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किसान आंदोलनः बार-बार साफ नीयत हवाला देने वाली सरकार की नीयत ही किसानों की नजर में शक के घेरे में

कृष्णकांत

जिस नीयत के साफ होने का बार-बार हवाला दिया जाता है, किसानों की नजर में वह नीयत ही शक के घेरे में है। सबसे पहला सवाल है कि अगर सरकार कृषि क्षेत्र में सुधार चाहती है तो इतनी जल्दी में क्यों है? इस एक सवाल का जवाब जून से लेकर अभी त​क नहीं मिल पाया है। तीन कृषि कानूनों को महामारी की आड़ में अध्यादेश लाकर लागू किया गया है। इस बारे में न संसद में चर्चा हुई, न किसी कमेटी ने विचार किया, न विपक्ष को सुना गया, न किसानों को सुना गया। 41 दिन के आंदोलन और 60 लोगों की मौत के बाद भी सरकार उन्हें सुनने को क्यों तैयार नहीं है?

कोई सुधार जनता की भलाई के लिए ही होता है। अगर जनता कह रही है कि इससे हमें नुकसान होगा तो उस पर विचार करने में क्या बुराई है? लेकिन सरकार सुनने को तैयार नहीं है। ये सरकार कुछ-कुछ दिन पर फैशनेबल नारे लॉन्च करती है। खेती को लेकर बोले- ‘एक देश, एक बाजार’। ये कितना अनर्गल है कि एक विविधता भरे में सब एक कर देना है? देश के अलग-अलग हिस्से में अलग-अलग उपज होती है। सब जगह अलग-अलग ऋतु चक्र हैं। बारिश होने का क्रम अलग-अलग है। पैदावार से लेकर खान-पान के तरीके तक अलग हैं। कहीं फल-सब्जियां पैदा होती हैं, कहीं अनाज होता है।

सबसे मजेदार है कि नारा दिया ‘एक देश एक बाजार’ और कानून बना डाला ‘एक देश दो बाजार’। नया कानून कहता है कि एक बाजार एपीएमसी मंडियों के अंदर होगा और दूसरा इससे बाहर। यानी एक सरकारी मंडी और दूसरी प्राइवेट मंडी।  दूसरे से कहते हैं कि पहले समझ लो, लेकिन जो किया है वो खुद ही नहीं समझ पाए। नारा कुछ और है, करनी कुछ और। सरकार कह रही है कि मंडियां खत्म नहीं होंगी, एमएसपी खत्म नहीं होगी। लेकिन मध्य  प्रदेश से हाल में रिपोर्ट आई है कि नये कृषि काननूों के बाद राज्य के 248 एपीएमसी बाजार में से कम-से-कम 190 खत्म हो गए हैं। जिस बिहार ने 2006 में ही मंडियां खत्म कर दी थीं वहां के किसान 1868 का धान 1000 रुपये में बेच रहे हैं। इन नतीजों को देखकर पंजाब ओर हरियाणा के किसानों को क्यों नहीं डरना चाहिए और उन्हें सरकार के झूठ को सच क्यों मानना चाहिए?

पहले भी हो चुका है आंदोलन

आपको याद होगा कि पिछले पांच सालों में कई बड़े किसान आंदोलन हुए हैं। हर आंदोलन की मांग यही थी कि और ज्यादा मंडियां चाहिए, फसलों का उचित मूल्य चाहिए, एमएसपी चाहिए, कॉरपोरेट की तरह खेती के लिए अनुदान या कर्जमाफी चाहिए, सिंचाई की व्यवस्था चाहिए।  लेकिन सरकार ने इसका उल्टा कानून बनाया। सरकार ने ऐसा कानून बनाया जिससे कृषि सेक्टर कॉरपोरेट के कब्जे में आएगा, मंडियां खत्म हो जाएंगी, एमएसपी खत्म हो जाएगी, मूल्य की गारंटी खत्म हो जाएगी। यानी किसानों की रही सही सुरक्षा भी खत्म हो जाएगी।

नये कानून के बाद ​किसान कह रहे हैं कि ये जो आप हमें दे रहे हैं, हमें नहीं चाहिए। सरकार कह रही है कि हमने जैसे देश की अर्थव्यवस्था का भला कर दिया है, वैसे ही आपका भी भला करके मानेंगे। दरअसल, किसानों की भलाई बहाना है। असली मकसद कॉरपोरेट को मालामाल करना है।

सरकार की ईमानदारी

ईमानदारी और साफ नीयत का ढिंढोरा पीटने वाली सरकार ने भ्रष्टाचार को कम करने के कई क्रांतिकारी उपाय किए हैं। जमाखोरी रोकने का कानून बदल दिया और जमाखोरी पर से स्टॉक लिमिट हटा दी। अब कोई बिजनेसमैन कितना भी अनाज खरीदकर स्टॉक कर सकता है, बाजार में कमी पैदा करके महंगाई बढ़ा सकता है और घनघोर मुनाफा कमा सकता है। सरकार ने आम आदमी का हथियार कहे जाने वाले आरटीआई कानून में संशोधन करके उसे कमजोर किया और सूचना आयोग को पिंजड़े का तोता बना दिया।

सरकार ने प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट में संशोधन करके उसे कमजोर किया। अब बिना सरकार की इजाजत के किसी सरकारी भ्रष्टाचार की जांच नहीं की जा सकती। ईमानदार सरकार ने यूपीए के लोकपाल कानून में भी संशोधन कर दिया और लोकपाल नाम की संस्था आजतक गायब चल रही है। ये कहाँ है, क्या कर रही है, किसी को खबर हो तो सूचित करें। सरकार ने सीबीआई नाम के तोते के लिए कंपटीशन बढ़ाते हुए ईडी और एनआईए नाम के नए तोते भी पाल लिए जो हर राज्य में चुनाव से पहले जरूर दस्तक देते हैं। आप चाहें तो ऐसी ईमानदारियों की कसमें खा सकते हैं और साथ साथ गर्व भी कर सकते हैं।

 (लेखक पत्रकार एंव कथाकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)