विशेष रिपोर्ट

अरतग़रुल से एर्दोगानः तुर्की को बांधने वाली 100 साल की जंजीर कटेगी? तुर्कों की होनी है परीक्षा

वसीम अकरम त्यागी

साउथ एशिया समेत दुनिया के 70 से अधिक देशों में तुर्की की सल्तनत ए उस्मानिया पर आधारित वेबसीरीज़ डिरिलिस अर्तुग़रल ख़ूब देखी जा रही है। कोरोना की वजह से हुए लॉकडाउन में स्मार्ट फोन वाले यूजर्स की नज़रें जैसे ही इस सीरीज़ पर पड़ीं तो घरों में क़ैद हुए लोगों ने समय बिताने के लिये इसे देखना शुरु किया. देखते देखते इस सीरीज़ ने सफलता के पुराने रिकार्ड तोड़ दिये हैं। यह सीरीज़ उस तुर्क ख़ानाबदोश क़बीले की कहानी है जिसने 1299 में ऑटोमन एंपायर यानी सल्तनत ए उस्मानिया की बुनियाद रखी. और वह सल्तनत तीन महाद्वीपों पर 600 साल तक क़ामय रही। इस सीरीज़ की आलोचना भी खूब हो रही है, अमेरिका और यूरोप में तो इस सीरीज़ का विरोध हो ही रहा है, लेकिन इसके अलावा मिस्र, UAE सऊदी जैसे मुस्लिम देशों में भी इस सीरीज पर प्रतिबंध है.

अर्तुग़रल उसी उस्मानिया सल्तनत की नींव रखने वाले उस्मान के पिता और दादा के संघर्ष की कहानी है। इस सीरीज़ में दिखाया गया है कि कैसे मंगोलों और सलीबियों से लड़कर एक क़बीला सीरिया के शहर हलब यानी अलेप्पो में जाकर बसता है. यहीं से उसके संघर्ष की दास्तान शुरु होती है, जो मंगोलों से संघर्ष करता है, सलीबियों से संघर्ष करता है और डेढ़ सो साल से चली आ रही है सल्जूक़ सल्तनत में फल फूल रहे ग़द्दारों का किस्सा तमाम करता है। छ सदियों तक क़ायम रहने वाली यह सल्तनत जब बिखरी तो दुनिया का नक्शा ही बदल गया, इस सल्तनत के बिखरते ही दुनिया में 40 नए देश वजूद में आए.

कैसा होगा तुर्की

तुर्की ने इस सीरीज़ के माध्यम से अवाम में जन चेतना जगाने की कोशिश की है। इसीलिये अमेरिका द्वारा इस सीरीज को सॉफ्ट बम बताया गया है। तुर्की को लगता है कि दुनिया भर के मुसलमानों को तुर्कों की बहादुरी और ख़िलाफत ए उस्मानिया के बारे में बताने का सही समय यही है।

2023 में तुर्की मे क्या बदलेगा

मीडिया ख़ासकर यूट्यूब में यह बहुत चर्चा का विषय है कि ट्रीटी ऑफ लुसाने की अवधि 2023 में समाप्त हो रही है। जिसके ख़त्म होने के बाद तुर्की तेल निकाल सकेगा, उसे बोस्परस समुद्र पर अधिकार हासिल हो जाएंगे और समुद्र कर से उसे काफी आमदनी होगी। मगर आपको यह जानकर हैरानी होगी कि स्विटजरलैंड के शहर लुसाने में 1923 में तुर्की के प्रतिनिधि इशमत इनोनू के सामने टेबल पर बैठी हुई घाघ शक्तियों ने तुर्की को कमज़ोर करने की व्यवस्था कर ली थी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उस्मानी ख़िलाफ़त का संघर्ष फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, यूनान, जापान और रोमानिया से हो गया था। इस विवाद को समाप्त करने की नीयत से 1923 में तुर्की ने फिर से फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, यूनान, जापान, रोमानिया के साथ साथ सर्ब, क्रोट, स्लोवेन राजशाही से बातचीत शुरू की। इसके नतीजे में स्विटजरलैंड में बातचीत के 8 महीने बाद एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। आश्चर्यजनक रूप से इस समझौते की कोई डेडलाइन यानी समाप्ति तिथि नहीं है।

