिसंबर, 2021 को पूर्ण बोर्ड बैठक से पहले बुलाया गया। मेरे मोबाइल फोन को स्विच ऑफ करने का आदेश दिया गया, और मुझ पर कॉलेज में धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया। मुझसे दो घंटे तक सख्ती से पूछताछ की गई कि मेरा आचरण मेरी पहचान और संस्कृति को इंगित करने वाले कॉलेज के माहौल के लिए “अनुकूल” नहीं है। बोर्ड के सदस्यों ने बंद दरवाजे में दो घंटे तक मुझे परेशान, अपमानित किया। जब मैंने जवाब देने की कोशिश की, तो मुझे पूरी तरह से चुप रहने के लिए चिल्लाया गया।

मैंने हमेशा इंसानी फर्ज़ निभाया

डॉ. बतूल ने कहा कि अगर किसी कर्मचारी या छात्रों की कोई आर्थिक समस्या होती थी, तो मैं उनकी आर्थिक मदद करती थी लेकिन कॉलेज प्रबंधन ने इसे एक अपराध के रूप में लिया। और मुझ पर “निहित स्वार्थ” के रूप में आरोप लगाया गया। बोर्ड के सदस्यों ने यह भी आरोप लगाया कि मैं कॉलेज के जरूरतमंद छात्र या कर्मचारी को पैसे उधार देकर निहित स्वार्थों को पूरा कर रही हूं।

डॉ. बतूल ने कहा कि कॉलेज प्रबंधन ने मुझ पर झूठे और निराधार आरोप लगाए। बिना किसी सबूत के आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे क्योंकि पिछले तीन वर्षों में मेरे खिलाफ स्टाफ या छात्र की ओर से कोई शिकायत नहीं की गई है। कॉलेज प्रबंधन के इस रवैय्ये मैं इतनी उदास और असहाय थी मैं अपमान सहन नहीं कर पा रही थी, यह एक तरह से आत्हत्या की स्थिती पैदा करने की तरह था। मेरे शुभचिंतकों ने समय पर हस्तक्षेप कर मुझे इस दुविधा से बाहर निकाला है। डॉ. बतूल ने कहा कि ऐसा लगता है कि 14 दिसंबर को हुई बोर्ड की बैठक के परिणामस्वरूप लगाए गए आरोपों का उद्देश्य प्रधानाध्यापक का अपमान करना था ताकि उन्हें उससे छुटकारा पाने के लिए एक आधार तैयार करने में मदद मिल सके। जबकि मनगढ़ंत आरोप के विपरीत मैं हमेशा सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखने के लिए बहुत सक्रिय रही हूं क्योंकि किसी भी तरह से मेरी कभी कोई शिकायत नहीं की गई है।

स्थानीय निरीक्षण समिति का दौरा मैं…

डॉ. बतूल के मुताबिक़ इस घटनाक्रम के बाद कॉलेज की सचिव अपर्णा ठाकुर ने 18 जनवरी को मुझसे मुलाकात की और मेरे काम के लिए मेरी प्रशंसा की और मुझे बताया कि एलआईसी के एलएलबी के निरीक्षण के लिए आने की उम्मीद है। मुझसे कहा गया कि एम कोर्स और एलएलबी प्रथम वर्ष का प्रवेश लगभग शुरू होने वाला है इसलिए मुझे दोनों मामलों की तैयारी शुरू करनी चाहिए। डॉ. बतूल के मुताबिक़ अपर्णा ने मुझे बताया कि प्रबंधन ने आप पर भरोसा किया क्योंकि आप अच्छा कर रही हैं।

