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क्या महात्मा गांधी और कांग्रेस ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की थी?

कृष्णकांत

मेरा खून खौल उठता है जब देखता हूं कि कोई दो कौड़ी का दलाल इतिहास पढ़ा रहा होता है कि गांधी-नेहरू सब भगत सिंह के दुश्मन थे. आज देखा कि सत्ता का चप्पलामृत पान करने के लिए दुबले हो रहे एक सज्जन ट्विटर पर झूठ फैला रहे हैं कि गांधी ने भगत सिंह की फांसी रोकने की कोशिश नहीं की और भगत सिंह को ‘असफल’ बताया. यह वैसा ही है जैसे कि मैं कहूं कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अंग्रेजी सेना के लिए भर्ती कैंप लगाकर और सावरकर ने पेंशन लेकर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे. हंसना मना है. आगे पढ़िए-

क्या महात्मा गांधी और कांग्रेस ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की थी? 

सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी किताब “भारत का स्वाधीनता संघर्ष” में लिखा है-“महात्मा जी ने भगत सिंह को फांसी से बचाने की पूरी कोशिश की। अंग्रेजों को गुप्तचर एजेंसियों से पता चला कि यदि भगत सिंह को फांसी दे दी जाये और उसके फलस्वरूप हिंसक आंदोलन उभरेगा, अहिंसक गांधी खुलकर हिंसक आंदोलन का पक्ष नहीं ले पाएंगे तो युवाओं में आक्रोश उभरेगा. वे कांग्रेस और गांधी से अलग हो जायेंगे. इसका असर भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन को समाप्त कर देगा. पर शुक्र है उस समय भारतीय जनता ने अंग्रेजी साम्राज्यवादी चाल को विफल कर दिया. कुछ नवयुवकों ने आक्रोश में आकर काले झण्डों के साथ प्रदर्शन पर उसके बाद ही हिंसक आंदोलन का अंत हो गया. यह सच है कि अपने जीवन में पहली बार किसी व्यक्ति -भगत सिंह की सजा कम करने के लिए कहने वाले गांधी जी की बात यदि अंग्रेजी हुकूमत द्वारा मान ली गई होती तो इसका सबसे अधिक लाभ गांधी जी का होता, उनकी अहिंसा की विजय होती.”

अब सवाल है कि क्या सुभाष चंद्र बोस ये सब वामपंथी षडयंत्र के ​तहत लिख रहे थे? इसका जवाब ये है कि बेवकूफी का कोई जवाब नहीं होता.

भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को फांसी हुई. 24 मार्च को गांधी कराची पहुंचे, तो लाल कुर्तीधारी नौजवान भारत सभा के युवकों ने काले कपड़े से बने फूलों की माला गांधीजी को भेंट की. गांधी ने इसे स्वीकार करते हुए कहा, ‘काले कपड़े के वे फूल तीनों देशभक्तों की चिता की राख के प्रतीक थे… मैं उनके क्रोध के प्रदर्शन को सही मानता हूं.’

26 मार्च को कराची में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में गांधी ने कहा, ‘आत्म-दमन और कायरता से भरे दब्बूपने वाले इस देश में हमें इतना अधिक साहस और बलिदान नहीं मिल सकता. भगत सिंह के साहस और बलिदान के सामने मस्तक नत हो जाता है. लेकिन यदि मैं अपने नौजवान भाइयों को नाराज किए बिना कह सकूं तो मुझे इससे भी बड़े साहस को देखने की इच्छा है. मैं एक ऐसा नम्र, सभ्य और अहिंसक साहस चाहता हूं जो किसी को चोट पहुंचाए बिना या मन में किसी को चोट पहुंचाने का तनिक भी विचार रखे बिना फांसी पर झूल जाए.’

भीड़ में से किसी ने चिल्लाकर पूछा- ‘आपने भगत सिंह को बचाने के लिए किया क्या?’

गांधी ने जवाब दिया- ‘मैं यहां अपना बचाव करने के लिए नहीं बैठा था, इसलिए मैंने आपको विस्तार से यह नहीं बताया कि भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए मैंने क्या-क्या किया. मैं वाइसराय को जिस तरह समझा सकता था, उस तरह से मैंने समझाया. समझाने की जितनी शक्ति मुझमें थी, सब मैंने उन पर आजमा देखी. भगत सिंह की परिवारवालों के साथ निश्चित आखिरी मुलाकात के दिन यानी 23 मार्च को सवेरे मैंने वाइसराय को एक अनौपचारिक खत लिखा. उसमें मैंने अपनी सारी आत्मा उड़ेल दी थी. पर सब बेकार हुआ.’