लुसाने संधि के तहत आज के तुर्की के पास जो सीमाएं हैं, उसको मान्यता दी गई है। इसमें कहीं भी नहीं है कि यह संधि 2023 में समाप्त हो जाएगी। दरअसल 1923 की लुसाने संधि की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद उस्मानिया ख़िलाफ़त ने युद्ध समाप्ति का समझौता किया। उस्मानियों ने यह समझौता फ्रांस गणराज्य, ब्रिटिश राजशाही, इटली राजशाही, जापान राजशाही, यूनान राजशाही और रोमानिया राजशाही से किया। इस संधि को ट्रीटी ऑफ सेवरेस कहा जाता है। यह सेवरेस फ्रांस के शहर सेवरेस में 1920 में इन पार्टियों के बीच हुई थी। इसके तहत 15 लाख 90 हज़ार स्क्वैयर किलोमीटर की उस्मानिया ख़िलाफ़त चार लाख 53 हज़ार स्क्वैयर किलोमीटर में सिमट जानी थी। उस्मानियों से छीनकर जो नए देश बनने थे वह थे आर्मिनिया, सीरिया, मेसोपोटामिया, हिजाज़, असिर और यमन। इस संधि में कुर्दिस्तान यानी मोसुल के लिए जनमत संग्रह पर सहमति बनी, जो आज का इराक़ है। इस संधि के अनुच्छेद 95 के तहत फिलस्तीन अलग होकर ब्रिटेन की झोली में जाना था। यहूदियों को फिलस्तीन में बसने का अधिकार भी सेवरेस की संधि में दिया गया।

असल परीक्षा अभी भी तुर्कों की होनी है

तुर्की में इस संधि के ख़िलाफ एक जनआंदोलन खड़ा हुआ जिसे शांत करने के लिए दूसरी संधि की गई जिसे हम लुसाने की संधि कहते हैं, जो 1923 में की गई। इस संधि में ना तो कोई समाप्ति तिथि है और ना ही यह तय किया गया है कि तुर्की को कुछ नई शक्तियाँ मिल जाएंगी। अलबत्ता इतना ज़रूर है कि आज के तुर्की की मान्यता को हासिल करने में मुस्तफ़ा कमाल अतातुर्क ने कामयाबी हासिल की। इस संधि में तुर्की में बसे ईसाइयों और साइप्रस एवं यूनान में बसे मुसलमानों को लेकर सहमति बनी थी। यह संधि तो तुर्की के उस्मानियों के इलाक़े हारने का आधिकारिक घोषणा पत्र था। इस संधि से तुर्की ने साइप्रस, यूनान के कुछ हिस्से, इटली के डोडेचेनी द्वीप, सूडान और मिस्र को गंवाकर एक देश पर तसल्ली कर ली थी।

तुर्क आज भी सेवरेस और इसके बाद लुसाने संधि को लेकर शर्मिंदा हैं। वर्तमान राष्ट्रपति रजब तैयब इर्दोगान बहुत होशियार नेता हैं। वह चाहते हैं कि तीन टर्म के बाद भी वह देश पर राजनीतिक नियंत्रण बनाए रख सकें। इसके लिए वह सॉफ्ट पॉवर के तौर पर अतर्गरल जैसी वेब सिरीज़ के माध्यम से तुर्की के लिए एक सौम्य और बहादुर देश की छवि बनाए रखना चाहते हैं। वह यह भ्रम भी समाप्त नहीं करना चाहते कि वर्ष 2023 में देश में कुछ बदलेगा या नहीं। तुर्की ने कुरदलुस उस्मान और दिरिलिस अरतगल जैसे सीरियल बनाकर तुर्क राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि तुर्कों में राष्ट्रवाद की भावना अभी से जागृत की जाए और जब कभी ज़रूरत पड़े इन सीरियल से बने सॉफ्ट पॉवर की बदौलत तुर्की को जनमत हासिल रहे।

सिर्फ भारत में चला था ख़िलाफत बचाओ आंदोलन

1920 में भारतीय मुसलमानों द्वारा ख़िलाफत को बचाने के लिये आंदोलन चलाया था। इसके अलावा न तो तुर्को ने और न ही इस्लामी जगत में कहीं कोई आवाज़ नहीं उठीं। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के वे बड़े नेता जो ब्रिटिश की ग़ुलामी से लड़ रहे थे उन्होंने ही ख़िलाफत आंदोलन चलाया था। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मौलाना शौकत अली जौहर, मौलाना मोहम्मद अली जौहर,  और महात्मा गांधी जैसे बड़े नेताओं ने तुर्की की ख़िलाफत ए उस्मानिया को बचाने के लिये आंदोलन चलाया। अल्लामा इक़बाल जैसे दार्शनिक ने ख़िलाफत बचाने के लिये चंदा तक किया. इस दौरान अपनी एक नज़्म के अशआर कहते हुए उनकी आंखों से आंसू बह निकले थे. वह नज़्म थी…

मगर मैं नज़र को एक आबग़ीना लाया हूं

जो चीज़ इसमें है जन्नत में भी नहीं मिलती.

झलकती है तेरी उम्मत की आबरू इसमें

ताराबलस के शहीदों का है लहू इसमें.

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