बतूल ने बताया कि छात्रों की क्षमता के साथ-साथ संस्थान की प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए पाठ्येतर गतिविधियों को हमेशा प्रबंधन द्वारा सराहा गया। मेरे द्वारा आयोजित VIVA लॉ कॉलेज में 24 फरवरी 2022 को संवैधानिक कानून पर संगोष्ठी आयोजित की गई थी जिसमें प्रबंध समिति के सदस्यों के साथ-साथ वरिष्ठ कर्मचारियों ने भी शिरकत की थी। इस संगोष्ठी में न्यायमूर्ति बी.जी. कोलसे पाटिल, एड. शरफुद्दीन अहमद, एड. संतोष जाधव, अली इनामदार व अन्य का अभिनंदन किया गया। कॉलेज के ट्रस्टी/अध्यक्ष, हितेंद्र ठाकुर लंच के बाद इस संगोष्ठी में शामिल हुए, उन्होंने फिर से सीधे और विशेष रूप से अतिथि की उपस्थिति में मुझ पर हमला किया। उन्होंने मुझ पर आरोप लगाते हुए कि मैं परिसर में धार्मिक गतिविधियों को अंजाम दे रही हूं। जब मैंने अपना जवाब देने की कोशिश की, तो मुझे इसकी अनुमति नहीं दी गई, मेरे लिये यह बहुत अपमानजनक था और मुझे फिर से अपमानजनक, घुटन और शत्रुतापूर्ण माहौल में काम करने की संभावनाओं पर पुनर्विचार करने के लिये प्रेरित किया, क्योंकि मैं एक शिक्षाविद हूं और ऐसी विकट परिस्थितियों में काम नहीं कर सकती।

और फिर मैंने इस्तीफा देने का फैसला लिया

डॉ. बतूल ने बताया कि एलआईसी (स्थानीय निरीक्षण समिति) तक मेरे पास प्रबंधन को एलएलएम कोर्स के लिए मंजूरी देने के लिए परिसर का दौरा करना था, एक योग्य प्रिंसिपल की मंजूरी के अभाव में मुझे कार्य जारी रखने के लिए प्रबंधन को अनुमति नहीं दी जा सकती है। अगले दिन जब एलआईसी ने अपना काम पूरा किया, प्रबंधन समिति के वरिष्ठ सदस्यों में से एक सदस्य लंच के दौरान मेरे कार्यालय में आया और मुझे चेतावनी दी कि मेरे कार्यालय में किसी भी धार्मिक गतिविधि न करें.

डॉ. बतूल कहती हैं कि बहुत असहजता से मेरी सेवाओं को नज़रअंदाज़ करते हुए और मुझे चोट पहुँचाने के कारण मेरे साथ असम्मानजनक व्यवहार किया जिससे मुझे इतना गहरा आघात लगा कि मेरा बल्डप्रेशर कम हो गया और मैं कुछ पलों के लिए बेहोश हो गयी। मेरे आसपास के कुछ लोगों ने ताना मारा कि मैं ड्रामा (नाटक) कर रहा हूं। यह निर्णय लेने का सही समय था क्योंकि मेरी पहचान, संस्कृति और कानूनी और संवैधानिक अधिकार दांव पर थे। उसी पल मैंने इस्तीफा देकर बाहर निकलने का फैसला किया क्योंकि मुझे बताया गया है कि प्रबंधन का इरादा कुछ और ही था, क्योंकि मैं हिजाब जैसी अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपरा पर कॉलेज का आदेश का पालन करने के लिए तैयार नहीं हूं। यह मेरे व्यक्तित्व, पहचान और संस्कृति का अभिन्न अंग है।

सुनवाई के अधिकार से वंचित किया गया

डॉ. बतूल हमीद के मुताबिक़ इस्ताफा में उल्लिखित मेरी शिकायतों को सुनवाई के अधिकार से वंचित कर दिया गया कि दरअस्ल बतूल ने इस्तीफा देते वक्त लिखा था कि “कुछ दिनों से मैं असहज महसूस कर रही हूं क्योंकि मेरे आस-पास के वातावरण को असंयमित बना दिया गया है, इसलिए यह मुश्किल है कि मैं अपने कर्तव्यों का निर्वहन जारी रख सकूं।” डॉ. बतूल ने बताया कि प्रबंधन का यह दावा कि प्रिंसिपल ने उनकी शिकायत नहीं की थी, पूरी तरह से गलत साबित होता है। क्योंकि सुलह के स्वर में इस्तीफा मिलने के बाद भी कई सवाल का हैं जिनका जवाब और समाधान किया जाना बाकी है।

क्या प्रबंधन ने प्रधानाध्यापक के आस-पास के असंयमित माहौल की जांच की थी?