फांसी की सजा के घोर विरोधी गांधी महीनों पहले से भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी का विरोध कर रहे थे और इसके तमाम लिखित संदर्भ मौजूद हैं.

अंग्रेजों की साजिश थी कि ऐसी रणनीति बनाई जाये जिससे जनता को लगे कि महात्मा की अपील पर फांसी रुक जायेगी. महात्मा ने स्वयं वाइसराय से मिलकर लिखित रूप में अपील की कि भगतसिंह की फांसी रोक दी जाये. लेकिन अचानक समय से पहले ही करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन प्रारम्भ होने से पहले ही फांसी देने का एक मात्र मकसद था गांधी के प्रति नवयुवकों में विद्रोह पैदा करना.

भगत सिंह स्वयं फांसी के पूर्व अपने वकील से मिलने पर कहा था- मेरा बहुत बहुत आभार पंडित नेहरू और सुभाष बोस को कहियेगा, जिन्होंने हमारी फांसी रुकवाने के लिए इतने प्रयत्न किया.

अब सवाल है कि क्या भगत सिंह अपनी फांसी के बावजूद वामपंथी षडयंत्र के तहत झूठ फैला रहे थे? तो मेरे प्यारे गदहों! इसका जवाब ये है कि चूतियापे का कोई जवाब नहीं होता.

भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह जी जिन्होंने 23 मार्च को अपना पुत्र खोया था, 26 मार्च को कांग्रेस अधिवेशन में लोगों से अपील कर रहे थे- आप सबों से आप लोगों को अपने जनरल महात्माजी का और सभी कांग्रेस नेताओं का साथ जरूर देनी चाहिए. सिर्फ तभी आप देश की आजादी प्राप्त करेंगे. इस पिता के उदगार के बाद पूरा पंडाल सिसकियों में डूब गया था. नेहरू, पटेल, मालवीय की आंखों में आंसू छलक रहे थे.

अब सवाल है ​कि क्या अपना पुत्र खोने वाले भगत सिंह के पिता गांधी नेहरू को महान बनाने के षडयंत्र में शामिल थे? जवाब वही है कि गदहा ब्रिगेड के चूतियापे का कोई जवाब नहीं है.

अब एक सवाल ये पूछिए कि जब ये सब हो रहा था तब भारत के स्वनामधन्य सच्चे सपूत क्या कर रहे थे? जवाब है कि वे क्रांतिकारियों के खिलाफ अंग्रेजों के लिए मुखबिरी कर र​हे थे, उनके लिए कैंप लगा रहे थे, पेंशन ले रहे थे और शाखा लगाकर खाली मैदान में झर्रर्र बोल रहे थे.

आजादी आंदोलन के खिलाफ अंग्रेजों का साथ देने की गद्दारी छोटी थी क्योंकि उस समय बहुत से राजे रजवाड़े और अमीर भी फायदा उठाने के लिए अंग्रेजों के साथ थे. लेकिन आज 75 साल बाद गांधी को भगत सिंह का दुश्मन बताना, सुभाष को गांधी के खिलाफ खड़ा करना, नेहरू को पटेल के खिलाफ दिखाना ये ज्यादा बड़ी गद्दारी है. ये एक और विभाजन की कोशिश है जिसकी बागडोर देसी अंग्रेजों के हाथ में है.

जहां तक गांधी-नेहरू का कद छोटा करने के अभियान की बात है तो ये तुमसे न हो पाएगा. गांधी-नेहरू सौ साल से स्थापित हैं और उन्हें स्थापित करने में उन अंग्रेज बहादुरों का भी अहम योगदान है जिनके लिए तुम मुखबिरी करते थे. गांधी से जो नहीं हुआ, वह उनकी असफलता है. लेकिन उनकी सफलता उससे बहुत बड़ी है कि कट्टरपंथियों की ​मुखबिरी भी आजादी आने से नहीं रोक पाई. असली गद्दार तब भी तुम्हीं थे और आज भी तुम्हीं हो. इसी शर्म से बचने के लिए सर्टिफिकेट बांटते फिरते हो!

प्रिय नफरती चिंटुओं! यह गंदा खेल बंद दो. कह रहे हैं तुमसे न हो पाएगा.

(नोट: ये छोटा सा लेख मात्र है. गांधी, भगत सिंह की फांसी के विरोध में थे, इस बारे में इतने तथ्य हैं कि एक छोटी मोटी किताब बन सकती है.)