क्या प्रबंधन ने इस्तीफा स्वीकार करने से पहले प्रिंसिपल को उनकी शिकायतों को समझाने के लिए बुलाया था?

इस्तीफे को प्रभावी करने के लिए तुरंत स्वीकार करने के क्या कारण थे?

क्या मुझे एक महीने की पूर्व सूचना जारी किए बिना, अयोग्य और सेवानिवृत्त व्यक्ति की I/C प्रिंसिपल के रूप में गोपनीय रूप से नियुक्ति की जा सकती है जो योग्य I/C प्रिंसिपल के कार्यकाल के दौरान दिए गए अनुमोदन को धारण करने में सक्षम नहीं है?

डॉ. बतूल कहती हैं कि इस्तीफे के बाद के व्यवहार ने साबित कर दिया कि वे अनौचित्य के लिए दोषी थे और अब उन्हें बचाने के लिए और मुझ पर किए गए अन्याय और अवैधता के कृत्यों से बचाने के लिए बहाना बनाया जा रहा है। डॉ. बतूल हमीद कहती हैं कि मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहूंगी कि यह संस्थान पेशेवर नैतिकता के बिना चलता है। इसमें प्रक्रिया और विधियों का पालन नहीं किया जा रहा है। मुझे मीडिया और सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से मेरे बारे में प्रसारित झूठे आख्यानों, मनगढ़ंत तथ्यों के आधार पर चरित्र हनन का दुख हुआ है। यह सब निराधार है, इसका कोई सबूत नहीं है।  

गलत और मनघड़ंत दावों को बढ़ावा न दें

डॉ. बतूल हमीद कहती हैं कि मैं एक शिक्षाविद हूं मुझे राजनीतिकरण किए बिना अपने करियर को जारी रखना है। मैं उस मुद्दे को बढ़ा रही हूं जिसने मेरे धर्म और पहचान के साथ-साथ मौलिक और संवैधानिक अधिकारों को बदनाम करने के लिए उकसाने वाली परिस्थितियां पैदा कीं, जिसके कारण मुझे प्रिंसपल की नौकरी से इस्तीफा देना पड़ा। डॉ. बतूल कहती हैं कि यह मेरे लिये इतना चुनौतीपूर्ण था कि मुझे इस्तीफा देने का फैसला लेना पड़ा। मैंने मीडिया से संपर्क नहीं किया था, यहां तक ​​कि हमेशा एक शिक्षाविद के रूप में गरिमा को बनाए रखा। डॉ. बतूल कहती हैं कि मुझे उस घोर क्रूरता और अन्याय का शिकार बनाया गया है जिसने मुझे अपनी नौकरी का त्याग करने के लिए मजबूर कर रहा है।

साथ ही डॉ. बतूल ने कहा कि इस मामले को सही परिप्रेक्ष्य में पेश करने के लिए मैं मीडिया की भी शुक्रगुजार हूं। उन्होंने कहा कि मेरे बयान का उद्देश्य तथ्यों को रिकॉर्ड में लाना है क्योंकि मीडिया का एक वर्ग, शक्तिशाली प्रबंधन से प्रभावित होकर झूठे बयानों के माध्यम से कुछ और ही मनघड़ंत कहानी बयां कर रहा है, इसलिये मुझे यह बयान जारी करना पड़ा है कि ताकि गलत आख्यानों को बढ़ावा न दिया। डॉ. बतूल ने हिजाब पर कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस फैसले ने मेरे जैसे बड़ी संख्या में लोगों को पीड़ा दी है जो पीड़ित हैं, लेकिन संवैधानिक अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए अथक रूप से खड़े हैं।